विचार
मोहम्मद इतिहास या मिथक? नुपुर शर्मा को धमकाने से पहले इस्लामिक संसार तय करे

नुपुर शर्मा के मोहम्मद, जिन्हें मुस्लिम अपना पैगंबर मानते हैं, पर बयान को विवादास्पद मानकर उन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से निलंबित कर दिया गया। प्रश्न है कि क्या सच में शर्मा का बयान विवादास्पद है?

इसके उत्तर की पड़ताल पाठकों को अपने स्तर पर भी करनी चाहिए। इसके लिए इस्लामिक पुस्तकों का थोड़ा-सा वैज्ञानिक अध्ययन ही पर्याप्त जानकारी दे सकता है। ऐतिहासिक तथ्यों से शर्मा के बयान को झुठलाना शायद संभव नहीं था, इसलिए उनकी हत्या की ‘मजहबी-सुपारी’ दी गई।

मतांध लोगों की प्रतिक्रियाएँ ‘सर तन से जुदा’ के नारों के साथ आईं, वहीं भाजपा ने उन्हें दल से बाहर निकालकर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्हें दल से बाहर निकाला जाना उतने महत्व की बात नहीं है, जितना यह कि उन्हें इस्लामिक देशों के दबाव में आकर निकाला गया। यह लज्जा का विषय है।

और तो और माननीय उपराष्ट्रपति का क़तर में अपमान (उनका रात्रिभोज रद्द किया जाना) भी भारतीय अस्मिता को तार-तार करने वाला है। इससे प्रधानमंत्री के सलाहकार मंडल की योग्यता पर प्रश्न खड़े हो जाते हैं। मोदी सरकार एक ओर स्वयं को ‘सेक्युलर राष्ट्र’ के रूप में प्रस्तुत करती है, तो दूसरी ओर मतांधता के दबाव में झुक भी जाती है।

लेकिन इस विवाद में सबसे अहम् बात यह है कि हम ‘मजहब’ को किस रूप में देखते हैं? क्या यह हमारे लिए एक इतिहास है या फिर मिथक? इतिहास अतीत की एक पड़ताल है। और इस पड़ताल में हम वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का सहारा लेते हैं।

यह वैज्ञानिक प्रक्रिया आलोचनात्मक भी हो सकती है। और यह आलोचनात्मक ही होनी चाहिए। तभी जाकर एक अर्थपूर्ण इतिहास खोजा जा सकता है। इसमें हम ऐतिहासिक घटनाओं और पात्रों की विविध व्याख्या करते हैं।

अर्थात, इतिहास जन-भावनाओं को देखकर नहीं लिखा-कहा जाता। यह तथ्यों और प्रमाणों का अभिलेख होता है। गांधी, नेहरू, पटेल, तिलक आदि की आलोचना होती है, चूँकि वे इतिहास के नायक हैं। उनके जीवन के भी स्याह पक्ष हो सकते हैं। उनकी वैज्ञानिक आलोचना से किसी की भावना आहत नहीं होती। और होनी भी नहीं चाहिए।

वहीं दूसरी तरफ मिथक हैं, जो मात्र कल्पित विचारों और मान्यताओं पर टिके होते हैं। इनका वैज्ञानिकता से कोई संबंध नहीं होता। इनमें आलोचना और तर्कपूर्ण विवेचना के लिए भी कोई स्थान नहीं होता। इनके पात्र और घटनाएँ भी इतिहास में अनुपलब्ध माने जाते हैं। यहाँ केवल भावनाएँ है, विश्वास हैं, इसलिए इतिहास के नियम यहाँ लागू नहीं होते।

पुनः प्रश्न है कि हम इस्लाम को क्या मानें? इतिहास या मिथक? अगर इसे हम मिथक मानते हैं तो इस्लाम पर की गई टिप्पणी को ‘मजहबी’ भावनाओं को आहत करने वाला माना जा सकता है। लेकिन इसके साथ ही इस्लाम के सभी ‘तारीखी’ दस्तावेज ध्वस्त हो जाएँगे।

मोहम्मद का जीवन और उनका उपदेश सबकुछ इतिहास से स्वतः मिटा हुआ माना जाएगा। फिर क़ुरान एक आसमानी किताब भी होगी। और मोहम्मद एक ईश्वरीय संदेशवाहक भी। फिर इस्लामिक कैलेंडर और इनके त्यौहारों का भी तारीखी महत्व नहीं रह जाता।

विडंबना है कि इस्लामिक संसार के लोग अबतक तय नहीं कर पाए हैं कि वे मोहम्मद को किस रूप में देखें? इतिहास के एक नायक के रूप में जिन्होंने अरबी “जहालियत” (मेरा ऐसा मानना नहीं) को ज्ञान का प्रकाश बाँटा या फिर एक मिथकीय पात्र जिनका कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं- वे कल्पना मात्र हैं!

