विचार
नैरेटिव ध्वस्त होने के बाद शुरू हो गया कैंसल कल्चर
मनु - 5th April 2022

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते।
इति मत्ता भजन्ते माम् बुधा भाव समन्विताः।।
-श्लोक 8, अध्याय 10, श्रीमद्भगवद्गीता

(मैं ही संपूर्ण जगत की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत चेष्टा करता है, इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान भक्तजन मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजते हैं।)

वर्तमान समय संचार का युग है। परिवहन के साथ-साथ विचारों का परिवहन इस युग की सबसे बड़ी विशेषता है। सोशल मीडिया और इंटरनेट ने इसे जन-जन से जोड़ दिया है। विचारों का आदान-प्रदान, विवाद, आक्षेप-विक्षेप से हर किसी के फोन, समाचार पत्र, टीवी भरे पड़े हैं।

खबरों पर किसी एक मीडिया हाउस, सरकार या कुछ विशेष लोगों का एकाधिकार नहीं रह गया है। हालाँकि तंत्र पर वर्षों से कब्जा जमाए लोग ऐसा करने की भरपूर कोशिश करते हैं, परंतु सत्य यहाँ-वहाँ से फूटकर बाहर निकल ही आता है।

वर्षों से बनाए घिसे-पिटे नैरेटिव ध्वस्त होने लगे हैं। लोगों ने तथाकथित इतिहासकारों, पत्रकारों, एजेंडावादियों के मुँह पर तथ्यों के तमाचे मारना शुरू कर दिए हैं। दशकों के बनाए झूठे महल दरक रहे हैं, दीवारें टूट रही हैं। दरकती दीवारों के पीछे से स्याह सच्चाइयाँ दुनिया को अपना चेहरा दिखा रही हैं।

कश्मीरी पंडितों के नरसंहार, मज़हबी उन्माद, न्याय, शासन, बुद्धिजीवियों के शिखंडीपन को दर्शाती, निर्देशक एवं फिल्म निर्माता विवेक रंजन अग्निहोत्री की द कश्मीर फाइल्स इसका नवीनतम उदाहरण है। इस फिल्म ने समाज की झूठी शालीनता और धूर्त चुप्पी के मुखौटे को उखाड़ फेंका है।

जैसा अभूतपूर्व जनसमर्थन इसे मिला वैसे ही इसको दबाने की कोशिशें भी शुरू हो गईं। जैसे कि दिल्ली के मुख्यमंत्री का विधानसभा में निंदनीय अट्टहास एवं मूर्खतापूर्ण सुझाव कि इसे यूट्यूब पर डाल देना चाहिए।

नैरेटिव ध्वस्त होने के क्रम में इस वर्ष की दूसरी मुख्य घटना रूस-यूक्रेन युद्ध रही। जिसमें अन्य सभी चीजों के अतिरिक्त अमेरिका सहित पश्चिमी देशों ने अपने प्रतिनिधियों एवं पत्रकारों के माध्यम से भारत पर रूस के विरुद्ध जाने का दबाव डाला, जिसे भारत एवं भारत की जनता दोनों ने अनसुना कर तथ्यों का आईना दिखा दिया।

इस सारे प्रकरण में दो मुख्य बातें उभरकर सामने आईं पहली कि लोग विशेषकर जिन्हें मीडिया भारतीय राइट विंग के नाम से जानती है, सालों के बनाए वामपंथी स्मोकस्क्रीन को हटाकर सच सामने लाने में सक्षम है और ऐसा करने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है जो अपने देश, धर्म, संस्कार, भाषा, ज्ञान, इतिहास के प्रति आश्वस्त है और अपनी इन पहचानों को गर्व के साथ धारण करते हैं। 2014 के राजनीतिक बदलाव के बाद आए बदलावों में यह प्रभाव प्रमुख रूप से दृष्टिगत है जो सराहनीय एवं स्वागत योग्य है।

किंतु इसके साथ-साथ एक दूसरी बात भी दृष्टिगोचर हुई है जो इसका दुष्प्रभाव या मानव स्वभाव के मूलभूत गुणों के कारण है, वह है- कैंसल कल्चर। सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति एवं उसके विचार सार्वजनिक हैं, 24*7। कोई भी बात कहे जाने के बाद यहाँ से कभी भी गायब नहीं होती है, लोग समय आने पर पुरानी बातें पुनः सामने लाकर प्रस्तुत कर देते हैं- अमुक रिपोर्टर पहले ऐसा बोलती थी, इस निर्देशक ने ऐसा घटिया व्यक्तव्य दिया था, इस कंपनी ने इस विवादित व्यक्ति से संबंध रखा था, इस लेखक ने अमुक व्यक्ति के बयान के बारे में कुछ नहीं कहा, इसलिए इन पर विश्वास नहीं है।

यह व्यवहार वास्तव में दोधारी तलवार की तरह है, एक तरफ यह समाज को सतर्क रखता है और अंधश्रद्धा नहीं होने देता, परंतु कभी-कभी यह कैंसल कल्चर स्वयं के लिए ही नुकसानदेह होता है। ऐसे समय में, जब पर्दे के पीछे से शक्तिशाली शत्रु धन,  रिलीजन, षड्यंत्र के ज़रिये अपनी मोहरें चल रहे हों और देश के अंदर उनके प्यादे एक सफल तंत्र के रूप में उनका कार्यसंपादन कर रहे हों, वैसे समय में उन आवाज़ों को किनारे कर देना जो मूलरूप से आपको कुछ सहायता ही दे रही हैं, आत्मघाती है।

महाभारत का युद्ध धर्म एवं अधर्म के बीच कहा जाता है। परंतु क्या जो योद्धा पांडव पक्ष से लड़े वे सब धर्मात्मा ही थे और उनका अपना कोई निजी स्वार्थ था ही नहीं? या फिर कौरवों की तरफ खड़े सभी लोग अधर्मी ही थे? बहुत से लोग समय की दिशा को भाँपकर और कुछ नैतिक आधार पर अलग-अलग पक्षों में चले गए थे।

फिर हमें क्यों हर व्यक्ति पूर्ण रूप से अपने जैसा विचारसम्मत ही चाहिए। ब्रह्मांड में हर कण तक अद्वितीय है तो दो व्यक्ति कैसे समान विचार और लक्ष्य के हो सकते हैं। समझदारी तो यह है कि जब, जहाँ, जिससे भी अपने विचार मिलें, कुछ अच्छा लगे, ग्रहण किया जाए एवं समर्थन किया जाए। जो न पसंद आए उसे छोड़ा जए, जो गलत हो उसका विरोध किया जाए।

रहिमन सच्चा संत तो जैसे सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहे थोथा देत उड़ाय।।

सांस्कृतिक, राष्ट्रीय एका हर छोटी बात को पकड़ कर बैठ जाने से नहीं बनती और बिना एका के आप एक फूस के तिनके के बराबर है, जिसे हल्की सी हवा कहा कहीं भी उड़कर ले जा सकती है। अकेले तिनकों से सागरविजयी यान नहीं बना करते।

यदादचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।

मनु विज्ञान में परा-स्नातक हैं। वे भारतीय इतिहास और धर्म पर अध्ययन एवं लेखन करती हैं।