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बकरीद पर चर्चा नहीं लेकिन त्रिपुरा न्यायालय द्वारा हिंदू मंदिरों में पशुओं की बलि पर रोक

त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने राज्य के तर्क को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पशु बलि हिंदू धर्म में पारंपरिक तांत्रिक विधि का हिस्सा थी। इसके बाद न्यायालय ने राज्य के सभी मंदिरों में इस प्रथा पर रोक लगा दी है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने तर्क दिया, “जानवरों को भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन जीने का मौलिक अधिकार है।” त्रिपुरा में पशु बलि आमतौर पर माता त्रिपुरेश्वरी देवी मंदिर और चतुर दास देवता मंदिर में होती है। यहाँ रोज एक बकरी की बलि दी जाती थी, जो जिला प्रशासन के अधीन होती थी।

आम जनता भी इन मंदिरों में बड़ी संख्या में पक्षियों और जानवरों की बलि देती थी। अदालत ने फैसला दिया है कि पशु बलि को धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं कहा जा सकता है।

सरकारी पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि इस मामले में केवल बलिदान की हिंदू प्रथा को चुनौती दी गई है। वहीं, बकरीद पर जानवरों की कुर्बानी देने की मुस्लिम प्रथा को नजरअंदाज किया गया। अदालत ने इस तर्क को यह कहते हुए खारिज कर दिया, “मुस्लिम बलिदान के मामले को पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने पिछले मामले में सुलझा लिया था।”

इस मामले में जनहित याचिका सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुभाष भट्टाचार्जी द्वारा उच्च न्यायालय में दायर की गई थी। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश संजय कोरल और न्यायाधीश अरिंदम लोध की खंडपीठ के समक्ष की गई। जनहित याचिका में कहा गया था, “पशु बलि की प्रथा केवल एक अंधविश्वास है।”