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क्यों पुलवामा हमला एक घृणा अपराध था

आशुचित्र-

  • पुलवामा हमला हिंदुओं और हिंदू भारत के विरुद्ध धार्मिक घृणा का अंजाम था।
  • मीडिया और अन्य पोर्टलों द्वारा इस बात का नकारा जाना हिंदू धर्म के विरुद्ध उनका पक्षपातपूर्ण होना और इस्लाम के प्रति उनका झुकाव दर्शाता है।

14 फरवरी को कश्मीर के 19 साल के नौजवान आदिल अहमद दार ने विस्फोटक से भरी गाड़ी से जम्मू-कश्मीर में सीआरपीएफ के काफिले को निशाना बनाया जिसमें 49 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए।

हमले के बाद ही पाकिस्तान आधारित जिहादी समूह जैश-ए-मोहम्मद द्वारा एक वीडियो सामने आया जिसमें दार ने पुलवामा हमले की ज़िम्मेदारी ली। वीडियो में देखा जा सकता है कि दार ने मुस्लिमों को “उठने और ‘बेड़ियों’ को तोड़ने” के लिए कहा और कहा कि “हिंदुओं द्वारा किए गए खतरनाक अत्याचार को दिमाग में रखते हुए” वे उसके संदेश को सुनें। दार को यह कहते हुए देखा जा सकता है, “गोमूत्र पीने वाले भद्दे लोग उनके आक्रमणों का सामना नहीं कर पाएँगे”।

अपमानजनक वाक्य- “गोमूत्र पीने वाले” आम तौर पर इस्लामी बोलचाल में हिंदुओं के लिए उपयोग किया जाता है। दार इसके बाद कई हमलों का हवाला देता है जैसे आईसी 814 अपहरण, भारतीय संसद पर हमला, बादामी बाघ छावनी हमला, पठानकोट वायुसेना बेस और हाल ही में शहीद हुए भारतीय जवान। उसे यह कहते भी देखा गया, “(भारत) अपनी ग़लतफहमी को दूर कर ले कि उनके कुछ कमांडर की मौत उन्हें रोक देगी।”

हिंदुओं के प्रति जहर उगलने वाला दर कहता है, “गोमूत्र पीने वाले लोग जिहाद के सिलसिले को तोड़ नहीं सकते हैं।”

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उसने कहा कि हिंदुस्तान में सोए हुए शेर जागेंगे और हिंदुओं को बेड़ियों में बांध कर इस्लाम के सामने झुकाएँगे और एक बार फिर बाबरी मस्जिद से अल्लाह-ओ-अकबर की आवाज़ सुनाई देगी।

आतंकी समूह से जुड़े हुए टेलीग्राम चैनलों पर भी संदेशों की बाढ़ आ गई जिसमें हिंदुओं के खिलाफ हुए हमले का वर्णन था।

संदेशों में लिखा हुआ देखा जा सकता है कि हमले में “100 हिंदू भारतीयों” की मौत हुई है जिससे पता लग रहा है कि उनका निशाना हिंदू थे और उनका उद्देश्य हिंदुओं को मारना था।

इन बयानों से साफ़ पता लगता है पुलवामा हमला दर असल हिंदुओं पर था और इस्लामिक धर्म को ना मानने वाले लोगों के लिए जिहादी की नफरत थी। जैश-ए-महम्मद द्वारा कहे गए वाक्य कश्मीर को भारत से आज़ाद कर पाकिस्तान क साथ जोड़ने की बात कही है।  कश्मीर को अलग करना तो उनका पहला मकसद है और आखरी मकसद उनका पूरे भारत को हिंदुओं से अलग करन है। अहमद दार के संदेश से यह बात तो साफ़ है।

जैश-ए-मोहम्मद के चरित्र से दिखता है कि यह तालिबान और अलक़ाएदा दोनों से ही जुड़ा हुआ है, इसके राजनीतिक लक्ष्य तालिबान की तरह हैं और वैश्विक लक्ष्य अलक़ाएदा की तरह हैं। इसके रैंकों में अक्सर अफगानिस्तान, पाकिस्तानी और चेचन्या के युद्ध के दिग्गज शामिल होते हैं। पुलवामा हमले का मास्टरमाइंड अब्दुल रशीद गाजी भी एक अफगान युद्ध का अनुभवी था। 

संकीर्ण भू-राजनीतिक लक्ष्य रखने वाले दूर चेचन्या में रहने वाले लोगों को कश्मीर नहीं ला सकते हैं, ऐसा काम करने के लिए कोई बड़ी ताकत को ही सामने आना पड़ेगा और वह ताकत है नफरत की ताकत जिसको इस्लामिक दुनिया बड़े पैमाने पर फैला रही है। वे कुरान की विकृत व्याख्या और इस्लामी इतिहास के माध्यम से युवाओं को कट्टरपंथी बनाते हैं और भर्ती करते हैं। इस प्रक्रिया के लिए इस्लामिक धर्म को न मानने वाले लोगों और मूर्तिपूजकों के लिए नफरत आवश्यक है। 

