भारती / राजनीति
भारत में मुस्लिम विलगाव का सच- मदीना मानसिकता के कारण बढ़ी मुख्यधारा से दूरी

कोई संदेह नहीं है कि भारत में लगभग 20 करोड़ की मुस्लिम जनसंख्या का राजनीति में प्रतिनिधित्व कम है। सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी नौकरियों में भी इसका प्रतिनिधित्व कम है और माना जाता है कि भारत के अन्य धार्मिक समूहों की तुलना में मुस्लिमों का जीवन स्तर भी नीचा है।

लेकिन इसके बावजूद भारत के कुशल राजनीतिक लेखकों में से एक शेखर गुप्ता का उन्हें “भारत के 20 करोड़ एलियन” कहना समझ से परे है। मुस्लिम “विलगाव” से संबंधित कुछ विषयों का वे सही विश्लेषण करते हैं (भाजपा की सत्ता प्राप्ति और अन्य पार्टियों द्वारा हिंदू वोट बैंक बचाने के लिए स्वयं को मुखर मुस्लिम समर्थक न दिखाने का प्रयास)।

परंतु वे इस कथित “विलगाव” के दो प्रमुख कारणों को देखने का प्रयास नहीं करते हैं- मीडिया और भारतीय मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने का “सेक्युलरिज़्म” तथा मुस्लिमों का स्वयं को मुख्यधारा से पृथक् कर लेना।

मीडिया और वामपंथी-उदारवादी वर्गों में लगातार यह मान्यता रही है कि किसी भी परिस्थिति में मुस्लिम को सिर्फ एक पीड़ित की तरह ही दिखाया जा सकता है। यह तब प्रत्यक्ष हो गया जब नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध में मुख्यधारा मीडिया और वामपंथी-उदारवादी लॉबी मुखर रूप से उतर आए थे।

भारतीय मुस्लिमों पर किसी प्रकार का प्रभाव न डालने वाले सीएए को मुस्लिम-विरोधी कहा गया। संभवतः यह दर्शाना कि पड़ोस के इस्लामवादी शासनों में हिंदू अल्पसंख्यक पीड़ित हैं, यह भारतीय मुस्लिमों को नहीं पचा।

जब भी कहीं भी इस्लामवादी असहिष्णुता दिखती है (जैसा हाल में अफगानिस्तान में हुआ), तो तुरंत ही भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या विश्व हिंदू परिषद् से उसकी गलत तुलना करने के प्रयास होने लगते हैं जो मुद्दे को भटकाने का प्रयास मात्र है।

इतिहासकार इरफान हबीब ने कुछ समय पहले ऐसा किया था जब इस्लामिक स्टेट की बर्बरताओं से विश्व चौंका हुआ था। हाल में ऐसा फिल्म पटकथा लेखक एवं गीतकार जावेद अख्तर ने किया जब उन्होंने संघ से तालिबान की तुलना की।

यह संभवतः क़ुरान से वैधता प्राप्त करने वाली इस्लामवादी ताकत की आलोचना करने की शर्मिंदगी से भारतीय मुस्लिमों को बचाने का प्रयास है क्योंकि स्वयं वे उसी क़ुरान को पूजते हैं। जब भारतीय मुस्लिमों के सामने कठिन प्रश्न आता है कि वे अपने कट्टरपंथियों का सामना करें, तब भारत में सेक्युलरवादी उन्हें इस चुनौती से बचाने पहुँच जाते हैं।

हालाँकि, इस लेख में हम दूसरे कारण पर अधिक बात करेंगे कि कैसे मुस्लिमों ने स्वयं को मुख्यधारा से पृथक् कर लिया। वास्तव में यह चलन मोहम्मद (मुस्लिम जिन्हें अपना पैगंबर मानते हैं) के समय से ही है जब वे अपने अनुयायियों को मक्का से बाहर ले गए थे।

जब मक्का में कई मजहबी गुरु थे तब मोहम्मद को बस कुछ सौ अनुयायी ही मिल सके थे। जब वे मदीना भाग गए, तब ही इस्लाम शक्तिशाली हुआ और इसका कारण यह नहीं था कि मोहम्मद बेहतर गुरु थे, बल्कि वे राजनेता और सेना प्रमुख बन गए थे।

हिंसा करने की उनकी क्षमता और राजनीतिक इस्लाम के आविष्कार ने मदीना के बाद मुस्लिम सेनाओं को सफलताएँ दिलाईं, मोहम्मद के जीवनकाल में भी और उसके बाद भी। इस मदीना मानसिकता को समझने की अवश्यकता है।

