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धर्मांतरण कर आलिया बनने वाली प्रियंका की “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” के पक्ष में न्यायालय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कथित धर्मांतरण से संबंधित मामले में सुनवाई करते हुए कहा, “हर व्यक्ति को अपनी पसंद के व्यक्ति संग रहने का अधिकार है। चाहे वह किसी भी धर्म का हो। यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है।”

हिंदुस्तान लाइव की रिपोर्ट के अनुसार, यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज नकवी और न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की खंडपीठ ने कुशीनगर के सलामत अंसारी और प्रियंका खरवार उर्फ ​​आलिया की याचिका पर दिया। न्यायालय ने युवती के पिता की ओर से दर्ज कराई एफआईआर खारिज कर दी।

खंडपीठ ने कहा, “हम यह समझने में नाकाम हैं कि कानून जब दो व्यक्तियों, चाहे वे समान लिंग के ही क्यों न हों, को शांतिपूर्वक रहने की अनुमति देता है तो किसी को उनके रिश्ते पर आपत्ति करने का अधिकार नहीं है।”

खंडपीठ ने प्रियांशी उर्फ समरीन और नूरजहाँ बेगम उर्फ अंजलि मिश्रा के मामले में इसी उच्च न्यायालय की एकल पीठ के निर्णयों से असहमति जताते हुए कहा, “दोनों मामलों में दो वयस्कों को अपनी मर्जी से साथी चुनने और रहने की स्वतंत्रता के अधिकार पर विचार नहीं किया गया। ये फैसले सही कानून नहीं हैं।”

बीते दिनों इसी न्यायालय ने कहा था कि सिर्फ शादी के उद्देश्य से धर्मांतरण अस्वीकार्य है। उस मामले में लड़की जन्म से मुस्लिम थी और उसने हिंदू धर्म को अपना लिया था।

न्यायालय ने कहा था, “यदि धर्मांतरण धार्मिक भावनाओं से प्रेरित न हो और फायदे के लिए किया गया हो, यदि यह धर्मांतरण किसी अधिकार के दावे का आधार बनाने या अल्लाह के एकात्मवाद या पैगम्बर मोहम्मद पर भरोसा किये बिना शादी से बचने के उद्देश्य से किया गया हो, तो यह धर्म परिवर्तन प्रामाणिक नहीं माना जाएगा। धर्म परिवर्तन के मामले में मूल धर्म की रीति-नीतियों के बदले नये धर्म की रीति-नीतियों के प्रति हृदय परिवर्तन होना और ईमानदार आस्था का होना जरूरी है।”