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भारतीय सेना शीतकालीन परीक्षणों में स्वदेशी एटीएजीएस हॉवित्ज़र का उपयोग करेगी

भारतीय सेना सिक्किम में जनवरी-फरवरी में एक ‘शीतकालीन उपयोग परीक्षणों’ के माध्यम से स्वदेशी रूप से विकसित उन्नत तोपखाने बंदूक प्रणाली (एटीएजीएस) का प्रयोग करेगी।

इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, एटीएजीएस संभवतः 255 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली ऐसी 1,580 बंदूकों के लिए सेना की आवश्यकता को पूरा कर सकता है। आवश्यक है कि इसके लिए यह परीक्षण में पास हो। हालाँकि, हथियारों को मई-जून में मोबिलिटी परीक्षण और ग्रीष्म परीक्षण से गुज़रना होगा।

स्वदेशी रूप से उत्पादित एटीएजीएस के लिए उपयोगकर्ता परीक्षण इस वर्ष सितंबर में बंद हो गए थे क्योंकि राजस्थान के पोखरण क्षेत्र फायरिंग रेंज में परीक्षणों के दौरान उनमें से एक बंदूक फट गई थी।

इस दुर्घटना में सेना के चार जवान घायल हो गए थे। फिर भी भारतीय सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने कहा था, “परीक्षण के दौरान विफलताएँ आएँगी लेकिन इनसे पीछे नहीं हटना चाहिए। समय पर समीक्षा और निर्माताओं को समस्या दूर करने के तरीके खोजने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।”

डीआरडीओ के वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया, ”यह संभवतः बारूद की कमी की वजह से हुआ था। बैरल के साथ कोई समस्या नहीं थी। सिक्किम और फिर पोखरण में पहले ही एटीएजीएस से 2,000 से अधिक राउंड फायर का सफलतापूर्वक परीक्षण हुआ है।” एटीएजीएस की मारक क्षमता 48 किलोमीटर के बराबर है। डीआरडीओ के अनुभवी वैज्ञानिक शैलेंद्र वी गडे ने इसे दुनिया की सबसे अच्छी हॉवित्ज़र तोप बताया था।

उन्होंने कहा, “बालासोर में प्रायोगिक स्थापना सीमा पर आगे के परीक्षण चल रहे हैं। सेना ऐसी बंदूकें क्यों आयात करे अगर 48 किलोमीटर लंबी मारक क्षमता के साथ बेहतर स्वदेशी विकल्प उपलब्ध हों? अन्य समकालीन बंदूकों की मारक क्षमता 40 से 45 किमी होती है।”

नए हथियार में ऑल-इलेक्ट्रिक ड्राइव तकनीक है। यह लंबे समय तक रखरखाव और विश्वसनीय संचालन सुनिश्चित करेगी।