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आरसीईपी समझौते से दूर रहने के निर्णय का भारतीय व्यापार निकायों ने किया स्वागत

सरकार की ओर से नियुक्त पैनल के क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) में देश के प्रवेश का समर्थन करने के बाद सरकार ने सोमवार (4 नवंबर) को 16 राष्ट्रों के साथ मुक्त व्यापार समझौते से दूर रहने का फैसला किया। भारत के इस कदम का कई व्यापार निकायों और विशेषज्ञों ने समर्थन किया है।

दिल्ली के एक व्यापारी समूह कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने आरसीईपी को एक कठोर संधि बताया। कई छोटी फर्मों ने आशंका जताई कि अगर भारत आरसीईपी में शामिल होता है तो चीनी कंपनियाँ यहाँ के बाजार में सस्ता सामान बेचकर कब्जा कर लेतीं। ऐसे में छोटे भारतीय संस्थान बंद हो जाएँगे।

भारत के परिधान निर्यात संवर्धन परिषद (एपेक) में निदेशक (आर्थिक और सलाहकार) चंद्रिमा चटर्जी ने कहा, “यह पूरे परिधान उद्योग के मूल्य-शृंखला को प्रभावित कर सकता है। कुछ बाजारों के मामले में हम आक्रामक हैं और दूसरों के मामले में रक्षात्मक हैं। इस मामले में हम अधिक रक्षात्मक होंगे। हर कोई इस समझौते से होने वाले नुकसान को लेकर आशंकित था।”

चीन-भारतीय व्यापार चीन के पक्ष में बेहद असंतुलित है। हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार में काफी वृद्धि हुई है और यह चीन के पक्ष में रहा है।

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (एफआईईओ) के अनुसार, 2000-01 से द्विपक्षीय व्यापार 2.92 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2018-19 तक 87.06 बिलियन डॉलर हो गया। वित्तीय वर्ष 2019 में भारत का चीन को निर्यात 16.75 बिलियन डॉलर था, जिसमें 25.62 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वहीं, भारत को चीनी निर्यात 70.31 बिलियन डॉलर था।

आरसीईपी आसियान के 10 सदस्य राज्यों ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, वियतनाम और छह एफटीए साझेदार चीन, जापान, भारत, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच एक मुक्त व्यापार समझौता है।