इन सबके बाद भी मीडिया धार्मिक नफरत के इस तत्व के प्रति उदासीन रही। इतना ही काफी नहीं था, इसने अपराधी को भी पीड़ित बनाकर प्रस्तुत किया। ऐसी कहानियाँ फैलीं कि कैसे सुरक्षा बलों के उत्पीड़न के कारण दार आतंकवाद की ओर गया। इस तरह की रिपोर्ट पूरी तरह से घृणा और कट्टरता के तत्वों को दरकिनार कर एक धारणा बनाती हैं कि यह वास्तव में उत्पीड़न था जिसने एक व्यक्ति को आतंकवादी में बदल दिया। दार के उद्देश्य को छुपाने के लिए मीडिया के प्रयास काफी संदिग्ध हैं, खासकर तब जब वे नफरत भरे अपराधों की खबर को दिखाने के लिए उत्सुक हैं।

स्वराज्य और बाकि मीडिया प्रकाशन ने रिपोर्ट की है कि किस तरह मीडिया, विशेषकर अंग्रेज़ी मीडिया धार्मिक घृणा अपराध के साथ खेलता है और हिंदुओं को अपराधी बताता है जबकि जहाँ हिंदू पीड़ित होते हैं, वहाँ अंडर-रिपोर्टिंग या यहाँ तक ​​कि गलत रिपोर्टिंग के मामले देखे गए हैं। 

स्वराज्य ने वास्तव में विस्तृत विश्लेषण और ज़मीनी रिपोर्टों के माध्यम से दिखाया गया है कि कैसे एक लोकप्रिय घृणा अपराध ट्रैकर चयनात्मक और कई बार भ्रामक रिपोर्टिंग के आधार पर एक उच्च पक्षपातपूर्ण कथा बयान करता है।

पुलवामा हमले के बाद स्वराज्य एक पत्रकार ने एक ऐसे पोर्टल से बात की जो factchecker.in नामक वेबसाइट चलाता है, उनसे पूछा गया कि क्या वो इस घातक हमले को अपने डेटाबेस में शामिल करेंगे तो उन्होंने इंकार कर दिया, ये हैं उनके शब्द-

“हमारी डाटाबेस परिभाषा स्पष्ट रूप से बताती है कि धर्म-आधारित घृणा अपराध अपराधियों की धार्मिक विचारधारा से प्रेरित अपराध नहीं हैं, लेकिन उन मामलों में जहाँ पीड़ित की धार्मिक पहचान के खिलाफ पूर्वाग्रह आंशिक रूप से या पूरी तरह से अपराध को प्रेरित करता है… जब एक आतंकवादी एक सेना के वाहन या किसी शहरी केंद्र पर हमला करता है तो हालात बताते हैं कि हमला मुख्य रूप से राष्ट्र और उसके सुरक्षा बलों के खिलाफ था, पीड़ितों की धार्मिक समूह की पहचान पर नहीं… “

जब पत्रकार और ट्विटर के कई उपभोक्ताओं ने बताया कि वह पोर्टल हिंदुओं की हत्या के उद्देश्य को अनदेखा करते हुए आतंकवादियों के उद्देश्य को मान रहा है, तो उस पोर्टल ने जवाब नहीं दिया।

यह साफ़ है कि जैश-ए-मोहम्मद जैसे इस्लामी संगठन काफिर को निशाना बनाते हैं। इसलिए हमलावर की गवाही इसे स्पष्ट करती है कि यह अपराधियों की न केवल धार्मिक विचारधारा है, बल्कि इसका संबंध उनके हिंसक एजेंडे को चलाने के लिए पीड़ितों की धार्मिक पहचान से भी है।

एक और तर्क भी है जो पोर्टल के स्पष्टीकरण का खंडन करता है। factchecker.in के तर्क के आधार पर, हिटलर द्वारा अन्य देशों पर किए गए हमले, जो उसके एंटी-सेमेटिक नफरत से प्रेरित थे उन्हें घृणा अपराध नहीं कहा जा सकता है। हिटलर के नेतृत्व वाली नाजी विचारधारा का केंद्र सामीवाद का विरोध था। इसके शाही डिजाइन और आक्रोश की भावना के अलावा यह सिर्फ जर्मनी में यहूदियों के खिलाफ नफरत तक सीमित नहीं था बल्कि इसने दूसरे विश्वयुद्ध में दूसरे देशों पर जर्मनी के हमले को भी उकसाया था। 1941 तक यूरोपी देशों में यहूदियों की बर्बादी नाज़ी संगठनों का हिस्सा बन गई थी। 

यह भी स्थापित है कि इस्लामवादियों के बीच एक राष्ट्र की कोई धारणा नहीं है। वे उम्माह में भरोसा करते हैं जो कि पूरे विश्व भर में वैश्विक समुदाय है। उनका युद्ध किसी देश पर निर्धारित नहीं है बल्कि समुदाय पर निर्धारित है जिसको वे कभी-कभी देश से जोड़ देते हैं। हिंदू भारतीयों के लिए दार के संदेश से और इज़रायल और यहूदियों पर इस्लामवादी बयानबाज़ी से यह स्पष्ट होता है। 

इस प्रकार, जैसा कि इस लेख में पहले भी बताया गया था कि पुलवामा हमला एक धार्मिक घृणा का अपराध था जिसका उद्देश्य हिंदुओं को मारना था। मीडिया और अन्य पोर्टलों का इस बात को नकारना यह साबित करता है कि वे हिंदू धर्म के विरुद्ध वे पक्षपातपूर्ण हैं और इस्लाम के प्रति उनका झुकाव अधिक है।

मधुर शर्मा दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के चात्र हैं। वे @madhur_mrt द्वारा ट्वीट करते हैं।