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कच्छ संसदीय क्षेत्र विश्लेषण- कांग्रेस की बढ़त के बावजूद भाजपा का जनाधार मज़बूत

आशुचित्र- कच्छ में कांग्रेस को बढ़त अवश्य मिलेगी लेकिन भाजपा का जनाधार इतना है कि इसमें सेंध लगाने के लिए और समय लगेगा।

1996 से भाजपा शासित कच्छ लोकसभा सीट पर तीसरे चरण में 23 अप्रैल को मतदान होने जा रहे हैं। गुजरात के पश्चिमी छोर पर स्थित यह संसदीय सीट दलित आरक्षित है व राज्य की 26 सीटों में से एक है। गुजरात हमेशा से भाजपा का गढ़ रहा है, यहाँ तक कि 2014 में सभी लोकसभा सीटें भाजपा के खाते में गई थीं लेकिन 2017 के विधान सभा चुनावों में बदले रुझानों ने चर्चा का एक नया आयाम खोल दिया है।

2017 में कच्छ भी इस नई बयार से अछूता नहीं रहा था। 7 विधान सभा सीटों में से दो भाजपा शासित सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली थी। इस परिवर्तन का कारण तीन नेताओं के उभरने को बताया जा रहा है- जिग्नेश मेवानी, अल्पेश ठाकुर और हार्दिक पटेल। इन तीन नेताओं ने दलित, जनजातीय और पाटीदार समुदाय के मतों को कांग्रेस की ओर मोड़ा।

अगर पाटीदार समुदाय की बात की जाए तो भाजपा को इससे अधिक नुकसान नहीं हुआ, पाटीदार बहुल क्षेत्रों में भी यह जीती लेकिन जब सौराष्ट्र-कच्छ क्षेत्र के पाटीदार बहुल सीटों पर गौर किया जाए तो पाएँगे कि यहाँ भाजपा का प्रदर्शन फीका पड़ गया।

1999 से अगर कच्छ में भाजपा के जीत के अंतर को देखा जाए तो यह 1.1 प्रतिशत से लगातार बढ़ते हुए 2014 में 26.9 प्रतिशत पर पहुँच गया था। वोट शेयर (मत प्रतिशत) का डाटा निम्न टेबल में प्रस्तुत है-

चुनाव भाजपा आईएनसी बसपा
2004 48.15 41.84 N/A
2009 50.58 37.94 1.69
2014 59.4 32.55 2.24

कच्छ जिला और कच्छ संसदीय क्षेत्र एक ही है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहाँ 12.4 प्रतिशत अनुसूचित जाति व 1.2 प्रतिशत जनसंख्या अनुसूचित जनजाति की है। धार्मिक जनसांख्यिकी देखें तो पाएँगे कि यहाँ 76.89 प्रतिशत हिंदू आबादी व 21.14 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या है। यहाँ 61.18 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं व 34.82 प्रतिशत शहरी आबादी है।

इस क्षेत्र में 2015 से सिंचाई परियोजनाओं के दुरुस्त हो जाने से किसानों को एक नया जीवन मिला है। वे इज़रायली तकनीक से अनार और हरे खजूर उगाते हैं। फल-सब्जियों के उगाने के साथ-साथ लोगों ने गौपालन का व्यवसाय भी शुरू कर दिया है और वह भुज स्थित प्लांट को अपना डेयरी उत्पाद कम खर्च में भेज पाते हैं। पानी की उपलब्धता होने के कारण अब वे दो-तीन गाय भी रखने से नहीं कतराते हैं। मांडवी, मुंदरा, अंजार और भुज में भारी मात्रा में आम भी उगाए जा रहे हैं। यहाँ की केसर विदेशों में भी निर्यात की जाती है।

गुजरात के अधिकांश क्षेत्रों की तरह भाजपा ने कच्छ में भी वर्तमान सांसद विनोद लखामशी चावड़ा को ही मैदान में उतारा है। उनके संसदीय प्रदर्शन को देखा जाए तो 40 वर्षीय सांसद की उपस्थिति 83 प्रतिशत रही है। उन्होंने सात वाद-विवाद में भाग लिया व 228 प्रश्न उठाए। 2015 में उन्होंने सीएनजी पम्प स्टेशन की मांग की थी और पिछले साल तक दो स्टेशन स्थापित हो गए थे, पोट्रोल पम्प चलाने वाले जीके जडेजा ने स्वराज्य  को बताया। 2014 में उन्होंने कच्छ में पासपोर्ट कार्यालय की मांग की थी, 2017 में यहा कार्यालय तैयार हो गया था। लेकिन फिर भी वे एमपीलैड्स योजना के 5.21 करोड़ रुपये खर्च कर पाने में असमर्थ रहे हैं।

दूसरी ओर कांग्रेस ने 52 वर्षीय नरेश माहेश्वरी को उतारा है जो पहले कच्छ यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष थे व वर्तमान में कच्छ कांग्रेस इकाई के अध्यक्ष व माधापुर गाँव के सरपंच हैं। यह गाँव दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे समृद्ध ग्राम माना जाता है। पाटीदार बहुल होने के बावजूद पारंपरिक रूप से यहाँ के लोग भाजपा को ही वोट देते आए हैं लेकिन माहेश्वरी का सरपंच होना इसकी दिशा भी बदल सकता है।

इसके अलावा बसपा समेत जो अन्य छोटे दल व निर्दलीय चुनाव में खड़े हुए हैं, उसकी संभावना यह है कि ये कांग्रेस के मत ही काटेंगे। इस प्रकार देखा जाए तो मोदी लहर में कमी व पाटीदार समुदाय के कारण कांग्रेस अपना मत प्रतिशत बढ़ाने में सफल ज़रूर होगी लेकिन भाजपा के पारंपरिक जनाधार और विकास पर विश्वास को हिलाना इतना आसान नहीं होगा।