श्रद्धांजलि
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की विरासत क्यों भुलाई जा रही है? ‘शहनाई अब गूंजती नहीं’

चार में से तीन शहनाइयाँ तो चांदी की थीं। जो कहीं चांदी की ना भी होतीं तो भी चारों शहनाइयाँ बेशकीमती थीं– भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की जो थीं! लिहाजॉा पुलिस ने स्पेशल टास्क फ़ोर्स का गठन किया और सुरागों की खोजबीन शुरू हुई।

रिपोर्ट के मुताबिक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के बेटे काज़िम हुसैन जब घर लौटे थे तो उन्हें ताला टूटा हुआ मिला था और शहनाइयाँ गायब थीं। इसी सिलसिले में 5 दिसंबर 2016 को एफआईआर हुई थी। करीब एक महीने की खोजबीन के बाद पुलिस ने 10 जनवरी 2017 को इस मामले को सुलझा लेने का दावा किया।

तीन लोग गिरफ्तार हुए थे जिनमें से दो तो पेशे से सुनार थे और उन्होंने वे शहनाइयाँ चांदी की देखकर खरीदी थीं। चोरी करने वाला नज़रे हसन खुद काज़िम हुसैन का बेटा और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का पोता था। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को ये तीन चांदी की शहनाइयाँ पीवी नरसिम्हा राव, लालू प्रसाद यादव, और कांग्रेसी कपिल सिब्बल ने भेंट की थीं।

इन तीनों शहनाइयों को चांदी के लिए पिघला दिया गया था और वह 1 किलोग्राम के लगभग चांदी भी पुलिस ने बरामद कर ली थी। चौथी पूरी चांदी की नहीं थी, उसका सिर्फ चांदी का प्लेट उखाड़ा गया था। विरासत के ख़त्म होने की दास्तानें अजीब होती हैं।

बिहार के बक्सर (डुमराँव) से वाराणसी जाकर बस गए शिया मुस्लिम उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई कोई मामूली चीज़ नहीं होती। संविधान लागू होने पर 1950 में जब भारत गणतंत्र घोषित हुआ था, उस दिन उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने लाल किले पर शहनाई बजाई थी।

उनकी ये शहनाइयाँ कुल 17,000 रुपये के लिए पिघलाकर उनके ही पोते द्वारा बेच दी गई। भारत रत्न से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की विरासत के लिए इतना काफी नहीं था। अभी और चोट पड़नी बाकी थी। उनका वाराणसी का मकान भी खस्ताहाल था और उसे तुड़वाकर मरम्मत की बात हुई।

परिवार में नए निर्माण को लेकर विवाद गहराया और आखिर तय हुआ कि किसी बिल्डर को देकर पूरा मकान ही गिरवा दिया जाए और उसकी जगह नई ईमारत खड़ी हो। काम शुरू हो चुका था कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की दत्तक पुत्री सोमा घोष को इसका पता चल गया।

उन्होंने वाराणसी विकास प्राधिकरण और नगर के डीएम से इसकी शिकायत की और निर्माण को नक्शा पास होने तक रोक दिया गया है। सोमा घोष और उस्ताद के दूसरे चाहने वाले इस मकान को संग्रहालय बनाना चाहते हैं।

उनकी पुण्यतिथि (21 अगस्त) के इतने करीब उनके मकान का टूटना कुछ ख़ास अच्छा भी नहीं लग रहा था। 1980-90 तक के दशक में शास्त्रीय संगीत से जुड़े लोगों का बिहार से अच्छा संबंध रहता था। दुर्गा पूजा के अवसर पर लगभग हर कलाकार पटना में किसी न किसी पंडाल पर प्रस्तुति देने अवश्य पहुँचता।

समाजवाद के आने के साथ ही ये परंपरा जाती रही। पिछले 25 वर्षों में कोई भूले-भटके भी इधर पहुँचा हो तो याद नहीं आता। बक्सर में जन्मे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के लिए सरकार कुछ करेगी, ऐसा सोचना भी मज़ाक लगता है।

कलाकारों की और दुर्दशा देखें तो जिस आखिरी संस्कृति मंत्री का नाम आता है, वे स्तरहीन भोजपुरी गीत लिखने के लिए जाने जाते थे। जानी-मानी ध्रुपद विधा में एक दरभंगा घराना भी हुआ करता था (अब भी है), लेकिन स्थानीय राजनीति ने कभी उनकी बात उठाई हो, ऐसा याद नहीं आता।

