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‘कोई शक?’, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा राफेल सौदे में जाँच का कोई प्रश्न नहीं

राफेल सौदे के मामले में रिलायंस तथा केंद्र सरकार को बड़ी राहत मिली है। सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की बेंच ने जाँच की याचिका को खारिज कर दिया। वहीं न्यायालय ने डसॉल्ट कंपनी से 36 विमानों के क्रय में भ्रष्टाचार तथा प्रक्रिया की अनियमितताओं के आरोपों को भी खारिज कर दिया, लाइव लॉ की रिपोर्ट में बताया गया।

न्यायाधीश रंजन गोगोई, एस के कौल तथा के एम जोसफ़ बेंच के सदस्य थे।

उल्लेखनीय है कि एम एल शर्मा, विनीत ढांडा तथा आप सांसद संजय सिंह ने याचिका दायर की थी। पूर्व में केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी तथा वकील प्रशांत भूषण द्वारा दायर की गई जनहित याचिका भी इसका भाग थी।

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री ने रक्षा सौदों के नियमों की अनदेखी की है। यह भी कहा जा रहा था कि कैबिनेट समिति की स्वीकृति से पहले ही सौदे का ऐलान किया जा चुका था। साथ ही नए सौदे में विमानों की बहुत अधिक कीमत रखने तथा इस सौदे में रिलायंस कंपनी को भागीदार बनाने के लिए हेर-फेर करने, जबकि रिलायंस को रक्षा क्षेत्र में कोई अनुभव नहीं है के आरोप भी लगाए गए थे।

सुनवाई के दौरान महान्यायवादी (अटॉर्नी जेनरल) ने कहा कि राफेल सौदे में फ्रांस की सरकार द्वारा कोई संप्रभु गारंटी नहीं दी गई थी लेकिन फ्रांस ने डसॉल्ट के साथ सौदे के लिए चुकौती आश्वासन पत्र (एलओसी) जारी किया था। उन्होंने कहा कि चूँकि यह अंतर-सरकारी सौदा था, इस कारण इसमें टेंडर प्रक्रिया की कोई आवश्यकता नहीं थी।

अटॉर्नी जनरल ने मामले को देश की रक्षा से संबंधित होने का हवाला देते हुए तथा अति संवेदनशील मामला बताते हुए न्यायालय को हस्तक्षेप न करने का आग्रह किया।

अदालत ने भारतीय वयुसेना के अधिकारियों तथा रक्षा सचिव से सौदे की प्रक्रिया से जुड़े सवाल भी पूछे।

रिलायंस का पक्ष लेने के आरोपों के बीच, डसॉल्ट एविएशन ने कहा कि उन्होंने रिलायंस को खुद चुना है तथा इस निर्णय में भारतीय सरकार का कोई हाथ नहीं था।