श्रद्धांजलि
धर्मपाल भारत को भारत की नज़र से देखकर मानसिक दासता से मुक्त करने वाले विद्वान

19 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर में जन्में धर्मपाल एक ऐसे शोधकर्ता, विचारक, इतिहासकार थे जिन्होंने जीवनभर भारत के गौरवमयी इतिहास पर अभूतपूर्व शोध किया।

शताब्दियों की गुलामी के अंधकार में जब विदेशी आततायी हमारे वैभव को धुंधला करने का कुत्सित षड्यंत्र रच हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा को धूमिल कर रहे थे, हमारी नस्लों को आधुनकिता की गोली खिलाकर भारतीय गौरव को सुलाने के प्रयास कर रहे थे, उस समय अंधकार से भरे आकाश में धर्मपाल के रूप में एक ऐसी कौंध चमकी जिसने पश्चिमी श्रेष्ठता के कुहासे को छाँटकर भारतीय मूल्यों का प्रगटीकरण किया।

धर्मपाल ने उस समृद्ध भारत से हमारा परिचय करवाया जो अंग्रेज़ों के आने से पहले था। हमारा साक्षात्कार उस भारतीय वैभव से करवाया जिसके छींटे तक आक्रांताओं ने इतिहास के पन्नों पर पड़ने नहीं दिए। उनकी लिखीं किताबें हमें झकझोरती हैं, हमें नींद से जगाती हैं, जाग्रत करती हैं। वे भारतीय चेतना की जाग्रत अभिव्यक्ति हैं।

उन्होंने अपने दस्तावेजों और शोधों से प्रमाणित किया कि विदेशियों के हमारी संस्कृति पर अतिक्रमण से पहले भारत वैश्विक सिरमौर था। उसकी सांस्कृतिक-सामाजिक बुनावट बेहद दृढ़, आधुनिक और लोक कल्याणकारी थी।

फिर एक विराट राक्षसी अमानुषी सभ्यता की काली छाया इस देश की समृद्धि और संस्कृति पर पड़ी। अंग्रेज़ों ने हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, व्यावसायिक और शैक्षिक सभी व्यवस्थाओं को तोड़कर नई पद्धति की रचना की जिसके कारण भारत दरिद्र हो गया। हमारी मौलिकता और सृजनशीलता कुंठित हो गई। लोगों का आत्मसम्मान और गौरव नष्ट हो गया।

धर्मपाल की पुस्तकों में इन सभी प्रक्रियाओं का क्रमबद्ध विस्तृत निरूपण किया गया है- अंग्रेज़ भारत में आए, उसके बाद उन्होंने सभी व्यवस्थाओं को तोड़ने के लिए किन चालबाज़ियों को अपनाया, कैसा छल और कपट किया, कितने अत्याचार किए और किस प्रकार धीरे-धीरे भारत टूटता गया।

इसका अभिलेखों के प्रमाणों सहित विवरण उनके ग्रंथों में मिलता है। यह उनके लगभग 40 वर्षों के अध्ययन और शोध का प्रतिफल है। इंग्लैंड के और भारत के अभिलेखागारों में बैठकर रात-दिन उसकी नकल उतार लेने का परिश्रम एक अध्ययनशील और विद्वान व्यक्ति ही कर सकता है।

गांधी-युग में जन्मे धर्मपाल वरिष्ठ गांधीवादी विचारक एवं चिंतक रहे। आजीवन गांधी के सिद्धांतों पर चलने वाले धर्मपाल वैचारिक स्वतंत्रता के पक्षधर थे। उन्होंने कई रचनात्मक आंदोलनों में अपनी सहभागिता दी। धर्मपाल ने हिंदुस्तान में विज्ञान के इतिहास, पुराने समाज और लोगों के बारे में काफी लिखा।

भारत से लेकर ब्रिटेन तक लगभग 40 साल उन्होंने इस बात की खोज में लगाए कि अंग्रेज़ों से पहले भारत कैसा था। इसी कड़ी में उनके द्वारा जुटाए गए तथ्यों, दस्तावेजों से भारत के बारे में जो पता चलता ,है वह हमारे मन पर अंकित तस्वीर के उलट है। अंग्रेज़ों ने भारत के विषय में जो लिखा वह हमारे मन-मस्तिष्क पर इस प्रकार छाया है कि उससे अलग या उससे विपरीत कुछ भी लिखा जाने पर हम उसे सत्य मानते ही नहीं हैं। इसलिए धर्मपाल ने अपनी किताबों में प्रत्येक छोटी-छोटी बात का भी प्रमाण प्रस्तुत किया है। यह काम केवल वे ही कर सकते थे।

हम स्वयं को नहीं जानते, अपने इतिहास को नहीं पहचानते, स्वयं को हुई हानि को नहीं जानते। हम अज्ञानियों के स्वर्ग में रहते हैं। यह स्वर्ग भी अपना नही हैं। उस स्वर्ग में भी हम गुलाम हैं और पश्चिमोन्मुखी पराधीन बनकर रह रहे हैं।

आज हम पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण में पागल हुए जा रहे हैं। स्वतंत्र भारत में भी यूरोप अमेरिका की तरफ मुँह लगाए बैठे हैं। यूरोप के अनुयायी बनना ही हमें अच्छा लगता है। यूरोपीय या यूरोपीय जैसा बनना ही आज हमारी आकांक्षा बन गई है। ये सब मैकॉले की शिक्षा पद्धति का असर है जिसके कारण हमें गुलामी रास आने लगी है।

धर्मपाल की किताबें जनमानस को इस भ्रम के कुहासे से बाहर निकालती हैं, उनमें भारतीयता के बीज बोकर भारत के लिए योग्य हज़ारों साल पुरानी परंपराओं, व्यवस्थाओं और पद्धतियों को पुनः प्रतिष्ठित करने का प्रयास करती हैं। धर्मपाल भारत को एक भारतीय की नज़र से देखते थे, न कि एक अंग्रेज़ की नज़र से।

हमें अध्ययन करना होगा स्वयं का, अपने इतिहास का और अपने समाज का। भारत को तोड़ने की प्रक्रिया को जानना समझना होगा। भारत का भारतीयत्व क्या हैं? यह पहचानना होगा। हमें उसका मूल्यांकन पश्चिमी मापदंडों से नहीं वरन् भारतीय दृष्टि से करना होगा। तभी भारत अपने अतीत के वैभव को प्राप्त कर स्वर्णिम भविष्य को प्राप्त कर सकेगा। हमें देश को पश्चिमी मानसिकता की गुलामी से स्वतंत्र कर समृद्ध और सुसंस्कृत बनाना है ताकि भारत फिर एकबार विश्व गुरु बन पाएँ। धर्मपाल इसके लिए जीवनपर्यंत परिश्रम करते रहे।