श्रृद्धांजलि
मुथुवेल करुणानिधि – क्या अंतिम द्रविड़वादी थे?

प्रसंग
  • करुणानिधि एक महान कूटनीतिक राजनेता थे और वे राजनैतिक विशारद बन सकते थे अगर उनके अंदर प्रतिशोध की भावना न होती और वे अवसरवाद को रास्ते में नहीं लाते।

जब मणिरत्नम ने 1997 में अपनी फिल्म इरुवर बनाई, तो मुथुवेल करुणानिधि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थे। द्रविड़ आंदोलन की कहानी को फिर से दर्शाती हुई यह एक ऐतिहासिक फिल्म थी। मणिरत्नम ने अपनी फिल्म में भूमिका निर्धारण का एक कुशल विकल्प तैयार किया। करुणानिधि के समान चरित्र के लिए उनकी पसंद प्रकाश राज थे, जिन्होंने पहले ही कोलिवुड में नंबियार और नासर की तर्ज पर सबसे उत्कृष्ट खलनायक के रूप में स्वयं को स्थापित कर लिया था। एम जी रामचंद्रन (एमजीआर) के समान चरित्र के लिए, निर्देशक ने मोहनलाल को चुना, जो मलयालम सिनेमा के सबसे पसंदीदा अभिनेताओ में से एक है।

एक प्रकार से, निर्देशक ने फिल्म को द्रविड़ आंदोलन की एक अर्ध-ऐतिहासिक सिने-फिक्शन के रूप में रचित किया – जिसमे एक मैटनी नायक और एक ‘द्रविड़’ परिदृश्य के खलनायक थे। छद्म तर्कवाद की द्रविड़ भूमि में मुख्य संवाद में चित्रपट(सिनेमा) के माध्यम से फिल्मों को प्रसारित करने के तरीके को देखते हुए, इस तरह का चित्रण भावनात्मक सामाजिक सत्य का लगभग एक वास्तविक चित्रण था।

जब कोई राजनीतिक अभिमान और नब्बे के दशक से परे करुणानिधि के बारे में बात करता है, तो उसे केवल दो भावनाएं मिलती हैं – अत्यन्त प्रेम और निष्ठा, जो उन्होंने अपनी पार्टी के संवर्ग और अपने दुश्मनों के द्वेष के प्रति व्यक्त की है। निरंतर शिकायतों के बावजूद कि करुणानिधि ने पार्टी को अपनी पारिवारिक संपत्ति बना लिया था, द्रविड़ मुनेत्र कझागम (द्रमुक) का मुख्य कैडर हमेशा नेताजी के साथ खड़ा था। उन्होंने कभी पार्टी की स्थिति या पैसे की परवाह नहीं की। हालांकि, उनकी तमिल प्रवीणता कुछ इस प्रकार थी, जो कि वास्तविकता की तुलना में वाक्पटुता के मामले में अधिक थी, जिसमे कम से कम तीन पीढ़ियों तक के भारी जनसमूह को मंत्रमुग्ध करने कि शक्ति थी। इस योग्यता के साथ, करुणानिधि ने राजनीतिक अवसरवाद का निर्माण किया और कभी-कभी, अनुचित टिप्पणियां भी कीं। फिर भी, अपने मुख्य निर्वाचन क्षेत्र को सम्मोहित करने के लिए द्रमुक सुप्रीमो ने अपने तमिल प्रभुत्व पर भरोसा किया।

करुणानिधि की सबसे बड़ी उपलब्धि तमिलनाडु की एक बड़ी आबादी को विश्वास दिलाने की उनकी क्षमता थी, कि वह समाज और एक प्राचीन राष्ट्र के रूप में तमिलों के कल्याण के पर्याय थे। इस तमिल समाज को आर्यन द्वारा परिभाषित किया गया था जिसमें अक्सर तमिल ब्राह्मण शामिल थे। करुणानिधि की आलोचना करने वाले किसी भी तमिल ब्राह्मण को आर्यन कहा गया। करुणानिधि की किसी भी मीडिया आलोचना को ‘ब्राह्मण आर्यन साजिश’ कहा गया। लेकिन हर किसी को याद रखना चाहिए कि यद्यपि तमिलनाडु का एक बड़ा हिस्सा उनकी वाक्पटुता से मंत्रमुग्ध था, लेकिन अधिकांश तमिलों ने सहजता से उनकी विचारधारा और राजनीति को अस्वीकृत कर दिया। उन्होंने सुंदर अभिनेता से राजनेता बने एमजीआर का पक्ष ले लिया।

