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1988 में भारत के बहुमूल्य समर्थन को मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद ने सराहा
आईएएनएस - 4th November 2019

मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद ने 3 नवंबर 1988 को भारत के बहुमूल्य समर्थन के लिए उसकी प्रशंसा की। तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल गयूम की अपील के बाद भारतीय सेना ने वहाँ तख्तापलट की कोशिशों को नाकाम करने के लिए ऑपरेशन कैक्टस शुरू किया था।

मालदीव के 31वें विजय दिवस पर शाहिद ने कहा, “हम उन सभी का सम्मान करते हैं, जिन्होंने सौंपे गए कर्तव्यों को पूरे समर्पण के साथ निभाया और राष्ट्र की संप्रभुता को बनाए रखने के लिए लड़े। यह सच्चे दोस्तों और साझेदारियों को महत्व देने का दिन है। 1988 को भारत सरकार का अमूल्य सैन्य समर्थन हमारे दिलों में बना हुआ है।”

उन्होंने कहा, “उस दिन तख्तापलट का प्रयास ‘छोटे राज्यों द्वारा सामना की जाने वाली विशेष सुरक्षा खतरों और कमजोरियों को दर्शाता है। हम दृढ़ संकल्प के साथ अपनी संप्रभुता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए काम करते रहेंगे। साथ ही अपने सहयोगियों के साथ और मजबूत रिश्ता बनाएँगे।”

3 नवंबर 1988 को मालदीव के व्यापारी अब्दुल्ला लूथुफी ने समर्थित पीपुल्स लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ तमिल ईलम (प्लॉट) के 80 से 200 श्रीलंकाई आतंकवादियों के एक समूह ने मालदीव में तख्तापलट की कोशिश की। उन्होंने माले में घुसपैठ की और राजधानी के खास क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया।

इसके बाद मालदीव के राष्ट्रपति रहे अब्दुल गयूम ने मदद मांगी। उस वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार में भारतीय वायुसेना ने आगरा से माले तक कुछ 300 पैराट्रूपर्स को एयरलिफ्ट किया। वो हुलहुले द्वीप पर उतरे, जो मालदीव की सुरक्षा एजेंसियों के नियंत्रण में था।

अतिरिक्त भारतीय सैनिकों को हवाई विमानों और कोचीन से समुद्र के द्वारा ले जाया गया था। इसके अलावा, वायुसेना के मिराज को माले पर तैनात किया गया। भारतीय सैनिकों ने कुछ ही घंटों में माले पर नियंत्रण कर लिया और गयूम को बचा लिया था।