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“गुमनामी बाबा नहीं थे नेताजी सुभाष चंद्र बोस”- न्यायाधीश विष्णु सहाय आयोग

कई लोग मानते थे कि रहस्यमयी गुमनामी बाबा उर्फ ​​भगवानजी स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे लेकिन न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) विष्णु सहाय आयोग ने निष्कर्ष निकाला है कि ऐसा नहीं है। आयोग ने कहा, “गुमनामी बाबा नेताजी के अनुयायी थे और उनकी आवाज बोस जैसी थी।”

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, गुमनामी बाबा की मृत्यु 16 सितंबर 1985 को हुई थी। 18 सितंबर, 1985 को गुप्तार घाट (अयोध्या) में उनका अंतिम संस्कार हुआ था।

न्यायमूर्ति सहाय ने गुरुवार को राज्य विधानसभा में आयोग की 130 पन्नों की रिपोर्ट में बताया, “राम भवन (फैजाबाद, अब अयोध्या) के हिस्से से बरामद वस्तुओं से (जहाँ गुमनामी बाबा मृत्यु तक रहे थे) यह पता नहीं लगाया जा सका कि वह ही नेताजी थे। वह (गुमानी बाबा) नेताजी के अनुयायी थे। उन्होंने अपना निवास तब बदला, जब लोग कहने लगे कि वह बोस हैं।”

आयोग ने माना कि वह संगीत, सिगार और भोजन के शौकीन थे। उनकी आवाज़ नेताजी की तरह थी। वह बंगाली थे, जो बंगाली, अंग्रेजी और हिंदी में पारंगत थे। उन्हें युद्ध और समकालीन राजनीति का गहरा ज्ञान था। वह भारत में शासन की स्थिति में रुचि नहीं रखते थे।

एक सदस्यीय न्यायमूर्ति सहाय जाँच आयोग की स्थापना 28 जून 2016 को जाँच आयोग अधिनियम 1952 के प्रावधानों के तहत की गई थी। 19 सितंबर 2017 को आयोग ने अपनी रिपोर्ट दी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 31 जनवरी 2013 को आयोग गठित करने का आदेश दिया था।

सहाय ने कहा, “16 अक्टूबर 1980 को कोलकाता से बुलबुल द्वारा लिखा एक बंगाली पत्र है।” उन्होंने बुलबुल के पत्र को पढ़ते हुए कहा कि आप मेरे यहाँ कब आएँगे। यदि आप नेताजी के जन्मदिन पर आएँगे तो हमें बहुत खुशी होगी। इसने यह स्पष्ट कर दिया कि गुमानी बाबा नेताजी नहीं थे।”