भारती / श्रद्धांजलि
हिंदी को हिंदुस्तान की उन्नति का माध्यम मानने वाले महामना पंडित मदन मोहन मालवीय

प्रयागराज की पावन पुण्य भूमि अनंतकाल से ही सांस्कृतिक विरासत की जननी रही है। यही वह भूमि है जहाँ भक्ति की गंगा, कर्म की यमुना और ज्ञान की सरस्वती का संगम होता है। यह भूमि आदि काल से ही ज्ञानियों की तपोभूमि रही है। यहाँ कई ऐसे लोगों ने जन्म लिया जिन्होंने अपने ज्ञान व विचारों से देश को एक नई दिशा दी।

इसी पावन धरा पर जन्मे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय भारतीय संस्कृति के अनन्य संरक्षक थे। मालवीय सनातन धर्म के मूर्तरूप थे। उनका सारा जीवन  समाज की सकारात्मक क्रियाओं में ही लगा रहा। उन्होंने चरित्र निर्माण को सर्वोपरि स्थान देते हुए भारतीय युवाओं को अपनी सनातन संस्कृति के साथ-साथ आधुनिकतम ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा से समृद्ध करने के उद्देश्य से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की।

मातृभूमि, मातृभाषा और मातृसंस्कृति के स्तंभ मालवीय सौम्य भी हैं, प्रखर भी। शांत भी हैं, मुखर भी। धीर भी हैं, गंभीर भी। वे अदम्य साहसी भी हैं, वीर भी। महामना मालवीय ने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक विषमताओं के विरुद्ध ही विशद संघर्ष नहीं किया अपितु भारतीय जनमानस को विदेशियों की मानसिक दासता से मुक्त करने के लिए वैचारिक आंदोलनों का भी संचालन किया।

यह आंदोलन था भाषा का, शिक्षा का। वे पूर्ण परिचित थे कि जिस जन समुदाय, राष्ट्र तथा संस्कृति की भाषा नष्ट हो जाती है, वह जन-समुदाय, राष्ट्र तथा संस्कृति अधिक समय तक अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की सुरक्षा नहीं कर सकता। अतएव उन्होंने भारत के अधिकाधिक जनों की हिंदी भाषा के महत्त्व को समझाया और उसकी सुरक्षा, प्रचार-प्रसार में प्राणपण से जुट गए। उन्होंने अपने लेखों द्वारा हिंदी के लिए जन-जागृति उत्पन्न की।

मालवीय को यह अटल विश्वास था कि सिर्फ हिंदी में ही राष्ट्रभाषा बनने की क्षमता है। वे हिंदी और संस्कृत भाषा के प्रबल पक्षधर थे। हिंदी के बारे में उनका मत था कि “हिंदुस्तान की उन्नति हिंदी को अपनाने से ही हो सकती है।” निज भाषा के महत्त्व को लेकर मालवीय कहते थे-

“बिजली की रोशनी से रात्रि का कुछ अंधकार दूर हो सकता है, किंतु सूर्य का काम बिजली नहीं कर सकती। इसी भाँति हम विदेशी भाषा से सूर्य का प्रकाश नहीं कर सकते। साहित्य और देश की उन्नति अपने देश की भाषा द्वारा ही हो सकती है।”

मालवीय हिंदी के प्रथम वरिष्ठ नेता थे, जिन्होंने स्पष्ट रूप से हिंदी आंदोलन का सूत्रपात किया तथा हिंदी को राजकीय कार्यालयों में उचित स्थान दिलाया। 1898 में सर एंटोनी मैकडोनेल के सम्मुख गहरी छानबीन करके हिंदी भाषा की प्रमुखता को बताते हुए उन्होंने नागरी के पक्ष में प्रमाण और आँकड़े प्रस्तुत किए थे।

मालवीय ने सैंकड़ों जगह डेपुटेशन भेजे और हिंदी भाषा तथा देवनागरी लिपि की सरलता, सटीकता और उपयोगिता सिद्ध करके कचहरियों में इस भाषा को प्रवेश दिलाया। इस संबंध में उनका लेख “कोर्ट कैरेक्टर्स एंड प्राइमरी एजुकेशन इन नॉर्थ वेस्टर्न प्राविन्सेज” जो उन्होंने  व उनके कुछ विशिष्ट लोगों ने गवर्नर सर एंटोनी मैकडोनेल को प्रतिवेदन के रूप में प्रस्तुत किया था, बहुचर्चित है। मालवीय के तर्क इतने मजबूत थे कि उनकी अधिकतर बातों को मान लिया गया।

महामना हिंदी सुरक्षा के ऐसे शक्तिशाली स्तंभ बनकर उभरे जिसने अपनी विद्वता से माँ हिंदी के ललाट को सुसज्जित किया। उन्होंने ऐसी कई संस्थाओं की स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान किया जो हिंदी के प्रचार-प्रसार एवं उन्नति के लिए दृढ़ संकल्पित है।

यह मालवीय का व्यक्तित्व था, जो बाबू श्यामसुंदर दास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, लाला भगवानदीन जैसे विद्वानों को वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए ला सके। उनके ही प्रयासों से कांग्रेस के कार्यकाल में हिंदी प्रवेश पा सकी। अपनी अनेक राजनीतिक, सामाजिक क्रियाकलापों में व्यस्तता के बावजूद उन्होंने हिंदी के लिए जो भी किया, वह चिर स्मरणीय रहेगा।

एक ऐसे समय में जब जनसेवा व्यवसाय बन गई है और राजनीति उद्योग, आदर्श की बात करना अव्यवहारिक माना जाता है, उच्च आदर्शों से युक्त जीवन मूल्य धुंधला गए हैं तब माननीय महामना का व्यक्तित्व हमें निःस्वार्थ सेवा, त्याग, बलिदान जैसे आदर्श उच्च मूल्यों का पाठ पढ़ाता है। उनका आदर्श जीवन दर्शन प्रत्येक देशवासी के लिए सदैव अनुकरणीय रहेगा।