श्रद्धांजलि
शिवाजी महाराज का नेतृत्व- साहस और बुद्धि का सटीक मिश्रण

आशुचित्र- शिवाजी की महानता को एक लघु लेख में व्यक्त नहीं किया जा सकता लेकिन उनके व्यक्तित्व की विशेषताओं को यहाँ संक्षेप में समझाने का प्रयास किया गया है।

यदि कोई उनकी युद्ध गाथाओं के बारे में सुनेगा तो उन्हें किसी महामानव से कम नहीं पाएगा- क्षण में आना, क्षण में गायब हो जाना, पेड़ों-पहाड़ों में कहीं विलुप्त हो जाना, रात के अंधेरे में ओझल हो जाना, जी हाँ, हम बात कर रहे हैं महाराष्ट्र की भूमि पर जन्मे छत्रपति शिवाजी महाराज की जिन्होंने मराठा साम्राज्य की नींव रखी और एक किले से शुरुआत कर इसका विस्तार कई राज्यों तक किया।

मुगल साम्राज्य के दक्षिणी पश्चिमी छोर पर उनके पहले वार ने औरंगज़ेब को उत्तेजित कर दिया लेकिन जब औरंगज़ेब तख्त पाने की जद्दोजहद में था, तब शिवाजी ने एक रोमांचक घटना में अफज़ल खान को मारकर बीजापुर पर आंशिक कब्ज़ा कर लिया। शिवाजी का दमन करने के लिए भेजे गए शाइस्ता खान पर शिवाजी ने 400 लोगों के साथ रात के अंधेरे में उसी के हरम में घुसकर वार किया और रोमांचक बात यह है कि इसमें केवल छह मराठा ही मारे गए। अपने लोगों को बचा लाना भी शिवाजी के नेतृत्व का विशेष गुण है। दिलिर खान से युद्ध में जहाँ उसके 1000 सैनिक मारे गए थे, वहीं शिवाजी के 500 और इसी प्रकार सिद्दी मसूद से समुद्री युद्ध में जहाँ उसके 100 सिपाही मारे गए थे, वहीं शिवाजी के 44। शिवाजी की नौसेना मात्र मुगलों के लिए ही खतरा नहीं बनी, अपितु इसने अंग्रेज़ व्यापारियों को भी काफी नुकसान पहुँचाया।

बुद्धि के बिना साहस विजयी नहीं होता। जब शिवाजी की सेना को संगठित होने की आवश्यकता थी, तब उन्होंने शांति प्रस्ताव रख अपना संगठन मज़बूत किया। 1669 में जब औरंगज़ेब ने मंदिरों को तुड़वाने का फरमान जारी किया तो शिवाजी ने उसके विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। एक शेर की भाँति आवश्यकतानुसार उन्होंने कभी धीरे से वार किया तो कभी दहाड़ कर साम्राज्यों की नींव हिला दी। जय सिंह के नेतृत्व में मुगल सेना शिवाजी पर भारी पड़ी और उन्हें पुरंदर की संधि में कई गढ़ देने पड़े लेकिन मात्र छह वर्षों में उन्होंने अधिकांश किलों को फिर से प्राप्त कर लिया।

शिवाजी की कूटनीति भी चर्चा का विषय रही है। जब आदिल शाह ने उन्हें घेरा तो वे सिद्दी जौहर को लालच में फँसाकर पनहाला से बच निकले। उन्होंने बहादुर खान को तीन महीनों तक शांति वार्ता में उलझाए रखा और स्वयं पोंडा और कोल्हापुर पर कब्ज़ा कर लिया। उनका औरंगज़ेब की कैद से निकलकर बाहर आना भी एक रोचक घटना है। अपने सौतेले भाई को अपनी जगह बैठाकर, वे फलों की टोकरी में बाहर निकल गए और इस बात का पता मुगलों को 24 घंटों बाद चला लेकिन तब तक वे बहुत दूर पहुँच गए थे।

बचपन से रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं से प्रेरणा लेकर बड़े हुए शिवाजी ने सदैव धर्म का सम्मान किया। कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं कि जब भी शिवाजी भ्रमित होते थे तो माँ भवानी उनके स्वप्न में आकर उनका पथ प्रदर्शन करती थीं। सिर्फ इतना ही नहीं, किसी युद्ध अभियान पर गए हुए शिवाजी वहाँ के स्थानीय तीर्थ स्थलों के दर्शन हेतु अवश्य जाते थे। हैदराबाद जाते समय वे कई दिनों श्री शैला की सेवा में रहे थे व वृद्धाचलम के शिव मंदिर में उनके दर्शन का विवरण मिलता है। गैर-मुस्लिमों से जज़िया वसूल रहे आलमगिर को पत्र लिखकर उन्होंने चेताया था और कहा था कि यह कृत्य किसी भीखारी के कटोरे से रुपये लेने समान नीच है।

एक विकासशील साम्राज्य को स्थिरता प्रदान करने में उन्होंने कभी जनता के हितों से समझौता नहीं किया और इसलिए भारत माँ के इस वीर पुत्र का नाम आज भी गूंजता है- जय शिवाजी, जय भवानी।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।