श्रद्धांजलि
परसाई के नाम फैन मेल

एक समय था कि लेखक लिखा करते थे। न पुरस्कार पाने की जुगत बिठाते थे, न पुरस्कार लौटाने की राजनीति। खुश होते तो लिखते थे, नाराज़ होते थे तो लिखते थे, मन प्रफुल्लित होता था तब लिखते थे, मन डूब जाता था तब भी लिखते थे। विधि और शैली से इतर, लेखक सिर्फ लेखक होता था, निर्भीक और निरपेक्ष। उस युग में लेखक इस लिए लेखक नहीं होता था क्योंकि लिखना आसान व्यवसाय है।

लेखक इसलिए लिखता था क्योंकि लिखे बिना जीवन कठिन था। लेखक होना एक जीवन्त आत्मा का द्योतक था। व्यंग्य लेखन और भी अधिक कठिन था क्योंकि पकोड़े जैसी नाक और केले के छिलके पर फिसले भारी आदमी के विवरण से माहौल तो बदल जाता है, युग नहीं। व्यंग्य भी आत्मा रहित नहीं था, उसके अपने सामाजिक सरोकार थे। गालियों को व्यंग्य समझने के आलस से अभी समाज दूर था।

ऐसे में भले स्वयं हरिशंकर परसाई हिंदी व्यंग्य को अन्य विधाओं के समक्ष शूद्र विधा कह दें, सत्य यह है कि परसाई जी की लेखनी के स्पर्श मात्र से व्यंग्य लोकवाणी से देववाणी हो जाता था। अपनी पुस्तक ‘वैष्णव की फिसलन’ में परसाई जी लिखते हैं कि व्यंग्य की प्रतिष्ठा साहित्य में बढ़ी है और उसे शूद्र से क्षत्रिय मान लिया गया है। व्यंग्य साहित्य में ब्राह्मण बनना भी नहीं चाहता क्योंकि वह कीर्तन करता है। वह यह नहीं कहते कि उनके स्पर्श से व्यंग्य ब्राह्मण ही नहीं देवतुल्य हो गया है, परन्तु उनका हर श्रद्धालु पाठक यह कहेगा।

22 अगस्त 1924 को होशंगाबाद में पैदा हुए हरिशंकर परसाई मेरी दृष्टि में ‘मात्र’ एक व्यंग्य लेखक नहीं है, परसाई जी और उनसे छह वर्ष बाद पैदा हुए शरद जोशी भारत की नैतिक नियति की धुरी हैं। जब भी मैं अपने लेखन के मार्ग को लेकर आशंकित होता हूँ, इन्हें पढ़ने बैठ जाता हूँ। चार खाने की कमीज पहनने से इन महामानवों वाली तमीज़ और सामर्थ्य नहीं आएगी और ना ही वो धार आएगी जिससे ये कुशल शल्य-चिकित्सक की भाँति समाज के हर नासूर को पोछने को तत्पर रहते थे।

आज जहाँ स्व-घोषित बुद्धिजीवियों की भीड़ लगी है , परसाई जी सारे जीवन अपने को बुद्धिजीवी कपट से अलग रखने को संघर्षरत रहे। अपने गाल बजाने को तत्पर बुद्धिजीवियों को गिरते आकाश को रोकने के मुग़ालते में पाँव ऊपर किये हुई टिटहरियों में देखने की दिव्य दृष्टि परसाई को ही प्राप्त थी और स्वनामधन्य बुद्धिजीवियों की इससे बेहतर परिभाषा शायद इतिहास में कभी नहीं दी गई।

मुझ एकलव्य के द्रोण-द्वय में संभवतः शरद जी में बहाव अधिक था, परसाई जी में गहराई अधिक थी। ऐसा नहीं कि शरद जी हल्का लिखते थे, मार उनकी भी तेज़ और भाषा उनकी भी तीखी थी परन्तु जहां शरद जी मानसून की पहली फ़ुहार थे, परसाई गहरे मानसून में हफ़्तों निर्बाध बरसती बारिश थे जिसकी बूंदों को आप एक दोपहर खिड़की से कान लगा कर सुनने बैठें तो एक विचित्र से सम्मोहन में बँध जाएँ।

मैं कई बार सोचता हूँ कि वह क्या था जो परसाई को परसाई बनाता था। कुछ चीज़े उभर कर आती हैं – एक भेदक दृष्टि जो हर मिथ्यावरण के अंदर चतुराई से छुपा के रखे सत्य तक पहुँच जाए, भाषा का सम्मान और एक विस्तृत परिपेक्ष्य जो कहीं रामायण से सन्दर्भ लेता है, कहीं इतिहास से। इन सबसे बड़ी बात परसाई जैसे व्यंग्य लेखक के साहित्य में साँस लेती एक अत्यंत साहसी संवेदना।

मैं भी स्वयं को लेखक मानने की धृष्टता करता हूँ, इसलिए नहीं कि मैं बढ़िया लिखता हूँ, बल्कि सिर्फ इस बिना पर कि एक अतरंगी विचारशीलता मेरे भीतर भी है और कहीं लगता है कि में परसाई जी के प्रेत को छाती पर डाले घूमता हूँ। कला में वह निपुणता नहीं है न ही साहित्य में वह साहस, परंतु इस आयु में भी जब सोचता हूँ कि आगे क्या बनूँगा तो मन में एक छवि आती है जिसमे परसाई और शरद जोशी आपस में कहीं एक हो जाते है और कभी लगता है दोनों देख के कहते होंगे ‘क्या पिद्दी क्या पिद्दी का शोरबा’ और ज़ोर का ठहाका लगाते होंगे।

