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मस्जिद समितियों को मिल सकता है असम में अप्रवासी मुस्लिमों की पहचान का दायित्व

असम में अप्रवासी मुस्लिम समुदायों की पहचान के लिए आसपास की मस्जिद समितियों को आधिकारिक तौर पर जनगणना के दौरान असमिया बोलने वाले मुसलमानों की जातीयता को सत्यापित करने का काम सौंपा जा सकता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, असम अल्पसंख्यक विकास बोर्ड का मस्जिद समितियों को आधिकारिक सत्यापन प्राधिकरण बनाने का प्रस्ताव जनगोष्ठी समन्य परिषद के एक अभियान के तहत आता है। इसमें राज्य के 40 लाख असम की भाषा बोलने वाले मुसलमानों को अपने नाम के आगे पुश्तैनी या जातीय उपनाम जोड़ने के लिए हलफनामा दाखिल करना होगा।

बोर्ड के चेयरमैन मोमिनुल असवाल ने पहले ही अपना नाम बदलकर मुमिनुल ऑवल गोरिया करने का हलफनामा दायर कर दिया है। उनका जातीय उपनाम उनकी जातीय समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है। अधिकांश मूल मुस्लिम 15वीं शताब्दी के अपने वंश से आते हैं लेकिन उनके पास अपनी विरासत के कोई दस्तावेज नहीं हैं।

मुमिनुल ऑवल कहते हैं, “सरकार जनगणना के तौर-तरीकों को अंतिम रूप दे रही है। हम जानते हैं कि चुनौतियाँ होंगी। यही वजह है कि पहचान और सत्यापन का कार्य स्थानीय मस्जिद जमात राजस्व विभाग के प्रगणकों की मौजूदगी मे करेगी। अगर एक भी अप्रवासी मुस्लिम जातीय उपनाम जोड़कर मूल निवासी के रूप में खुद को साबित करने की कोशिश करेगा तो स्थानीय मस्जिद समिति उसकी पहचान कर लेगी।

एक बार जनगणना की कवायद अधिसूचित होने के बाद असमिया बोलने वाले मुसलमानों को ऑनलाइन आवेदन करने की ज़रूरत होगी। उनका सत्यापन राजस्व विभाग के जमातों और अधिकारियों द्वारा किया जाएगा। अल्पसंख्यक विकास बोर्ड ने देशी मुसलमानों को चार वर्गों गोरिया, मोरिया, देसी और जोला चाय जनजाति में बाँटने का प्रस्ताव दिया है।