जिन देशों में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, वहाँ वे जनसांख्यिकी रूप से बढ़ने के लिए स्वयं को कुछ क्षेत्रों में सीमित कर लेते हैं। इससे वे गैर-मुस्लिम जनसंख्या में मिल-जुल नहीं पाते हैं। इस मदीना मानसिकता को वेंकट धुलिपाला की पुस्तक क्रिएटिंग अ न्यू मदीना में अच्छे से समझाया गया है।

इसमें बताया गया है कि जिन प्रांतों में मुस्लिम अल्पसंख्यक थे, वहाँ पर उनके क्या विचार थे और कैसे उन्हें विभाजन का विचार बेचा गया था जबकि वे सभी प्रवासन या विभाजित भारत में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित नहीं कर सकते थे।

मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग को सर्वाधिक मत यूनाइटेड प्रांतों और मुस्लिम घनत्व वाले क्षेत्रों, दक्षिण में भी, मिले थे। वहीं मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में इतना उत्साह नहीं था। वास्तव में भारतीय मुस्लिमों के पूर्वजों ने ही विभाजन से पहले जिन्ना को बढ़ावा दिया था।

उन्होंने इस वास्तविकता को स्वीकारा कि अंततः जीत प्राप्ति के लिए पहले मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को अलग किया जाना चाहिए, भले ही फिर विभाजन के बाद मुस्लिम और छोटे अल्पसंख्यक हो जाएँ। 1947 के बाद “सेक्युलर” कांग्रेस व अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के हित में था कि मुस्लिमों के सीमित क्षेत्र का बढ़ने दिया जाए जिससे थोक में मत मिल सकें।

लेकिन सेक्युलर पार्टियाँ मदीना मानसिकता के मुस्लिमों की स्वेच्छा के बिना यह नहीं कर सकती थीं जो अल्पसंख्यकों के रूप में पृथक् रहना चाहते हैं। इस स्व-विलगाव में तबलीगी जमात ने सहायता की जिसकी स्थापना 1926 में भारत में हुई थी।

प्रारंभिक उद्देश्य था मेवात मुस्लिमों को उनकी पारंपरिक प्रथाओं से अलग करके “सच्चा” मुसलमान बनाना। तब से जमात, जो एक सुन्नी मुस्लिम मिशनरी नेटवर्क है, का विस्तार 100 से अधिक देशों में हो गया है और उसके 8 करोड़ से अधिक अनुयायी हैं जिनमें से अधिकांश भारतीय उप-महाद्वीप से हैं।

भारतीय मुस्लिमों को उनकी परंपराओं से दूर करके परोक्ष रूप से मुख्यधारा से उन्हें अलग कर दिया जाता है। इसी स्व-विलगाव मानसिकता के कारण कुछ सेक्युलर मुस्लिमों को वंदे मातरम् का गान या विद्यालयों में योग, “सांप्रदायिक” लगता है।

लेकिन बात सिर्फ तबलीग या वंदे मातरम् की नहीं है। अधिकांश इस्लामी विचारों में मुस्लिमों के लिए एक अलग पारिस्थितिकी-तंत्र बनाने की बात होती है जिसमें वे जबरदस्ती स्वयं को औरों से अलग दिखा सकें। इसी विचार के तहत अलग पर्सनल लॉ की माँग उठती है।

उसी प्रकार शरीयत या इस्लामी बैंकिंग की ओर रुझान और हलाल के लेबल पर ज़ोर, न सिर्फ मांस के लिए बल्कि सभी उत्पादों के लिए, भी देखा गया है। चाहे अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक, इस्लामी पारिस्थितिकी-तंत्र या तो स्वयं को मुख्यधारा से अलग कर लेता है या कई देशों में अपने कुछ मूल्य बहुसंख्यकों पर थोपने का प्रयास करता है।

जैसा नसीम निकोलस तालेब कहते हैं, बहुसंख्यक व असहिष्णु अल्पसंख्यक के द्वंद्व में जीत हमेशा अल्पसंख्यक की होती है। लेकिन जब चोरी-चुपके बन रहे इस्लामी पारिस्थितिकी-तंत्र का थोड़ा भी विरोध होता है तो उदारवादी व सेक्युलरवादी इसे बहुसंख्यकों की सांप्रदायिकता कह देते हैं।

मुस्लिमों के स्व-विलगाव की समस्या को भारत की “सेक्युलर” पार्टियों ने बढ़ाया है जो उन्हें पीड़ित होने का भाव देकर इस मानसिकता को बढ़ावा देते हैं। यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) काल में सच्चर समिति से इसका आरंभ हुआ।

