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नमामि गंगे के तहत एसटीपी स्थापना, घाट निर्माण, वृक्षारोपण, आदि- जानें कैसे

आज (8 जनवरी को) जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ने मंत्रालय की ओर से जल चर्चा  नामक एक मासिक पत्रिका का विमोचन किया। इस पत्रिका की उपयोगिता बताते हुए उन्होंने कहा, “यह पत्रिका जल संरक्षण और जल को दुबारा उपयोग करने के लिए प्रोत्साहन का एक माध्य बनेगी।”

पिछले चार वर्षों तक गंगा की सफाई के लिए कई प्रयास किए गए हैं। जहाँ मई 2014 में प्रति दिन 48.5 करोड़ लीटर के अशुद्ध जल का उपचार करने के लिए संयंत्र उपलब्ध थे, वही इनकी क्षमता बढ़कर अगस्त 2018 तक 192.8 करोड़ लीटर प्रति दिन की हो गई। नवंबर 2018 में सिसमऊ नाले का मार्ग सफलतापूर्वक जल उपचार संयंत्र की ओर मोड़ दिया गया था जिसकी सहायता से प्रति दिन 14 करोड़ लीटर अशुद्ध जल के मिलने से गंगा को बचाया जा सका।

गंगोत्री, ऋषिकेश, हरिद्वार, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, पटना और कोलकाता में गंगा के मार्ग पर कई जल उपचार संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं, वृक्षारोपण हो रहा है व घाटों की सफाई भी की जा रही है। गंगा की सतह को साफ रखने के लिए ट्रैश स्कीमर (कचरा निकालने के लिए) का उपयोग किया जाता है। केंद्रीय मंत्री गडकरी ने इन स्थानों पर हुए कार्यों को समझाने के लिए कुछ वीडियो भी साझा किए हैं।

गंगोत्री में स्वर्गपुरी मोक्ष घाट को नया रूप देने के साथ ही अन्य घाट भी बनाए जा रहे हैं। यहाँ पर प्रति दिन 10 लाख लीटर अशुद्ध जल का उपचार करने के लिए संयंत्र स्थापित किया गया है। ऋषिकेश के तपोवन में प्रति दिन 35 लाख लीटर अशुद्ध जल का उपचार करने के लिए संयंत्र स्थापित किया गया। वहीं ऋषिकेश के ढालवाला में 1.25 करोड़ लीटर क्षमता वाले उपचार संयंत्र की योजना स्वीकृत है। नालों को मोड़कर लकरघाट उपचार संयंत्र तक ले जाने का प्रस्ताव है जिसकी क्षमता 2.6 करोड़ लीटर प्रति दिन की होगी। वन विभाग द्वारा पिछले वर्ष इस क्षेत्र में गंगा के आसपास 40 हेक्टेयर में वृक्षारोपण किया गया था और इस वर्ष 25 हेक्टेयर का लक्ष्य है। सामाजिक जागरूकता लाने के लिए “गंगा विचार मंच” को नमामि गंगे परियोजना से जोड़ा गया।

समतल ज़मीन पर गंगा का पहला पड़ाव हरिद्वार है। सराय में उपचार संयंत्र बनाया जा रहा है। पुराने जगजीतपुर उपचार संयंत्र में भी नवीनीकरण कर इसकी क्षमता बढ़ाई जा रही है। उपचार होने के बाद इस जल का प्रयोग सिंचाई के लिए किया जाएगा। घाटों को भी आधुनिक और सुविधाजनक स्वरूप दिया जा रहा है। गंगा वाटिका और नक्षत्र वाटिका बनाई गईं जिससे गंगा के आसपास हरियाली बनी रहे।

औद्योगिक और घरेलु सीवर के कारण गंगा को प्रदूषित करने में कानपुर की हमेशा से सबसे बड़ी भागीदारी रही है। सिसमऊ नाले के अनुपचारित जल में से प्रति दिन 8 करोड़ लीटर जल को बकरमंडी से बिंगावन उपचार संयंत्र में भेजा जाता है, वहीं अन्य 60 करोड़ लीटर अशुद्ध जल को जाजमाऊ उपचार संयंत्र में भेजा जाता है। बनियापुरवा, पनका और शुक्लागं में भी उपचार संयंत्र का निर्माण किया जा रहा है। पुराने घाटों के नवीनीकरण के साथ 22 प्रस्तावित घाटों में से 20 घाट बनकर तैयार हैं।

प्रयागराज में फाफामाऊ, झूसी और नैनी में हाइब्रिड ऐन्युइटी पीपीपी मॉडल के आधार पर उपचार संयंत्र का निर्माण किया जा रहा है। कोदरा में प्रति दिन 2.5 करोड़ लीटर, फाफामाऊ में 1.4 करोड़ लीटर, सालोरी में 1.4 करोड़ लीटर, झूसी में 1.6 करोड़ लीटर, नैनी में 4.2 करोड़ लीटर की क्षमता के संयंत्र होंगे। वर्तमान में प्रयागराज में छः संयंत्रों के माध्यम से प्रति दिन 26.8 करोड़ लीटर अशुद्ध जल का उपचार किया जाता है। पुराने घाटों का नवीनीकरण व छः नए घाटों का निर्माण किया जा रहा है।

वाराणसी में गंगा के किनारे पाँच पंपिंग स्टेशन बनाए गए हैं। ये पंप नालों के पानी को दीनापुर उपचार संयंत्र की ओर भेजता है जिसकी क्षमता 8 करोड़ लीटर प्रति दिन है। भगवानपुर उपचार संयंत्र में बीएचयू से जाने वाले 98 लाख लीटर अशुद्ध जल का उपचार किया जाता है। दीनापुर में 14 करोड़ लीटर की क्षमता का नया उपचार संयंत्र भी बनाया गया है। रमणा में 5 करोड़ लीटर प्रतिदिन की क्षमता वाले एसटीपी का निर्माण हो रहा है। गोइथा में 12 करोड़ लीटर प्रति दिन क्षमता के एसटीपी का निर्माण जेएनएनयूआरएम योजना के तहत किया जा रहा है। इन सभी कार्यों के पूरा होने का बाद वाराणसी में उपचार संयंत्रों की कुल क्षमता 41.2 करोड़ लीटर प्रति दिन हो जाएगी।धोबी समाज भी धीरे-धीरे खुद को दूसरे स्थान पर विस्थापित कर रहा है जिससे कपड़ों की धुलाई से गंगा प्रदूषित न हो। 84 घाटों की नियमित सफाई की जाती है और 26 घाटों का नमीनीकरण किया जा रहा है।

इन कार्यों का विस्तृत विवरण nmcg.nic.in पर देखा जा सकता है।