शायद यह विरोधाभास हर युग में रहा है। एक संकोच, एक स्वयं के प्रति अविश्वास हर युग में रहा है। परसाई जी भी इस उहापोह से अछूते तो नहीं रहे थे। आज जब राजनैतिक पूर्वाग्रह साहित्यिक सत्यनिष्ठता को डिगा रहा है, परसाई जी कितनी पारदर्शिता से यह प्रश्न उठाते हैं जब अपने लेख ‘लेखक: संरक्षण, समर्थन और असहमति’ में वे लिखते हैं- “सरकार का विरोध करना भी सरकार से लाभ लेने और उससे संरक्षण प्राप्त करने की एक तरकीब है। … सवाल यह है कि लेखक अपने को जन आंदोलन से जोड़ता है या नहीं। जोड़ता है तो वह हर जन आंदोलन में साथ देगा वरना कमरे में बैठ कर कविता लिखेगा – कि हम तो मर गए हैं, हम सूअर हैं , हमारी मरण तिथि यह है (हालाँकि ठाठ से जी रहे हैं)।”

आज जब हर व्यवसाय के दल और एसोसिएशन बन गए हैं जिसका सदस्य होने के लिए वैचारिक समरूपता पहली शर्त है, कौन लेखक ऐसा लिख सकेगा। परसाई जी को एक साहित्यकार के इलीट घेरे से निकाल कर आम आदमी का व्यंग्यकार बनाने के पीछे यही साहस है।

और यह हो गया जैसी बात नहीं है, परसाई जी हर समय व्यवहार और लेखन में स्वयं को इस बुद्धिजीवी गिरोह की गिरफ्त से बाहर निकालने के संघर्ष में लगे रहे। अपने लेख ‘सम्मान और फ्रैक्चर’ में इसी वैरागी अल्हड़पन के साथ परसाई लिखते हैं- “सम्मान से आत्मा में मोच आती है, पुरस्कार से व्यक्तित्व में फ्रैक्चर होता है।”

जहाँ साहित्य के मठाधीश आम जनता के हिज्जे की त्रुटियों को सार्वजनिक कर के अट्टहास करते है और उनकी भाषायी निर्धनता पर फिकरे कसते हैं, ऐसे समाज में परसाई जैसा विराट व्यक्तित्व साहित्यकार एक ताज़ी हवा सा आभासित होता है जो सहज है, स्नेही है, अहंकारहीन है, प्राप्य है। परसाई जी का अध्ययन ऐसे आचार्य का आश्रम दिखता है जिसमे पहली बेंच पर गुरुदेव एकलव्य को स्वयं बुला कर स्नेहपूर्वक बिठा लेते हों। आज परसाई जी होते तो भाषा के इन राजनैतिक मठाधीशों को दो नाक वाले लोग ही कहते।

मैंने परसाई जी से बहुत कुछ सीखा है। चोरी से, जो उन्हें भी पता नहीं मुझे भी नहीं। यह लेख लिखते समय सोचा था कि उनके लेखन पर लिखूँगा परंतु अपनी अयोग्यता से बाध्य होकर कुछ ऐसा ही लिख पाया हूँ जैसा युवतियाँ भावातिरेक में एक समय राजेश खन्ना के लिए लिखा करती थीं। समय पाठक का व्यर्थ हुआ इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ परंतु अपनी सीमित योग्यता को मुझे भी झेलना है, और आपको भी।

परसाई एक जगह अपने लेखक होने का स्पष्टीकरण देते हुए कहते हैं- “कुछ वर्षों में साहित्य के और मेरे साथ एक दुर्घटना हुई- मैं लेखक मान लिया गया। … दूसरी दुर्घटना हुई – मुझे व्यंग्य लेखक माना जाने लगा और यह कहा जाने लगा कि मैं हिंदी में व्यंग्य के अभाव को दूर कर रहा हूँ। तीसरी दुर्घटना हुई – कहा जाने लगा की मैं सामाजिक चेतनासम्पन्न लेखक हूँ। मैंने इसे भी मान लिया।”

कमोबेश ऐसी ही दुर्घटनाएँ मेरे साथ भी घटित हुई और जहाँ परसाई जी साहित्य के थानेदार हुए मैं थानेदार साहब की खैनी ठोंकने वाला कांस्टेबल हो गया। इसी उत्साह में काबिलियत से ऊपर का यह लेख लिखने में फँस गया। मेरे लिए परसाई एक लेखक उतने ही महत्वपूर्ण रहे जितने उनके लेख। जो लेखक ‘साहित्यकार का साहस’ सरीखे लेख लिख गया हो उससे शैली और कला से इतर सत्य और साहस सीखने की बात है।

भाषा, शैली और कला अवश्य सीखें परसाई से, पर इस सबसे अधिक यह सीखें जो परसाई लिखते हैं- “साहित्य हमारे यहाँ व्यापार कभी नहीं रहा है, धर्म रहा है। अभी भी वह धर्म है, मिशन है। इसमें मिटना पड़ता है। जो इसमें ‘बनना’ चाहते हैं वो बेहतर हैं आढ़त की दुकान खोलें। इसमें तो कबीर की तरह घर फूँक कर बाहर निकलना पड़ता है; यह खाला का घर नहीं है।” परसाई ने भी घर जलाया, सरकारी स्नेह से वंचित रहे और उस अग्नि के प्रकाश में आज भी साहित्य जगत आलोकित है।