हालाँकि मिथिलांचल आंदोलन के तौर पर राजनीति 100 वर्षों से जारी है, लेकिन वहाँ संस्कृति शायद पाग पहनने तक ही सीमित हो चुकी है। खान-पान, लेखन, कृषि, परंपराओं, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भी संस्कृति होती है, ये शायद लोग वैसे ही भूल चुके हैं, जैसे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को।

बाकी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के बारे में पढ़ना हो तो यतींद्र मिश्र की एक पतली-सी पुस्तिका आती है (सुर की बिरादरी)। कुछ साक्षात्कार और संस्मरण जैसे लेखों का 100-1150 पन्नों का संकलन है। कभी इस ओर ध्यान जाए तो देखिएगा!

अगर शहनाई की बात होती है तो उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का ज़िक्र इसलिए आता है क्योंकि उनसे पहले तक शहनाई मंचों से सुनाई नहीं देती थी। शायद बीच के दौर में कुछ लोग इसे ओछा मानने लगे थे, या बजाने वाले ही कम रहे होंगे।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान शहनाई को मंचों तक ले आने के लिए विख्यात हुए। शायद यही वजह थी कि 2001 में एमएस सुब्बुलक्ष्मी और पंडित रविशंकर के बाद शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र के वे तीसरे ही व्यक्ति थे जिन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

कला जगत में उनका महत्त्व इतना था कि वे विद्यालयी पाठ्यक्रम में भी पढ़ाये जाते रहे। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जन्मे अवश्य बक्सर में थे लेकिन उनकी शहनाई वादन की शिक्षा और अभ्यास सब बनारस में हुआ। उनके मामा उस्ताद अली बख्श ‘विलायतु’ खान वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े थे।

बचपन में ही उन्हें तालीम के लिए उनके मामा के पास भेज दिया गया, इस वजह से बिहार और उत्तर प्रदेश दोनों जगहों पर लोग उन्हें अपना मानते हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान 14 वर्ष की आयु में प्रयागराज के संगीत के आयोजनों में वादन करने लगे थे लेकिन ऐसा माना जाता है कि जब उन्होंने 1937 में कोलकाता में आल इंडिया म्यूजिकल कांफ्रेंस में प्रस्तुति दी, तो वे शहनाई को मुख्यधारा के वाद्ययंत्रों में ले आए।

उन्होंने 1947 में भारत की स्वतंत्रता के अवसपर पर लाल किले से भी प्रस्तुति दी थी। 1997 में भारत की स्वतंत्रता के 50 वर्ष पूरा होने पर भारत सरकार ने उन्हें पुनः लाल किले पर शहनाई बजाने के लिए आमंत्रित किया था और इस प्रकार दो स्वतंत्रता दिवसों पर लाल किला उनकी शहनाई से गूंजा था।

आज अगर ये सोचा जाए कि ऐसे विख्यात संगीतकार को उनके गुज़रने के थोड़े ही समय में लोग भूलने क्यों लगे हैं, तो शायद यह कहना होगा कि वे शिष्य ना के बराबर बनाते थे। उनका कहना था कि वे सरस्वती के उपासक हैं और शिव के वरदान से शहनाई बजाते हैं!

ऐसे में वे शिष्यों को कुछ विशेष नहीं सिखा पाएँगे, इसलिए उन्होंने बहुत कम शिष्य बनाए। आज उनके शिष्यों में प्रमुख नाम कृष्णा बल्लेश और प्रकाश बल्लेश हैं। अपने दौर में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपनी तुनकमिजाजी और हवाई यात्राओं से डर के लिए भी जाने जाते थे।

ऐसा कहा जाता है कि उनकी तमन्ना थी कि वे कभी इंडिया गेट से वीरगति को प्राप्त जवानों की याद में बजाएँ। उनकी यह इच्छा उनके साथ, अधूरी ही चली गई। कल उनकी पुण्यतिथि थी और शायद कुछ कोनों से उनकी याद में कुछ सुनाई दिया होगा।

अगर ऐसा कुछ सुनाई-दिखाई दे तो एक बार यह भी सोचिएगा कि हमने अपनी शास्त्रीय संगीत की धरोहरों का किया क्या है। हो सकता है लोग इस बारे में सोचने-बातें करने लगें तो कल को कुछ बदलाव भी हो जाए!