समाचार
बाढ़ से पूर्व अलकनंदा और धौलीगंगा की मछलियों में देखा गया था असामान्य व्यवहार

अलकनंदा नदी और उसकी सहायक धौलीगंगा में रहने वाली मछलियों को रविवार को बाढ़ आने से पूर्व असामान्य व्यवहार करते देखा गया था।

टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार, सुबह 9 बजे के करीब लासु गाँव के लोगों ने मछलियों को सतह के करीब देखा। इतना करीब कि वे व्यावहारिक रूप से उन्हें उठा सकते थे। लासु 70 किमी नीचे की ओर है, जहाँ एक घंटे बाद आपदा आई थी।

एक पर्यवेक्षक के हवाले से कहा गया था, “यहाँ कभी खाली हाथों से मछली पकड़ना संभव नहीं होगा लेकिन उस दिन वे बेहद करीब और बहुत सारी थीं।” एक अन्य पर्यवेक्षक ने कहा, “मछली हमेशा धारा के बीच में तैरती है। यह असामान्य था। वे केवल किनारों के साथ तैर रही थीं।” उन्होंने यह भी देखा कि आमतौर पर नदी का हरा पानी ग्रे हो गया था।

ऐसा ही मछलियों का व्यवहार नंदप्रयाग, लैंगसु, कर्णप्रयाग में देखा गया, जहाँ असंख्य महसी, कार्प, स्नो ट्राउट तैरती थीं, वे नदी की किनारे सतह के करीब थीं।

इसके पीछे का कारण आपदा से पूर्व का उपसतह कंपन हो सकता है। ये कंपन मछली के सेंसर को नुकसान पहुँचा सकते हैं। मछली में एक जैविक प्रणाली होती है, जिसे पार्श्व रेखा प्रणाली कहा जाता है, जो उन्हें पानी की गति और दबाव में मिनटों के बदलाव का पता लगाने में मदद करती है।

एक वैज्ञानिक के हवाले से कहा गया, “यह संभव है कि बाढ़ से पूर्व एक ध्वनि को मछली द्वारा लिया गया हो। यह भी संभव है कि कोई बिजली का तार या विद्युत स्रोत पानी में गिर गया और उन्हें बिजली के झटके लगे हों। इसके कई कारण हो सकते हैं। यही वजह है कि हम कहते हैं कि नदी पर डायनामाइट ब्लास्टिंग नहीं की जानी चाहिए।”