करुणानिधि की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि उन्होंने हिंदू धर्म के लिए एक प्रतिशोधपूर्ण घृणा बनाए रखी। शायद, इसके पीछे उनके अतीत के कुछ गहरे घाव हों। इसके लिए ऐसा कुछ ज़िम्मेदार था, जिसे हम नहीं जानते। जब भी उन्हें मौका मिला, उन्होंने हिंदू पुराणों, महाकाव्यों, अनुष्ठानों और संस्कृति का उपहास किया। जब उन्होंने द्रमुक पार्टी के सदस्य को अपने माथे पर एक सिंदूरी निशान लगाए हुए देखा, तो उन्होंने यह कहते हुए, कि क्या उनके माथे से खून बह रहा है, सार्वजनिक रूप से उस सदस्य का उपहास किया था। फिर भी, उनके परिवार के सदस्यों ने हमेशा अपने माथे पर लाल रंग का तिलक लगाया है। उन्होंने अग्नि के फेरे लेने की हिंदू परंपरा को भी गंवारू (असभ्य )बताते हुए अस्वीकार कर दिया। एक निश्चित समयांतराल पर उन्होंने, ‘हिंदू का मतलब है चोर’ या ‘क्या सेतु (पुल) का निर्माण करने के लिए राम ने किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्ययन किया था?’ जैसी टिप्पणियां करके हिंदुओं को चोट पहुँचाई। लेकिन एक राजनीतिक नेता के रूप में उनकी सफलता इस तथ्य के बावजूद थी कि द्रमुक कैडर के कई लोग जो उन्हें मानते थे, खुद हिन्दू प्रथाओं का पालन करते थे जिनका करूणानिधि खुल कर उपहास करते थे।

करुणानिधि ने अचानक एक पीली शॉल पहननी शुरू कर दी, जो उनके बाद के जीवनकाल में उनके साथ पर्याय बन गई। जब इसके बारे में पूछा गया तो उन्होंने इसके लिए कई कारण बताए, जैसे कि उनके विचारों ने उन्हें निर्देशित किया -चिकित्सा कारणों से लेकर ‘यह बुद्ध द्वारा पसंद किया जाने वाला रंग था’ इत्यादि। लेकिन सभी को, यहां तक कि डीएमके समूह के भीतर भी पता था कि यह ज्योतिषीय कारणों से था। लेकिन फिर, किसी ने भी इसे किसी द्विभक्‍तीकरण के रूप में नहीं देखा।

उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों की राजनीति का दृढ़ समर्थन किया। इसे दो तरीकों से सोचने की जरूरत है। पहला, यह वोट बैंक राजनीति के लिए था। दूसरा, विचारधारात्मक रूप से, वह चाहते थे कि तमिल, हिंदू धर्म को छोड़ दें और ईसाई या मुस्लिम बन जाएं – एकेश्वरवादी धर्म। द्रविड़ तर्कवाद, बहुदेववादी हिंदू धर्म से ‘सभ्य’ ईसाई धर्म या इस्लाम में परिवर्तन करने की अंधविश्वासी आर्यन की साजिश के तहत केवल उन्नति सोपान था। इसलिए कोई भी, उनके हिन्दुओ को त्योहारों पर न मुबारकबाद देने के द्रण संकल्प को या उनके ईसाई धर्म एवं इस्लाम के धार्मिक कार्यों में उत्साही भागीदारी को वोट बैंक राजनीति के रूप में नहीं देख सकता था। यह निश्चित रूप से वोट बैंक राजनीति थी, लेकिन इसका एक विचारधारात्मक आशय भी था।

तमिलनाडु मेंविस्तारवादी रूप से चल रहे अल्पसंख्यक, ईसाई और इस्लाम दोनों,धर्मों के लिए करूणानिधि एक महान आशा थे।उन्होंने दिखाया कि हिंदू समाज में औपनिवेशिक आर्यन-द्रविड़ियन प्रिज्म किस प्रकार का राजनीतिक नेतृत्व पैदा कर सकता है। उनके लिए,करुणानिधि की हिंदू धर्म के प्रति घृणा के साथ और फिर भी हिंदुओं द्वारा समर्थन, राज्य के लोगों को उनके धर्म बदलने के लिए उनका सबसे महत्वपूर्ण समर्थन था।

