श्रद्धांजलि
बाबा बंदा सिंह बहादुर जिनकी क्रांति के बाद मुग़ल साम्राज्य कभी पुनर्स्थापित नहीं हो सका

इस सप्ताह 9 जून बीता। 305 वर्ष पूर्व इसी दिन ‘बंदा सिंह बहादुर’ की हत्या कर दी गई थी। कहा जाता है कि बाबा बंदा की हत्या से पूर्व उन्हें इस्लाम कबूलने को कहा गया किंतु जब उन्होंने अस्वीकार कर दिया तो उनके बेटे अजय को मारकर उसका मांस बाबा के मुँह में डाल दिया, पश्चात उनकी आँखें निकाल ली गईं, फिर चमड़ी उधेड़ी गई, फिर एक-एक कर शरीर के अंग काटे गए और अंत में शीश काट दिया गया।

भारतीय इतिहास में ‘बंदा सिंह बहादुर’ का अध्याय मुग़लों के विरुद्ध शौर्य एवं त्याग की एक महान् गाथा है किंतु अभी तक इसे वह महत्ता प्राप्त नहीं हुई है जो होनी चाहिए थी। इसका सबसे बड़ा साक्ष्य है कि सिख इतिहास के इतने वर्षों में 2016 में पहली बार उनका जन्मदिन मनाया गया।

बंदा के जीवन को समर्पित एक पुस्तक के विमोचन के समय ‘बाबा बंदा सिंह बहादुर इंटरनेशनल फाउंडेशन’ के अध्यक्ष कृष्ण कुमार बावा ने बताया था, “1989 में लुधियाना में बाबा बंदा सिंह बहादुर का एक समागम किया था। तब हैरानी ये जानकर हुई थी कि पानीपत की हारी हुई तीन लड़ाई का उल्लेख तो विद्याली पाठ्यक्रम में है और सिख इतिहास में जिस व्यक्तित्व ने इतनी अहम भूमिका निभाई थी, उसका ज़िक्र कहीं भी नहीं।”

इसका मुख्य कारण है कि मुस्लिम इतिहासकारों. जोकि स्वयं ही मुसलमान शासकों के संरक्षण में थे, ने ‘बंदा सिंह बहादुर’ को ‘इस्लाम का दुश्मन’ बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्होंने विशेष तौर पर बढ़ा-चढ़ाकर कहानियाँ लिखीं और यह प्रयत्न किया कि मानवता के नाम पर मुसलमानों के साथ-साथ हिंदू एवं सिख भी बंदा से घृणा करने लगे।

जबकि वास्तविकता तो यह है कि बाबा का आंदोलन दबे-कुचलों और किसानों से जुड़ी एक ऐसी क्रांति थी जिसके बाद मुग़ल साम्राज्य कभी पुनर्स्थापित नहीं हो सका। हिस्ट्री ऑफ़ पंजाब में थोर्नटन ने लिखा है, “बंदा का आंदोलन स्पष्ट तौर पर एक किसानों से जुड़ी क्रांति थी, न कि इस्लाम-विरोधी जिहाद।”

बंदा सिंह बहादुर का उदय

जब गुरु गोबिंद सिंह बहादुर शाह से न्याय की उम्मीद खो चुके थे तब उन्होंने लछमनदास नामक एक संन्यासी को सिखों का नेतृत्व करने के लिए चुना और उन्हें नया नाम दिया ‘बंदा’। यूँ तो गुरु गोबिंद सिंह के साथ कई बहुत पुराने और विश्वासप्रद शिष्य थे किंतु उन्होंने अनजान से लछमनदास को ही क्यों चुना इस विषय में अधिक स्पष्टता नहीं है।

बंदा का जन्म राजौरी के एक राजपूत परिवार में हुआ था और वे छुटपन में ही बैरागी साधुओं की टोली में जा मिले और कईं वर्षों तक दक्षिण भारत के हिंदू मठों में ही रहे। गुरु ने बंदा को सबसे पहले उन लोगों को दंडित करने का कार्य सौंपा जिन्होंने सिखों पर अत्याचार ढाए थे और गुरुपुत्रों की हत्याएँ की थी। खालसापंथ में आने के पश्चात बंदा के लक्ष्य की झलकी ज्ञानी ज्ञान सिंह के ‘पंथ प्रकाश’ में इस प्रकार मिलती है-

“मैं जो गुरु का बंदा, गुरु ने मुझे पठाया, तुर्कों से लेने को बदला।”

