श्रद्धांजलि
नर्मदा सेवक अनिल माधव दवे जी की द्वितीय पुण्यतिथि आपके संकल्प की प्रतीक्षा में

नमामि गंगे परियोजना की सफलता सबके समक्ष है लेकिन नदी संरक्षण के लिए एक और अथाह प्रयास किया गया है ‘नर्मदा समग्र’ के माध्यम से जिसे मध्य प्रदेश से बाहर कम ही लोग जानते हैं। 2008 में नर्मदा समग्र का गठन करने वाले अनिल माधव दवे का देहावसान 18 मई 2017 को हो गया था। उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर उनके पुण्य प्रयासों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। उनके विचारों से प्रेरित होकर कार्य करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

जो तथ्य नर्मदा समग्र को नमामि गंगे से भिन्न बनाता है, वह यह है कि यह प्रयास सरकार आधारित नहीं अपितु समुदाय आधारित है। नमामि गंगे में सरकारी प्रयास से सामाजिक जागरूकता लाई गई लेकिन यहाँ नर्मदा के संरक्षण को एक जन आंदोलन बनाकर सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया गया है। लगभग नौ वर्षों तक अनिल माधव दवे ने सामुदायिक सहायता से नर्मदा समग्र को अपने बलबूते पर चलाया।

विचारों से ही कर्म प्रभावित होते हैं। विचारों के संचार और प्रसार के लिए उन्होंने नदी महोत्सव का आयोजन किया जिसने लोगों को संवाद का एक मंच प्रदान किया। इसके अलावा स्वयं नर्मदा की यात्रा कर उन्होंने विभिन्न स्थानों पर चौपाल आयोजित कर लोगों के दृष्टिकोण जाने व उन्हें जागरूक किया। दवे जी के विचारों से प्रेरित होकर कई लोग सामूहिक व व्यक्तिगत रूप से माँ नर्मदा की सेवा के लिए सक्रिय हो गए।

आजकल पर्यावरण संरक्षण के नाम पर धार्मिक गतिविधियों पर हो रहे प्रहारों से भिन्न, दवे जी ने धार्मिक आस्था को इस पुण्य कार्य की दिशा में केंद्रित किया। नर्मदा नदी को माँ का दर्जा दिया जाता है और जिस प्रकार हिंदू देवियों को चुनरी चढ़ाने की प्रथा है, वैसी ही प्रथा माँ नर्मदा के लिए थी। इस प्रथा को दवे जी ने हरियाली चुनरी पहल से जोड़ा जिसमें नर्मदा नदी के आस-पास वृक्ष लगाने को ही चुनरी चढ़ाने की आस्था माना गया। इसने लोगों को वृक्षारोपण के लिए प्रेरित किया। साथ ही उन्होंने उन वनवासियों की संस्कृति को भी प्रोत्साहित किया जो पारंपरिक रूप से पर्यावरण समर्थक है।

नदी में मूर्ति विसर्जन से हो रहा प्रदूषण एक बड़ी समस्या है। इसके निवारण हेतु पीओपी व रसायनों से बनी मूर्तियों को एक पृथक कुंड में विसर्जित किए जाने की पहल की गई, साथ ही नदी में विसर्जित करने हेतु मिट्टी की मूर्तियाँ बनाना सिखाने की कार्यशाला भी आयोजित की गई।

नदी की सेवा के साथ नदी के निकट स्थित लोगों की सेवा को भी विषय बनाया गया। नर्मदा के तटवर्ती क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए 2011 में देश की पहली नदी एंबुलेंस का संचालन किया गया। नाव पर सवार यह एंबुलेंस दुर्गम क्षेत्रों पर नर्मदा के माध्यम से जल्दी पहुँच जाती है व रोगियों को समय पर उपचार मिल जाता है।

