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अर्णब गोस्वामी को जमानत ना देना बॉम्बे उच्च न्यायालय की गलती- सर्वोच्च न्यायालय

आत्महत्या के लिए उकसाने के दो वर्ष पुराने मामले में रिपब्लिक टीवी के मुख्य संपादक अर्णब गोस्वामी को बुधवार (11 नवंबर) को सर्वोच्च न्यायालय से जमानत मिल गई। मामले में न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ प्रश्न उठाए और कहा, “इस तरह किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर रोक लगाना न्याय का  उपहास होगा।”

हिंदुस्तान लाइव की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की पीठ ने कहा, “हम देख रहे हैं कि लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिसमें उच्च न्यायालय जमानत नहीं दे रही हैं। वे लोगों की स्वतंत्रता और निजी स्वतंत्रता की रक्षा करने में विफल हो रही हैं।”

न्यायालय ने कहा, “अगर राज्य सरकारें लोगों को निशाना बनाती हैं तो उन्हें इसका अहसास होना चाहिए कि नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय है।” न्यायालय ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि राज्य सरकारें कुछ लोगों को विचारधारा और मत भिन्नता के आधार पर निशाना बना रही है।

पीठ ने टिप्पणी की कि भारतीय लोकतंत्र असाधारण तरीके से लचीला है और महाराष्ट्र सरकार को इन सबको (टीवी पर अर्नब के ताने) नज़रअंदाज़ करना चाहिए।

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने सोमवार (9 नवंबर) को मामले में अर्णब गोस्वामी और दो अन्य को अंतरिम जमानत देने से मना कर दिया था जिसे भी सर्वोच्च न्यायालय ने गलत माना। न्यायालय ने कहा था कि उन्हें राहत के लिए निचली अदालत जाना चाहिए। अगर आरोपी अपनी गैरकानूनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हैं और जमानत की अर्जी दायर करते हैं तो संबंधित निचली अदालत चार दिन में उस पर निर्णय करेगी।