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सऊदी अरब सुरक्षा कारणों से विदेशों के मस्जिदों का वित्तपोषण बंद करेगा- रिपोर्ट

सऊदी अरब के पूर्व न्याय मंत्री मोहम्मद बिन अब्दुल-करीम इस्सा ने घोषणा की है कि उनका देश अब विदेशों में मस्जिदों को वित्त पोषण प्रदान नहीं करेगा।

एक स्विस समाचार पत्र वाईऑन की रिपोर्ट के अनुसार मंत्री ने कहा, “समय आ गया है कि जेनेवा मस्जिद को एक स्विस प्रशासनिक परिषद को सौंप दिया जाए जो क्षेत्र में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें एक निर्वाचित मौलवी होना चाहिए।”

“सुरक्षा कारणों” की बात करते हुए यह अकल्पनीय उपाय दुनिया भर की सभी मस्जिदों के साथ किया जाएगा।

स्विस अखबार ले मातिन डिमंच के हवाले से मोहम्मद बिन अब्दुल-करीम इसा ने कहा, “दुनिया भर में समान उपाय लागू होंगे। हर देश में राष्ट्रीय अधिकारियों के साथ समन्वय में एक स्थानीय बोर्ड का प्रशासन स्थापित होगा। यह आवश्यक है उदाहरण के लिए, सुरक्षा कारणों से। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मस्जिदें सुरक्षित हाथों में ही रहें। तब हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे।”

गुरुवार (23 जनवरी) को अब्दुल-करीम इस्सा ने औशविट्ज़ शिविर की मुक्ति की 75वीं वर्षगाँठ पर औशविट्ज़ शिविर का दौरा किया जहाँ उन्होंने नाज़ी शासन के दौरान प्रताड़ित यहूदी पीड़ितों को सम्मानित किया।

तेल की खोज होने के बाद से सऊदी अरब ने शुद्धतावादी वहाबी इस्लाम को दुनिया में फैलाने के लिए पेट्रोडॉलर का उपयोग किया है। वर्ष 2007 तक सऊदी साम्राज्य ने वहाबी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए अपनी “नर्म शक्ति” के हिस्से के रूप में सालाना 2 अरब डॉलर के करीब खर्च किया था जिसके तहत उन्होंने भारत समेत कई देशों में मस्जिदें बनवाई थीं जहाँ पर मुस्लिम समुदाय हैं।

सऊदी सिंहासन के उत्तराधिकारी मुकुट राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान राजनीति और धर्म को अलग करके देश का आधुनिकीकरण करने की कोशिश कर रहे हैं जो इस क्षेत्र में इस्लाम के प्रचलन के विपरीत है।