श्रद्धांजलि
खुदीराम बोस ने माता-पिता के देहांत के बाद कैसे चुन ली स्वतंत्रता प्राप्ति की राह

पुराने ज़माने में धान से चावल निकालने के लिए उसे उखल में समाठ से कूटा जाता था। इस प्रक्रिया में चावल के दाने टूटते भी थे। इस टूटे हुए चावल को बिहार-बंगाल के इलाकों में “खुद्दी” कहा जाता है। दंपति को पहले भी दो बेटे हुए थे, मगर वे बचपन में ही चल बसे थे।

चार लड़कियाँ इस परिवार में थीं और जब 3 दिसंबर 1889 को बच्चे का जन्म हुआ तो माता-पिता को लगा कि कहीं ये भी असमय मृत्यु को न प्राप्त हो जाए! यमराज जब बेटे को लेने आएँ, तब कोई बेटा रहे ही न, ऐसा करने का एक नुस्खा तब के लोग इस्तेमाल करते थे।

तीन मुट्ठी “खुद्दी” (चावल) के बदले बच्चे को उसकी ही बड़ी बहन को बेच दिया गया। इस तरह चावल के बदले ख़रीदे गए बच्चे का नाम खुदीराम बोस पड़ा। बचपन में ही उनके माता और फिर पिता की मृत्यु हो गई थी। उनकी बड़ी बहन अपरूपा उन्हें अपने साथ ले आई और खुदीराम वहीं बड़े होने लगे।

जब 1902-03 के दौर में श्री औरोबिंदो और भगिनी निवेदिता मिदनापुर आए तो खुदीराम उनसे प्रभावित हुए। थोड़े ही समय में वे अनुशीलन समिति में सम्मिलित हो गए। वहाँ उनकी भेंट कोलकाता के बरिंद्र घोष से हुई।

ये वह दौर था जब अनुशीलन समिति मजबूती से अपने पाँव जमाती जा रही थी। इनकी विचारधारा बंकिमचंद्र जैसों के साहित्य से भी प्रेरित थी और अनुशीलन समिति के सदस्य खूब पढ़ते थे। नवंबर 1908 में ढाका अनुशीलन समिति की पुस्तकालय की जाँच में दिखा था कि भगवद्गीता सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली पुस्तक थी।

समिति के सदस्य होने की नियमावली में जो सात बिंदु थे, उनमें भगवद्गीता पूरी पढ़ी हुई होना भी था। भारत के इन क्रांतिकारियों की विचारधारा को बिगाड़ने के लिए अंग्रेज़ों ने बाद में जेलों में कम्युनिस्ट साहित्य रखवाना शुरू कर दिया था।

अनुशीलन समिति के सदस्य पहले से ही भारतीय लोगों के विरुद्ध अन्याय करने वाले मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड को मारने की योजना बना रहे थे। एक बार तो हर्बर्ट ब्रूम्स की लिखी पुस्तक कमेंटरीज ऑन द कॉमन लॉ के अंदर खोखली जगह बनाकर क्रांतिकारियों ने उसमें पिकरिक एसिड और डेटोनेटर लगाए।

ये बम वाली किताब परेश मल्लिक नाम के एक क्रांतिकारी ने कागज में लपेटकर अन्यायी किंग्सफोर्ड के घर भी पहुँचा दी थी। उन्होंने सोचा नहीं होगा कि अन्याय करने वाला किंग्सफोर्ड कानून की किताबें क्यों पढ़ता?

फिरंगियों ने किंग्सफोर्ड की उपनिवेशवाद को समर्थन के पुरस्कार और सुरक्षा के लिहाज़ से मार्च 1908 उसकी पदोन्नति करके उसे मुज़फ्फरपुर भेज दिया। उसके सामान के साथ ही वह बम भरी किताब भी मुज़फ्फरपुर पहुँच गई थी।

इस बार प्रफुल्ल चाकी एक साथी के साथ, किंग्सफोर्ड की हत्या की योजना बनाने मुज़फ्फरपुर पहुँचे। इलाके की देख-परख के बाद वे अप्रैल 1908 में कोलकाता लौटे। यहाँ उन्होंने हेमचंद्र से वे बम लिये जिसका उन्हें उपयोग करना था।

छह औंस डायनामाइट, डेटोनेटर, बत्ती वगैरह के साथ जब वे दोबारा मुज़फ्फरपुर पहुचे तो इस बार उनके साथ खुदीराम बोस भी थे। दोनों छात्र बनकर क्षेत्र की छानबीन करते रहे और अंततः 29 अप्रैल का दिन हमले के लिए तय हुआ।

