समाचार
इमरान खान के अपने नाम से नियाज़ी छुपाने का कारण है 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध

करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन पर 9 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को ‘इमरान खान नियाज़ी’ कहकर संबोधित करते हुए उनका शुक्रिया किया था।

इंडिया टीवी  के अनुसार, उन्होंने कहा था, “मैं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, इमरान खान नियाज़ी को भारत की भावनाओं का सम्मान करने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ।”

उन्होंने नियाज़ी शब्द पर खास ज़ोर दिया, जो पाकिस्तानी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल मेयर अब्दुल्ला खान नियाज़ी का नाम था। पूर्वी पाकिस्तान जो अब बांग्लादेश में है, तब 93,000 सैनिकों के साथ नियाजी ने भारतीय सेना से हारने के बाद आत्मसमर्पण कर दिया था।

पाकिस्तान सेना और पूर्व पाकिस्तानी सहयोगियों द्वारा रजाकार के रूप में पहचाने जाने वाले युद्ध अपराध को पूर्व अमेरिकी राजनयिक आर्चर केंट ब्लड ने शानदार ढंग से दस्तावेजित किया था। वे बांग्लादेश के ढाका (उस वक्त पूर्वी पाकिस्तान) के आखिरी अमेरिकी राजदूत थे।

पूर्वी पाकिस्तान के विघटन से पहले मुख्य रूप से सुन्नी पंजाबी पाकिस्तान की सेना ने 30 लाख से अधिक बंगाली मुसलमानों और हिंदुओं की हत्या की थी। कुख्यात दुष्कर्म शिविरों में दो लाख से अधिक महिलाओं का दुष्कर्म किया था। महिलाओं के जबरन अपहरण और उन्हें बलात्कार शिविरों में डालने की यह रणनीति कथित तौर पर अब भी बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा की जा रही है।

16 दिसंबर 1971 को भारत से हार के बाद नियाजी और पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसर्पण किया था। इसे पाकिस्तान बेहद अपमानजनक मानते हैं। उस वक्त पूर्वी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा थे, जिन्होंने युद्ध का नेतृत्व किया था।

1971 में एएके नियाज़ी के आत्मसमर्पण ने 13-दिवसीय युद्ध को समाप्त कर दिया, जिसे बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के रूप में भी जाना जाता था। यही कारण है कि इमरान खान ने अपना अंतिम नाम ‘नियाज़ी’ छिपाया, जो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में हुई अपमानजनक हार की याद दिलाता है।