करुणानिधि द्वाराराजनीतिक इस्लामवाद के साथ छेड़छाड़ ने उन्हें केवल एक बार कुछ समय के लिए चौंका दिया। ऐसा तब हुआ जब 1998 कोयंबटूर बम विस्फोट हुआ। करुणानिधि को अपने लंबे राजनीतिक करियर में सिर्फ तीन साल के बहुत ही कम समय के लिए एहसास हुआ था कि उन्होंने तमिलनाडु में इस्लामिक ताकतों को पोषित करके गलती की। इसलिए, जब द्रमुक भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ गठबंधन में शामिल हुई तो उन्होंने इस्लामिक आतंकवाद को शामिल करने की सक्रिय नीति का पीछा किया। यह सब राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन – १ के दौरान हुआ था। उस समय, तमिलनाडु में भी ऐसा लगता था कि हिंदुओं का राजनीतिक समेकन हो रहा है। थोड़े समय के लिए, द्रमुक हिंदुत्व समर्थकके रूप में प्रतीत हुई। मार्च 2001 में, करुणानिधि ने विश्व हिंदू परिषद के ‘ग्राम कोविल पुजारील परवाई’ (जीकेपीपी) का उद्घाटन किया।

हालांकि, भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद 2001 के विधानसभा चुनावों में द्रमुक की हार के कारण करुणानिधि ने अपनी रणनीतियों का पुनर्गठन किया। 2004 में, बीजेपी-अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम गठबंधन पूरी तरह से विफल रहा।करुणानिधि ने इस्लामिक ताकतों, कांग्रेस और कम्युनिस्टों के साथ इंद्रधनुष गठबंधन किया था, जिससे वह पुडुचेरी की एक सीच सहित सभी 40 निर्वाचन क्षेत्रों पर जीते थे। इससे यह स्पष्ट रूप से साबित हो गया कि 1998 के अच्छे प्रदर्शन के बावजूद, हिंदू नेता,विशेष रूप से तमिलनाडु भाजपा,अपने लिए पर्याप्त हिंदू वोट बैंक बनाने में बुरी तरह विफल रही थीं।तो करुणानिधि अब एक और अधिक विद्रोही हिंदू-विरोधी रणनीति के साथ वापस आए।जल्द ही, तमिलनाडु इस्लामिक ताकतों के लिए एक स्वर्ग बन जाएगा।

2009 में, न केवल विशाल मानव त्रासदी से पीड़ित श्रीलंका के तमिलों को बचाने में विफलता जब वे गृह युद्ध से पीड़ित थे बल्कि करुणानिधि की हरकतों, जिसको अब मज़ाक के रूप में ४ घंटे का उपवास बुलाया जाता है, को उनके राजनैतिक जीवन के सबसे निंदनीय पलों में से एक के रूप में याद रखा जाएगा जिसने तमिल को अपने राजनैतिक करियर के केंद्र में रखा। यह एक ऐसा पल था जिसने एक सबसे आम कार्यकर्ता के अपने सर्वोच्च नेता पर से विश्वास को हिला कर रख दिया।

अब, जैसा कि कोई तमिलनाडु के पूरे राजनीतिक इतिहास को फिर से देखता है, निश्चित रूप से एक बात हो सकती है जिसे किसी को इस नेता के बारे में बोलना चाहिए:वह लोकतांत्रिक माहौल में एक मास्टर कुटिल राजनेता थे।उनके पास कितने सारे कौशल थे, उन्हें एक राजनेता बनना चाहिए था, वहएक सार्वभौमिक नेता और तमिलनाडु को पुनरुत्थान के लिए भी नेतृत्व कर सकते थे। लेकिन, फिर भी उन्होंने गुप्त प्रतिशोध और अवसरवाद को अपने असाधारण नेतृत्व कौशल पर हावी होने की अनुमति दी।

क्या द्रमुक ने करुणानिधि के बाद अपने हिंदू-विरोधी स्वरूप को नरम कर दिया होगा?यह बहुत संदेहपूर्ण है।एम के स्टालिन ने मिले-जुले संकेत दिए हैं लेकिन शायद वह अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने के इच्छुक हैं। एक और वारिस सुप्रिमों, कनिमोझी,शायद अपने पिता से भी ज्यादाहिंदू विरोधी हिंदू हैं। इसलिए, द्रमुक हिंदु विरोधी के रूप में एक राजनीतिक केंद्र बिंदु बनी रहेगी।

अरविंदन स्वराज्य के एक सहायक संपादक हैं।