नर्मदा किनारे स्थित घाटों की नियमित रूप से सफाई की जा रही है। यह कार्य सरकार नहीं बल्कि समूह बनाकर या व्यक्तिगत रूप से लोग कर रहे हैं, विशेषकर युवा। 2014 में भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के छात्र द्वारा लिखी गई थिसीस में बताया गया कि सर्वाधिक लोग नर्मदा समग्र के घाट सफाई अभियान से ही प्रभावित हैं व 90 प्रतिशत से अधिक लोगों का मानना है कि घाटों की नियमित सफाई हो रही है।

नर्मदा के आस-पास अभी तक कई करोड़ वृक्ष लगाए जा चुके हैं और इनमें वृक्षों के जीवित रहने की दर 80 प्रतिशत से अधिक है क्योंकि इस अभियान से लोगों को जोड़ा गया है। ये लोग वृक्षों के रख-रखाव को अपना दायित्व समझते हैं, साथ ही घरों के निकट किए गए वृक्षारोपण से ग्रमीणों का कार्य भी आसान हो जाता है। वृक्षारोपण के लिए वनवासियों को प्राथमिकता दे मनरेगा के माध्यम से उन्हें आजीविका भी दी गई।

दवे जी का मानना था कि नदी एक जीवित इकाई है व उनके प्रयासों से मध्य प्रदेश राष्ट्र का पहला राज्य बना जिसने 2017 में एक नदी यानि कि माँ नर्मदा को जीवित पदार्थ माना। मध्य प्रदेश सरकार की ओर से ‘नमामि देवि नर्मदे’ के तहत 11 दिसंबर 2016 से 15 मई 2017 तक नर्मदा सेवा यात्रा आयोजित की गई तथा इसके समापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नर्मदा संरक्षण एक्शन प्लान का विमोचन भी किया। इस प्लान के अधीन कुल 21 विभागों में कार्य का सकुशल विभाजन किया गया। इसके मुख्य बिंदू वृक्षारोपण, नर्मदा के किनारों को शौचमुक्त करना, धार्मिक विसर्जनों को पर्यावरण के अनुकूल बनाना, औद्योगिक व घरेलु सीवेज का उपचार कर निष्पादन, जैविक खेती का प्रोत्साहन, आदि रहे थे। लेकिन दुर्भाग्यवश इस प्लान के विमोचन के तीन दिवस बाद ही दवे जी की आकस्मिक मृत्यु हो गई।

2008, 2010, 2013 और 2015 में चार नदी महोत्सवों का आयोजन करने वाले दवे जी की अनुपस्थिति में जब मार्च 2018 में पाँचवा नदी महोत्सव आयोजित किया गया तो माननीय अतिथिगण व प्रतिभागी उन्हें याद करने से बच नहीं पाए। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नदी महोत्सव का श्रेय उन्हें देते हुए उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। साथ ही 2017 में प्रारंभ किए गए प्रयास के विषय में उन्होंने बताया कि वर्ष भर में 13,000 हेक्टेयर के क्षेत्र में वृक्षारोपण किया गया है और प्रति हेक्टेयर वृक्षारोपण के लिए 20,000 रुपये दिए गए हैं।

2011-12 में नर्मदा समग्र ने नदी स्वास्थ्य सूचकांक जारी किया था और उसके बाद अपने कार्य को जारी रखते हुए यह संस्था 100 से अधिक घाटों पर सामुदायिक सहायता से पानी की गुणवत्ता की जाँच कर रही है व जल्द ही एक सूचना मैन्युअल के साथ प्रस्तुत होगी। दूसरी ओर नमामि देवि नर्मदे के अंतर्गत अपने दायित्व को निभाते हुए मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) ने विभिन्न घाटों का तीन सत्रों 2016-17, 2017-18 और 2018-19 का डाटा इकट्ठा किया है। यदि इस डाटा को देखें तो पाएँगे कि नदी में टोटल सॉलिड्स में कमी आई है। नदी के उद्गम स्थान अमरकंटक से लेकर मंडला तक बीओडी भी घटा है। लेकिन इसके आगे के भाग में बीओडी की मात्रा बढ़ी है। साथ ही बढ़ता पीएच भी समस्या का विषय बना हुआ है।

