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राजस्थान- वीर सावरकर के नाम से वीर हटाने के बाद सावरकर पर संगोष्ठी को मंज़ूरी नहीं

राजस्थान के स्कूलों में सभी संदर्भों से स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर के नाम से ‘वीर’ हटाए जाने के कुछ महीने बाद राजस्थान विश्वविद्यालय ने वीर सावरकर के ऊपर होने वाली संगोष्ठी को स्वीकृति नहीं दी है।

भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर), जो कि एक स्वायत्त शैक्षणिक निकाय है, ने सावरकर के विषय पर संगोष्ठी के लिए निवेदन किया था। इस कार्यक्रम का नाम ‘सावरकर के विषय में सच’ रखा गया था।

इकनॉमिक टाइम्स  की रिपोर्ट के अनुसार यह संगोष्ठी अलग-अलग शहरों में होने वाली बातचीत श्रृंखला का हिस्सा थी। जयपुर, गुवाहाटी, पोर्ट ब्लेयर और पुणे जैसे शहर में इसका आयोजन होना था। इसका संचालन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सहबद्ध अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के द्वारा किया गया था।

आईसीएचआरके पदाधिकारी ने कहा, “हमने राजस्थान विश्वविद्यालय से स्थान और अनुमति थी ताकि हम वीर सावरकर से जुड़ी इस बातचीत की श्रृंखला का आयोजन राजस्थान विश्वविद्यालय के परिसर में कर सकें सेकिन उन्होंने इसके लिए साफ इनकार कर दिया और कहा कि हम किसी और विषय पर चर्चा कर सकते हैं।”

दरसल महाराष्ट्र चुनाव के समय भाजपा ने वीर सावरकर को भारत रत्न देने की बात कही थी। आपको बता दें कि इस समय राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है और कांग्रेस भाजपा की विचारधारा, नीतियों और कार्यक्रम के सख्त खिलाफ है। इसी वजह से राजस्थान सरकार ने वीर सावरकर के मामले में यह निर्णय लिया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया  की रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा, “भगवा पार्टी की विचारधारा फासीवादी है और वह लोकतंत्र में विश्वास नहीं करती।”

प्रतीत होता है कि ‘फासीवादी विचारधारा’ का वीर सावरकर के संदर्भ में उपयोग कर राजस्थान में इस राष्ट्रवादी द्रष्टा के प्रति सावधानी बरतने का माहौल उत्पन्न किया जा रहा है।

राजस्थान विश्वविद्यालय की इतिहास और संस्कृति विभाग प्रमुख प्रमिला पूनिया ने कहा, “हमने उन्हें पूरी तरह से मना नहीं किया था बल्कि उनसे कुछ महीने का समय और जानकारी की मांग की थी क्योंकि हमें इस विषय में और लोगों की राय भी लेनी है। सावरकर के जीवन के कुछ हिस्से विवादास्पद हैं और हम कोई परेशानी नहीं चाहते थे।”

इसी वर्ष मई में वसुंधरा सरकार द्वारा जारी की गई वीर सावरकर की संक्षिप्त जीवनी को कांग्रेस ने सत्ता में लौटने के बाद संशोधित किया था और साथी ही एक पाठ्यपुस्तक संशोधन समिति का गठन किया था।

10वीं कक्षा की सामान्य विज्ञान की पुस्तक में संशोधन के बाद कथित तौर पर लिखा गया है कि सावरकर ने अंग्रेज़ी सरकार से क्षमादान मांगते समय खुद को ‘पुर्तगाल का बेटा’ बताया था। इस परिवर्तन को भाजपा ने नहीं स्वीकारा।

राजस्थान के पूर्व शिक्षा मंत्री वासुदेव देवननिस कहा कि कांग्रेस को इंदिरा गांधी से कुछ सीखना चाहिए जिन्होंने सावरकर को साहस एवं देश भक्ति का प्रतीक कहा था।

डेक्कन हेराल्ड  की रिपोर्ट के अनुसार देवनानी ने कांग्रेस को याद दिलाया कि इंदिरा गांधी ने 1970 में सावरकर की स्मृति में स्टाम्प जारी किया थीा और सावरकर के जीवन पर लघु चलचित्र बनाने के लिए भारतीय फिल्म विभाग को अपने बैंक खाते से 11,000 रुपए दान दिए थे।

कांग्रेस सरकार और शिक्षाविदों के रुख से यह साफ है कि सावधानी से विचारधारा का खेल खेला जा रहा है।