श्रद्धांजलि
मिल्खा सिंह को प्रणाम- खेलों को देश के स्वाभिमान से जोड़ने वाले ‘फ्लाइंग सिख’ को नमन

ब्रिटिश दासता से स्वाधीन हुए भारत को खेलों की दुनिया में पहचान देने वाले ‘उड़न भारतीय’ मिल्खा सिंह नहीं रहे। सुविख्यात धावक, ‘पद्मश्री’ से सम्मानित ‘उड़न सिख’ मिल्खा सिंह का निधन खेल जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। एक महान् खिलाड़ी के रूप में देश उन्हें हमेशा याद करेगा।

कभी दूरदर्शन पर उन्हें देश के लिए स्वाभिमान के साथ नंगे पैर दौड़ते देखना एक अलग-सा अहसास देता था। इस अलग-से अहसास से उपजे खेलों के प्रति रोमांच ने लाखों भारतीयों को खेल की दुनिया में जाने के लिए प्रेरित किया जिसमें आनंद और रोमांच से बढ़कर देश के लिए मान-वृद्धि का उद्देश्य था।

मिल्खा सिंह पर प्रत्येक भारतीय को गर्व है। उन्होंने खेल की दुनिया को पैसों के लिए नहीं अपनाया था बल्कि देश के स्वाभिमान से जोड़ा था। कोरोना विषाणु से संक्रमित होने के करीब एक महीने बाद 91 वर्षीय इस महान धावक के निधन से देश ने खेल संस्कृति के महान योद्धा को खो दिया है।

वर्ष 1958 के राष्ट्रमंडल खेलों के विजेता और 1960 के ओलिंपियन ने चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में अंतिम साँस ली। मिल्खा सिंह बीते 20 मई को कोरोना विषाणु की चपेट में आए थे। पहले उनके पारिवारिक रसोइए को कोरोना हुआ था, जिसके बाद मिल्खा और उनकी पत्नी निर्मल मिल्खा सिंह भी कोरोना संक्रमित हो गए थे, जिनका इसी माह देहांत हुआ।

चार बार के एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता मिल्खा सिंह ने 1958 के राष्ट्रमंडल खेलों में भी रजत पदक प्राप्त किया था। उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वर्ष 1960 के रोम ओलंपिक में था जिसमें उन्होंने 400 मीटर फाइनल में चौथा स्थान प्राप्त किया था। उन्होंने 1956 और 1964 ओलंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

उन्हें 1959 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था। मिल्खा सिंह और उनके बेटे गोल्फ़र जीव मिल्खा सिंह देश के इकलौते पिता-पुत्र की ऐसी जोड़ी है, जिन्हें खेल उपलब्धियों के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। अविभाजित भारत में जन्में उड़न सिख के नाम से प्रसिद्ध मिल्खा सिंह को दुनिया के हर कोने से प्यार और समर्थन मिला।

मिल्खा की प्रतिभा और रफ्तार से प्रभावित होकर उन्हें ‘फ्लाईंग सिख’ का खिताब तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खान द्वारा दिया गया था। आज जब बाज़ार और मीडिया ने खेल को उद्योग का दर्जा दे दिया है। ऐसे समय में सिंह हमारे लिए प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।

उन्होंने मूलभूत सुविधाओं के अभाव में भी भारत को पूरी दुनिया में सम्मान दिलाया लेकिन अब के खिलाड़ी खेलों को मात्र मनोरंजन और पैसा का स्रोत मान रहे हैं। तभी तो टेलीविज़न पर कोई हानिकारक कोको-कोला, तो कोई पेप्सी, तो कोई गुटखा का विज्ञापन कर रहा है। हमें इस पर विचार करना होगा।

क्या इस प्रकार के विज्ञापनों से खेल संस्कृति बनेगी। क्या खिलाड़ी इससे प्रेरित होंगे? मिल्खा सिंह केवल एक खिलाड़ी बनकर नहीं जिए। उन्होंने खेलों को देश के स्वाभिमान से जोड़ा। यहीं उनका सबसे बड़ा योगदान है।

यह अलग बात है कि वे युवा वर्ग में सचिन, विराट या धोनी की तरह चर्चित नहीं हुए और न सचिन की तरह भारत रत्न बने पर इतना ज़रूर है कि वे करोड़ों भारतीयों के दिलों में भारत के रत्न बनकर अवश्य गुंजायमान हुए।

उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यहीं होगी कि खेत-खलिहान की समृद्ध परंपरा के इस देश में धावक परंपरा को सींचित किया जाए ताकि देश का युवक स्वस्थ, समृद्ध बने और वैज्ञानिक प्रशिक्षण के माध्यम से पदक विजेता बनकर भी उभरे।

साथ ही सभी खेल एक समान है इसे उद्घोषित किया जाए। खेलों को ग्लैमर का पर्याय न माने, बल्कि खेल को समृद्ध सामाजिक परंपरा के अंग के रूप में प्रसारित करें। जय हिंद! मिल्खा सिंह को कोटि-कोटि प्रणाम। ॐ शांति।

डॉ साकेत सहाय भाषा-संचार-संस्कृति विशेषज्ञ एवं संप्रति वरिष्ठ प्रबंधक-राजभाषापंजाब नैशनल बैंक हैं।