कुछ ही समय में बाबा बंदा पूरे सनातनी समाज के सेनानायक बन गए। उस समय यदि कोई भी चोरों, डाकुओं, लुटेरों एवं कठमुल्लों से प्रताड़ित होता तो वह बंदा की शरण में चला जाता। इस दौरान भारी संख्या में मुसलमानों ने भी इस्लाम धर्म छोड़ा और बंदा के साथ खड़े हो गए।

तब वज़ीर खान ने मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को भड़काकर बंदा के आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया। उसने मुल्ला-मौलवियों को तैयार किया कि वे काफिरों के विरुद्ध जंग छेड़ें और आम-मुसलमानों को भड़काना शुरू किया कि यदि बंदा जीत गया तो मुसलमान-कौम बर्बाद हो जाएगी।

इस तरह बंदा के जट्ट किसानों की सेना और वज़ीर खान के गाज़ियों की सेना के बीच एक युद्ध आरंभ हुआ जहाँ खान की सेना में अत्याधुनिक तोपों और बंदूकों से लैस सिपाही थे, वहीं बंदा की सेना में हथियारों के नाम पर मात्र खेतीबाड़ी में काम आने वाले औजार ही थे। बावजूद बंदा की सेना ने मुग़लों को धूल चटा दी।

1710 के सरहिंद के युद्ध में खान मारा गया और उसकी सेनाओं का नैतिक बल चकनाचूर हो गया। लड़ाई समाप्त होते-होते मुग़ल फौजों और गाज़ियों का खात्मा हो चुका था। इस विषय में मोहम्मद हाशिम ख़फ़ी खान ने अपनी पुस्तक ‘मुन्तखीबुललुबाब’ में लिखा है, “इस्लाम सेना का एक भी सिपाही तन पर पहने कपड़ों के सिवा कुछ भी लेकर, जान बचा, भाग नहीं सका।”

इस युद्ध के बाद एक संन्यासी बंदा, जो सेनानायक बना वह अपने तीसरे अवतार में ‘पादशाह’ बन गया। उन्होंने अपनी विजय से एक नई पंचांग जारी की और शासन के प्रतीक स्वरूप नए सिक्कं बनवाए जिनपर गुरु नानक और गुरु गोबिंद सिंह के नाम थे।

तत्कालीन समय का उल्लेख करते हुए खुशवंत सिंह अपनी पुस्तक अ हिस्ट्री ऑफ़ द सिख्स में लिखते हैं, “यमुना से लेकर रावी और उसके पार, अगर किसी आदमी का जोर था तो वह बंदा ही था और यदि किसी की सत्ता की इज्ज़त थी, तो वह किसान फौजें ही थीं। उन सौभाग्यशाली दिनों में यदि बंदा ने थोड़ा और जोखिम उठाया होता तो उसने दिल्ली और लाहौर को भी जीत लिये होते और इतिहास की पूरी दिशा ही बदल दी होती।”

अंत

1715 में जब फार्रुख सियार बादशाह बना तो उसने अपने सबसे चुस्त अफसर अब्दुस समद खान को बंदा के सामने किया। एक बड़े संघर्ष के बाद समद खान की सेना ने बंदा को गुरदासपुर नंगल में घेर लिया और टापू के बाहर ही ऊँची-ऊँची दीवाले बनवाकर लगभग 30,000 सैनिकों की घेराबंदी लगा दी।

आठ महीनों तक यह घेराबंदी लगी रही और जब भूख-प्यास से बंदा और उनके सैनिक कमजोर हो गये तो उन्हें छल से बंदी बनाकर लाहौर से दिल्ली ले जाया गया। बाबा एवं उनके सैनिकों के साथ उनके मृत सैनिकों के कटे हुए मस्तकों से लदी बैलगाड़ियाँ भी ले जाई गईं।

5 मार्च 1716 को बंदा के साथियों का कत्लेआम शुरू हुआ और एक सप्ताह तक चलता रहा। वहाँ उपस्थित बंदा का हरेक सिपाही अपनी मौत को यूँ गले लगा रहा था कि मानों माँ की गोद में जा रहा हो! यह कोई छोटी बात नहीं है कि मृत्यु को सामने पाकर भी किसी भी सैनिक ने इस्लाम नहीं स्वीकारा।

बाबा बंदा के सामने भी इस्लाम कबूलने की शर्त रखी गई किंतु मना कर देने पर उनकी आँखों के सामने ही पुत्र अजय सिंह के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए और असंख्य यातनाओं के पश्चात 9 जून 1716 को उनकी भी हत्या कर दी गई। बंदा सिंह बहादुर, एक राजपूत जिन्होंने आध्यात्म के लिए संन्यासी बनना चाहा, फिर सिखों के उत्थान के लिए शस्त्र उठाए और मुग़ल साम्राज्य के अंत की कब्र खोद दी।