नगरीय विकास विभाग का एक दायित्व था गंदे नालों को नर्मदा में मिलने से रोकना जिसके लिए मलजल उपचार संयंत्र (एसटीपी) लगाए जा रहे हैं। हालाँकि 2017 के मध्य में सौंपे गए इस दायित्व को पूरा करने के बीच में राज्य चुनाव और फिर आम चुनाव आ गए जिसके कारण इसके कार्य को फलीभूत होते हुए नहीं देखा गया। कहीं पर विस्तृत योजना तैयार है और कहीं पर कार्य शुरू हुआ है लेकिन क्रियान्वित कहीं नहीं हुआ है। एक वर्ष पूर्व तक औद्योगिक सीवेज के उपचार के लिए 14 नियोजित संयंत्रों में से मात्र दो ही क्रियान्वित हुए थे। नर्मदा एक्शन प्लान में नर्मदा के किनारों पर पूर्ण रूप से प्लास्टिक के प्रतिबंध की भी घोषणा की गई थी और 2017-18 में एमपीपीसीबी ने इससे 11 टन प्लास्टिक निकाला था।

हालाँकि कई स्थानों पर प्लास्टिक प्रतिबंध हो गया है। नर्मदा समग्र के ओमकारेश्वर संभाग के समन्वयक मनोज जोशी ने बताया कि उनके क्षेत्र में अब शायद ही कोई नर्मदा में प्लास्टिक फेंकता होगा। उनके कार्यक्षेत्र में नेमावर से खलघाट तक 27 घाट आते हैं जिनपर आरती से पूर्व प्रतिदिन सफाई होती है व कुछ संगठन एवं किसान साप्ताहिक रूप से इसमें योगदान देते हैं। इसके अलावा उनके क्षेत्र में चार-पाँच वर्ष पूर्व नाविक संघ और नर्मदा समग्र के संयुक्त आवेदन पर नगर पालिका ने एसटीपी लगाया था व उनके कार्यक्षेत्र में मात्र महेश्वर का बलगाँव ही है जहाँ मलजल सीधे नर्मदा में मिलता है। शायद यही कारण है कि एमपीपीसीबी के डाटा में ओमकारेश्वर व महेश्वर में सीओडी की मात्रा कम होती देखी गई है।

नर्मदा की सफाई में स्वच्छ भारत अभियान का भी विशेष योगदान रहा है जहाँ अब लोग नदी के किनारे शौच करने नहीं जाते हैं। साथ ही नर्मदा परिक्रमा करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए भी पथ पर जगह-जगह शौचालयों का निर्माण किया गया है। दवे जी के बांद्राभान दृष्टि-पत्र को केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने राष्ट्रीय जल नीति बनाने के लिए स्वीकारा है।

लेकिन ये कार्य अभी भी दवे जी के स्वप्न से कोसों दूर हैं। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 48ए को संशोधित कर राज्य के पर्यावरण दायित्व में नदियों को जोड़ना और भारतीय नदी विज्ञान संस्थान की स्थापना ऐसे कार्य हैं जो अभी चर्चा का केंद्र भी नहीं बन पाए हैं। लेखक का मानना है कि दवे जी ने सामाजिक जागरूकता लाकर नर्मदा संरक्षण को एक जन आंदोलन तो बना दिया है। अब आवश्यकता है इसमें सरकारी सहायता और नैतिक परिवर्तनों की। नमामि गंगे के समान राजनीतिक इच्छा व प्रतिबद्धता दवे जी के स्वप्न को पूर्ण कर सकती है। लेकिन हमें अपनी भूमिका निभाते हुए दवे जी के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित कर नदी संरक्षण का संकल्प लेना चाहिए।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।