रिपोर्ट में बताया गया कि सामाजिक-आर्थिक रूप से मुस्लिम कैसे पिछड़े हैं। समस्या रिपोर्ट नहीं है परंतु समस्या वह है जो रिपोर्ट में नहीं बताया गया- यह पिछड़ापन आया कहाँ से। संप्रदाय के अपने कृत्यों ने इसे पीछे और भय-फैलाने तथा पतित तत्वों एवं बलों के प्रति भेद्य रखा।

मान भी लें कि हिंदू-बहुल भारत में मुस्लिमों के साथ सूक्ष्म भेदभाव हुआ लेकिन संप्रदाय के पीछे रहने का कारण दो विभाजन हैं- पहला तो 1947 में हुआ भारत का विभाजन और दूसरा, विभाजन के बाद भारत में मुस्लिम मस्तिष्क का हुआ विभाजन।

कहा जाता है कि वीर सावरकर और हिंदू महासभा ने दो राष्ट्रों का सिद्धांत दिया था परंतु वास्तविकता यह है कि मोहम्मद अली जिन्ना से पहले कई मुस्लिम नेताओं ने दोनों समुदायों के अलगाव पर ज़ोर दिया था जिसकी शुरुआत 19वीं शताब्दी के अंत में सर सैयद अहमद खान ने की थी।

उनका कहना था कि एक देश में बराबरी वालों की तरह हिंदू और मुस्लिम नहीं रह सकते हैं। ब्रिटिश भारत में रह रहे दो राष्ट्रों के विषय में 1888 में मेरठ के एक सम्मेलन में उन्होंने कहा था, “मान लें कि सभी अंग्रेज़ व अंग्रेज़ी सैनिक भारत से चले जाएँ, अपनी तोपें और हथियार और सब कुछ ले जाएँ, तब भारत के शासक कौन होंगे?

क्या यह संभव है कि ऐसी परिस्थिति में दो राष्ट्र- मोहम्मदन और हिंदू- एक ही सत्ता की कुर्सी पर बैठें और समान शक्तियाँ रखें? बिल्कुल नहीं। आवश्यकता है कि उनमें से कोई एक दूसरे पर विजय पाए और शासन करे। दोनों समान रह सकते हैं, इसकी अपेक्षा करना असंभव की कामना करना है।”

खिलाफत आंदोलन के मुस्लिम नेता- मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली- भले ही उन्हें गांधी का समर्थन प्राप्त था लेकिन उनका मानना था कि भारत में मुस्लिमों की अलग और ऊँची जगह है। वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम में विश्वास रखते थे लेकिन भारत के प्रति उनके विचारों में दोहरापन था। 1930 में हुए गोल मेज सम्मेलन में मोहम्मद अली ने भारत में अपनी मुस्लिम पहचान पर कहा था-

“मेरी संस्कृति, मेरी राजनीति और जीवन दर्शन का मूल इस्लाम है… जैसा अल्लाह का आदेश है, मैं पहले एक मुस्लिम हूँ, फिर एक मुस्लिम हूँ और अंततः मुस्लिम ही हूँ, कुछ और नहीं, बस मुस्लिम। यदि आप मुझसे कहोगे कि मैं आपके साम्राज्य या राष्ट्र में अपने विचार, राजनीति, संस्कृति, मान्यताओं को छोड़कर आऊँ तो मैं ऐसा नहीं करूँगा।”

असहयोग आंदोलन के समय मोहम्मद अली गांधी का सम्मान करते थे लेकिन देखिए गांधी के लिए उन्होंने क्या कहा था, “श्री गांधी का चरित्र कितना ही शुद्ध क्यों न हो, मजहब की दृष्टि से वे किसी ऐसे मुसलमान से भी कम ही हैं जिसका कोई चरित्र नहीं है।”

वीर सावरकर पर विक्रम संपत की पुस्तक के दूसरे भाग में एक रोचक संवाद का उद्धरण है। कथित रूप से मौलाना शौकत अली 1925 में सावरकर से मिलने गए थे जहाँ उन्होंने हिंदुओं को संगठित करने के सावरकर के विचार पर कहा था कि हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए इस विचार से पीछे हट जाना चाहिए।

अली ने कहा कि हिंदू संगठन के कारण हिंदू-मुस्लिम एकता और भारत का स्वतंत्रता संग्राम प्रभावित हो रहा है, तब सावरकर ने कहा कि यह बात अली पर भी लागू होती है जो मुस्लिमों को संगठित करने का प्रयास कर रहे हैं। सावरकर कहते हैं,