दावा किया जाता है अरबी संसार ने पहली बार क़ुरान के रूप में किसी पुस्तक को देखा था। संभवतः इसी कारण उन्होंने इस पहली किताब को अंतिम और आसमानी मान लिया होगा। और तब से इसे इतना ‘पाक’ बना दिया कि इसे इतिहास और मिथक दोनों ही रूपों में समझ लिया। या यूँ कहें कि इतिहास और मिथक के अंतर को वे आजतक समझ ही नहीं पाए।

एक तरफ वे इसके तारीखी दस्तावेजों का हवाला देते हैं और दूसरी तरफ इसकी व्याख्या का विरोध करते हैं। इसपर किसी प्रकार की टीका भी अपराध है। और इस अपराध के लिए मृत्युदंड तो सामान्य है। इस्लामी संसार दो विपरीत विचारों के बीच उलझा हुआ संसार है। इतिहास और मिथक के अंतर से वे अबतक निकल नहीं पाए हैं।

उपरोक्त संदर्भ में अब ईशनिंदा पर विचार करते हैं। हम देखते हैं कि शर्मा की टिप्पणी ऐतिहासिक संदर्भों की है। उनके लिए इस्लाम एक इतिहास है। और वस्तुतः यह एक इतिहास ही है। इस्लाम की ऐतिहासिकता को कोई भी नहीं झुठला सकता।

मोहम्मद के जन्म से लेकर मृत्यु तक के दस्तावेज उपलब्ध होने के दावे हैं। इसलिए इतिहास के वैज्ञानिक नियम यहाँ लागू होते हैं। इसकी आलोचना और पुनर्व्याख्या का अधिकार होना ही चाहिए। अगर शर्मा का बयान इतिहास के तथ्यों के विरुद्ध है तो ऐतिहासिक तथ्यों के द्वारा ही उनपर आक्रमण किया जाना था, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।

सरकार ने दबाव में आकर इतिहास को मिथक मान लिया। यह गंभीर ऐतिहासिक भूल है। भारत जैसे वैज्ञानिक समाज और राष्ट्र के लिए यह बौद्धिक क्षति है। शर्मा का बयान ईशनिंदा के रूप में देखा गया। जबकि भारत की दार्शनिक परंपरा में ईशनिंदा की कोई संकल्पना नहीं है।

यहाँ तो ईश्वर से हास-परिहास का संबध है। विभिन्न दार्शनिक परंपराओं में ईश्वर के अस्तित्व को भी खारिज किया गया है। यहाँ नास्तिकता का भी एक समृद्ध दर्शन है। भारतीय परंपरा को छोड़ भी दें तो यहाँ का संविधान वैज्ञानिक दर्शन से बना एक विधान है। इसमें भी ईशनिंदा के लिए किसी प्रकार के दंड का कोई प्रावधान नहीं है।

ईशनिंदा मूलतः अब्राह्मिक परंपरा है। इसका उद्देश्य जीवन के वैविध्य को समाप्त करना था। साम्राज्यवादी मतों के लिए यह आवश्यक होता है। इसमें उन्होंने बड़ी सफलता भी पाई। भारत ने आज उन देशों के सामने अपने वैज्ञानिक मूल्यों से समझौता किया है जिन्हें आधुनिक राष्ट्र-राज्य की संज्ञा भी नहीं दी जा सकती है।

ये ऐसे राष्ट्र हैं जिन्होंने वैज्ञानिक मूल्यों को कभी पनपने का अवसर ही नहीं दिया। मध्यकालीन बर्बर सोच ही इनके आधुनिक आचरण का आधार है। इन्हें कोई नैतिक अधिकार नहीं किसी ‘सेक्युलर-राष्ट्र’ में वैचारिक विमर्शों को कुचलने का। और भारत में इनके प्रतिकार का साहस भी होना चाहिए। ईशनिंदा जैसे मूर्खतापूर्ण विचारों को स्वीकारना भारतीय सभ्यता की मृत्यु है।

केयूर पाठक राजस्थान स्थित रैफल्स यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। वे @KeyoorPathak के माध्यम से ट्वीट करते हैं।