अय्याश मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड उस दिन क्लब में ताश खेल रहा था। शाम 8.30 बजे के बाद जब वह लौटने लगा तो उसके साथ ही खेल रही प्रिंगल केनेडी की बीवी और बेटी एक दूसरी फिटन में थी। ये सवारी भी किंग्सफोर्ड की सवारी जैसी ही थी और इस वजह से प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस को धोखा हो गया।

जिस सवारी में उन्होंने बम फेंका, उसमें दोनों महिलाऐं बैठीं थी! घटना का समाचार रात ही में दूर-दूर तक फैल गया और पुलिस चौकन्नी हो गई। घेर लिए जाने पर प्रफुल्ल चाकी लड़े और जब गोलियाँ समाप्त हो गई, तो अंतिम गोली उन्होंने खुद को मारकर वीरगति पाई।

कई किलोमीटर पैदल चलकर आए खुदीराम पर दो पुलिसकर्मियों को संदेह हो गया और उसी समय उनके पास से एक छुपायी हुई पिस्तौल गिर पड़ी। एक सिपाही ने उन्हें पीछे से दबोच लिया। दो हट्टे-कट्टे ब्रिटिश सिपाही दुबले-पतले किशोर खुदीराम को पकड़ने में सफल हुए। उनके पास उस समय 37 गोलियाँ थीं!

मुकदमा चला और 8 जुलाई 1908 को फिरंगी अदालतों ने एक बार फिर अपने ही कानूनों की धज्जियाँ उड़ाई। धारा 364 कहती थी कि आरोपी से उसकी मातृभाषा में प्रश्न किए और उत्तर सुने जाएँ मगर खुदीराम बोस से अंग्रेज़ी में प्रश्नोत्तर करके उन्हें फाँसी की सज़ा दे दी गई।

किशोर वय के खुदीराम पर पकड़े जाने, या मृत्युदंड पाने से डर जैसा कुछ भी नज़र नहीं आता था। मगर इस सज़ा पर भारत भर में असंतोष फैला। (इसके बाद यतींद्रनाथ दास ने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियाँ कैसे जारी रखीं, जानने के लिए यह पढ़ें।)

अक्सर अंग्रेज़ों के पिट्ठू होने का आरोप झेलने वाले मोहनदास करमचंद गांधी ने उस समय भी वही किया था जिसकी उनसे अपेक्षा की जा सकती है। उन्होंने कहा था कि वे ऐसी हिंसक गतिविधियों के समर्थन में नहीं हैं और भारत को ऐसे स्वतंत्रता नहीं मिल सकती।

यह अलग बात है कि जब 1942 के दौर में वे कांग्रेस से वैचारिक मतभेदों के कारण अलग हो चुके थे तब के उनके “भारत छोड़ो” आंदोलनों में व्यापक हिंसा हुई थी और हिंसा करने वाले कई लोगों को उन्होंने शरण भी दी थी। (एक ऐसी ही घटना पर आधारित संस्मरण यहाँ पढ़ें।)

बाल गंगाधर तिलक ने खुलकर “केसरी” में खुदीराम बोस का समर्थन किया था और इस अपराध में उन्हें तुरंत गिरफ्तार भी कर लिया गया। वर्तमान में मुज़फ्फरपुर से करीब 25 मील दूर जिस वैनी नाम की जगह पर वे पकड़े गए थे, उसके रेलवे स्टेशन का नाम अब खुदीराम बोस पूसा स्टेशन है।

बिहार में स्थित उनकी यादों का बिहार की तमाम सरकारों ने जो स्वतंत्रता के बाद से अब तक के समय में किया है, उसपर कोई टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि कुछ बताने लायक किया ही नहीं गया है।

खुदीराम बोस को जब सज़ा सुनाई गई तो वे मुस्कुराए थे, जज ने उनसे पूछा भी था कि उन्हें सज़ा का मतलब समझ में आया भी है या नहीं? फाँसी के तख्ते पर चढ़ते वक्त भी वो मुस्कुराते हुए चढ़े थे। बिहार की सरकारों ने जो स्वतंत्रता सेनानियों के साथ किया, उसपर भी संभवतः वे बस मुस्कुरा ही देते।

बाकी जनता का भी दायित्व है कि वह इन अमर स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृतियों को अमर रखे, नई पीढ़ी से उनकी चर्चा करे। यदा कदा, या कम-से-कम उनकी पुण्यतिथि (11 अगस्त) पर उनकी यादों से धूल झाड़ देना तो बनता ही है!