“हिंदू संगठन अभियान को छोड़ने की घोषणा मैंने इसलिए नहीं की है कि पहले आप ऐसी घोषणा करेंगे। मैं जानना चाहता हूँ कि खिलाफत आंदोलन और अल-उलेमा आंदोलन को कब छोड़ने का विचार कर रहे हैं आप। जैसे ही आप ऐसा कर देते हैं, मैं भी अपना अभियान छोड़ दूँगा।”

इससे मौलाना क्रोधित हो गए क्योंकि उनकी दृष्टि में हिंदू संगठन अभियान को बंद करवाने के लिए वे क्यों मुस्लिम संगठन का त्याग करें। मैं दोहराता हूँ कि भारत में पहचानों के विषय में मुस्लिमों की पहुँच दोहरी है जो मस्तिष्क का विभाजन कर सकती है और संप्रदाय को संप्रदाय से अलग कर सकती है।

इसलिए सच्चर समिति की रिपोर्ट को मैं स्वीकारता हूँ जो कहती है कि भारत में मुस्लिम पिछड़े हैं परंतु इसमें त्रुटि है कि ऐसा होने में स्वयं संप्रदाय की क्या भूमिका रही, इसकी बात नहीं की गई है। केंद्र के पूर्व नौकरशाह स्वर्गवासी नीतीश सेनगुप्ता ने मुस्लिम पिछड़ापन के कारणों पर सच्चर समिति के विश्लेषण में गंभीर त्रुटियाँ रेखांकित की थीं।

तब मैंने फर्स्टपोस्ट में लिखा था, “विभाजन के कारण मुस्लिमों की आर्थिक स्थिति निम्न रही क्योंकि श्रेष्ठ और बुद्धिमान पाकिस्तान चले गए थे। यानी भारतीय मुस्लिमों में संभ्रांत वर्ग रहा ही नहीं।” सेनगुप्ता ने लिखा था, “जो मुस्लिम भारत में रहे, वे अधिकांश ग्रामीण, स्वरोजगार चलाने वाले और सेवा प्रदाता थे।

शक्तिशाली मुल्लाओं के प्रभाव में अधिकांश आधुनिक शिक्षा से बचे और इसी कारण आधुनिक नौकरियों व व्यवसाय में भी पिछड़ गए। इस प्रकार सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों की भागीदारी शून्य से शुरू हुई थी। इसका उल्लेख रिपोर्ट के विश्लेषण में होना चाहिए था। इसका न होना एक सांख्यिकी त्रुटि है।”

सच्चर के हाथ भारतीय मुस्लिम मस्तिष्क को और अधिक विभाजित करने, उसे पीड़ित महसूस करवाने और स्व-विलगाव को बढ़ावा देने से अधिक कुछ नहीं लगा। लेकिन आज की वास्तविकता अलग है। सार्वजनिक क्षेत्र के नेतृत्व में जो प्रगति की पहली लहर थी, उससे भले ही मुस्लिम अछूते रह गए थे।

परंतु 1991 के बाद से उदार अर्थव्यवस्था में जहाँ निजी क्षेत्र और निजी व्यापार बढ़े हैं, वहाँ उनके साथ कोई भेदभाव नहीं हो रहा है। तथ्य है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों जैसे मनोरंजन, छोटे सेवा केंद्र, खुदरा एवं रसद, वाहन एवं उपकरण मरम्मत केंद्र, आदि में जनसंख्या में अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व है उनका।

हिंदू पहले सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में सहज थे लेकिन अब निजी क्षेत्र के बढ़ते उद्योगों में उन्हें अपना स्थान खोजना होगा। आरक्षण व सरकारी नौकरियाँ भविष्य में दुर्लभ होंगे। नौकरी बाज़ार और स्टार्ट-अप व्यापार के ट्रेंड एवं जनसांख्यिकी का लाभ मुस्लिमों को होगा।

किसी भी राजनीतिक दल या सरकार से अधिक मुस्लिमों का स्व-विलगाव भारत की उदार अर्थव्यवस्था में उनकी प्रगति के आड़े आया है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर एक सरल प्रश्न है- मुस्लिम क्यों पीछे हैं? इसमें सेक्युलर पार्टियों का हाथ है या उनका आत्म-मुग्ध व्यवहार?

हमने देखा है कि चुनावों के समय हिंदू राजनेता मुस्लिमों को लुभाते हैं। क्या हमने देखा है कि कोई मुस्लिम राजनेता हिंदू मतदाताओं को लुभाने का प्रयास कर रहा हो? क्या मुस्लिम राजनीति सिर्फ मुस्लिमों के मुद्दे उठाने तक ही सीमित है?

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।