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सूर्य व धरती के विवाह का त्यौहार- जानें झारखंड के आदिवासियों के उत्सव के बारे में

झारखंड आदिवासियों के प्रमुख त्यौहार में से एक सरहुल की पूजा 8 अप्रैल को बड़े धूमधाम से मनाई जा रही है। चैत्र माह की तृतीया को मनाए जाने वाले इस पर्व में सदान समुदाय की खास भूमिका रहती है। त्यौहार को सूर्य और धरती के विवाह के रूप में देखा जाता है।

माना जाता है कि यह त्यौहार धरती और प्रकृति से बेहतर फसल और फल प्राप्ति के लिए मनाया जाता है। सृष्टि बनाने वाले को याद करने के साथ प्रकृति का मानव जीवन के साथ रिश्ता बरकरार रखने के लिए इसे मनाते हैं। तीन दिन तक चलने वाले पर्व में सखुआ के साथ मुर्गे तपावन देकर पूजा की जाती है।

इसमें आदिवासी अपने पूर्वजों को याद करते हैं। देवी-देवताओं से नई पत्तियों, फूलों का गुच्छा, पकवान, फल ग्रहण करने की प्रार्थना की जाती है। फिर सरना स्थल पर इकट्ठा होकर आदिवासी सामूहिक पूजा करते हैं। इसके बाद अगली फसल की बुआई शुरू होती है।

रांची में कई साल से सरहुल मनाया जा रहा है। इसे आदिवासी अपने नए वर्ष के रूप में भी देखते हैं। इसी के तहते सोमवार को भव्य शोभायात्रा निकाली गई। लाखों आदिवासी अपने क्षेत्रों से सिरमटोली स्थित मुख्य सरना स्थल पहुंचे।

पारंपरिक वेशभूषा और नाचने-गाने के साथ सभी लोग यात्रा में शामिल हुए। सरना स्थल की परिक्रमा करने के बाद सभी अपनी टोली से वापस लौट गए। अब फूलखोंसी का आयोजन मंगलवार को होगा।

सरना स्थल में मुख्य पहान जगलाल पहान ने सुबह पूजा की। इसी तरह अन्य स्थानों के पहान ने भी पूजाकर सालभर के घटनाक्रम की भविष्यवाणी की। इसके लिए एक दिन पहले रविवार को केकड़ा पकड़ने की विधि पूरी की गई। शाम को जलरखाई विधि के तहत घड़े में पानी रखकर पूजा की गई। इसमें भविष्यवाणी का आधार घड़े में रखा पानी ही होगा।