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दलित ईसाइयों तक अनुसूचित जाति आरक्षण के विस्तार हेतु सर्वोच्च न्यायालय का केंद्र को नोटिस
आईएएनएस - 9th January 2020

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार (8 जनवरी) को अनुसूचित जाति को मिलने वाले लाभों को अनुसूचित जाति मूल के दलित ईसाइयों को आवंटित करने के लिए केंद्र से निर्देश मांगने के लिए एक याचिका पर गौर करने के लिए सहमति व्यक्त की।

न्यायमूर्ति बीआर गवई और सूर्यकांत एवं मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, अल्पसंख्यकों के राष्ट्रीय आयोग और भारत के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी किया।

इसके साथ पीठ ने दो सप्ताह के भीतर केंद्र की प्रतिक्रिया मांगी है, क्योंकि पीठ ने अन्य समान मामलों के साथ याचिका को जोड़ा है। यह भी मांग की है कि अनुसूचित जाति समुदाय को धर्म तटस्थ बनाया जाना चाहिए।

याचिका के अनुसार, अनुसूचित जाति के व्यक्ति को हिंदू धर्म, सिख धर्म और बौद्ध धर्म से अलग धर्म को स्वीकार करने से संविधान के अनुच्छेद 3 (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 से लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, जो अनुसूचित जाति के ईसाइयों को अनुसूचित जाति के दर्जे का लाभ उठाने से रोकता है। यह प्रतिबंध समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और गैर-भेदभाव के मौलिक अधिकार के खिलाफ है, यह कहा।

शिक्षा, छात्रवृत्ति, रोजगार, कल्याणकारी उपायों, पंचायत चुनावों, भारतीय संसद तक की विधानसभाओं में दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की अनुमति देने और इसका विस्तार करने और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (रोकथाम) अधिनियम, 1989 जिसमें वर्ष 2018 में संशोधन किया गया था, इसके तहत कानूनी उपाय/संरक्षण का लाभ उठाने, आदि की मांग इस याचिका में की गई है।

दलित ईसाइयों के लिए अनुसूचित जाति का दर्जा मांगने के लिए राष्ट्रीय दलित ईसाई परिषद (एनसीडीसी) द्वारा दायर याचिका पर न्यायालय सुनवाई कर रहा था। “संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950, के अनुच्छेद 3(ए) में ईसाईयों का गैर-समावेश जिसमें हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म भी शामिल हैं दरअसल संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 25 के खिलाफ और इनका उलंघन करता है।”, याचिका में कहा गया।

(इस समाचार को वायर एजेंसी फीड की सहायता से प्रकाशित किया गया है।)