राजनीति
डीएनए एक है- मोहन भागवत का यह बयान आपकी सोच से कई अधिक हिंदुत्ववादी है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा था कि हिंदुओं और मुस्लिमों का डीएनए एक है जिसके बाद उनकी काफी आलोचना की गई तथा उन्हें ट्रोल किया गया था। उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद स्थित डासना देवी मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद ने तो यह तक कह दिया था कि ‘संभवतः भागवत में वही डीएनए हो जो औरंगज़ेब में था परंतु “हम में वह नहीं” है।’

डॉ मोहन भागवत ने जो कहा वह शक्ति का सूचक है, वहीं यति नरसिंहानंद जैसे बयान भय और कुंठा दर्शाते हैं, भले ही ऊपर से वे साहसी लगते हों। सांस्कृतिक शुद्धता की तरह ही अनुवांशिक शुद्धता एक मिथ्या है। इस प्रकार की शुद्धताओं को खोजने या गढ़ने के प्रयास प्रायः आत्मघाती रूप ले लेते हैं जैसा कि तमिलनाडु में द्रविड़वादी आंदोलन के साथ हुआ।

यह विचारधारा ‘शुद्ध तमिल’ की खोज करती है लेकिन वास्तव में इसने तमिल भाषा की आत्मा और स्वाभाविक प्रवाह एवं वृद्धि को रोका है। हमारा डीएनए न सिर्फ अन्य संप्रदाय और अन्य देश के लोगों से मेल खाता है, बल्कि लुप्त हो चुकी दूसरी मानव प्रजातियों जैसे नियैन्डर्थल से भी मेल खाता है।

कड़े परिश्रम से की गई खोजों के टुकड़ों को जोड़कर और डीएनए विश्लेषण करने के बाद मानव विकास की क्रमागत उन्नति का जो प्रारूप बनाया गया है, यदि वह सही है तो इसपर संदेह का कोई कारण नहीं रह जाता कि हम सब अफ्रीकी हैं। वास्तव में ‘भारतीय डीएनए’ जैसा कुछ होता ही नहीं है।

डॉ भागवत सही कह रहे हैं कि भारत में हिंदुओं और मुस्लिमों का डीएनए एक है। भारत के मुस्लिम अधिकांश रूप से धर्मांतरित हिंदू ही हैं जिसके कई ऐतिहासिक कारण रहे हैं- मुख्य रूप से अस्तित्व और सत्ता के लिए। आधुनिक संदर्भ में भले ही मतांतरण का कारण ‘इस्लाम एक समतावादी मत है’ कहा जाता है लेकिन किसी अन्य मजहबी-कानूनी प्रणाली की तरह यह भी सामाजिक रूप से असमतावादी ही था।

(‘इस्लाम का समतावाद’ और ‘बौद्ध संप्रदाय का जाति-विरोधी चरित्र’ नई अवधारणाएँ हैं लेकिन इसके बावजूद कुछ सुहृदयी हिंदू सुधारवादियों ने इन तर्कों के आधार पर हिंदू समाज में सुधार लाने के प्रयास किए हैं।)

मुख्य बिंदु यह है कि भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अधिकांश मुस्लिमों की वंशावली अरब के मुस्लिमों की तुलना में हिंदुओं के अधिक निकट है। भारत में मुस्लिमों और हिंदुओं के एक मूल पर प्रकाश डालना मुस्लिमों तक पहुँच बनाने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है।

हिंदुत्व कोई अनन्य विचारधारा नहीं है। यह एक समावेशी राष्ट्रीय दृष्टिकोण है। एक हिंदूत्ववादी नहीं चाहता है कि भारतीय मुस्लिम को दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह रखा जाए। बल्कि वह उसे एकाधिकारवादी-विस्तारवादी ताकतों द्वारा शोषण के प्रति भेद्य मानता है।

एक हिंदुत्ववादी चाहता है कि भारतीय मुस्लिम माने कि भारत की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत उसके लिए भी है, भले ही वह इसे त्यागना चाहता हो। श्रीराम और श्रीकृष्ण, उपनिषद और गीता, भक्ति और योग भारतीय मुस्लिमों की भी विरासत हैं।

पूरे इस्लामिक विश्व ने जितने सूफी नहीं दिए हैं, उतने सूफी संभवतः अकेले भारत में हुए हैं। आरएसएस की दैनिक प्रातः प्राथनाओं में कबीर और रसखान को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सैकड़ों स्वयंसेवक दशकों से सम्मान देते आए हैं।

यहाँ नेहरूवादी प्रकार के मतांध सूफियों की बात नहीं हो रही है। आक्रामक मतांतरण कराने वाले सूफी भी हुए हैं लेकिन बुल्ले शाह जैसे सूफी भी हुए हैं जिन्होंने कहा था, ‘अगर न होते गुरु गोबिंद सिंह सुन्नत होती सबकी’।

20वीं शताब्दी में जब आक्रामक इस्लाम बढ़ रहा था, तब भी योगी अल्लाह यार खां हुए जो प्रेरणादायक रूप से इसके विरुद्ध खड़े हुए। शिरडी साईं बाबा को कई हिंदू घरों में पूजा जाता है, हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में कुछ प्रगतिविरोधी आवाज़ें इसका विरोध करने लगी हैं।

एक मुस्लिम साध्वी हज़रत बाबाजां को अफगानिस्तान में कट्टरपंथियों ने जीवित दफना दिया था। वे भागकर आईं और तथाकथित ‘ब्राह्मणवादी’ पुणे में शरण ली। भारतीय मुस्लिमों की संजातीय, सांस्कृतिक और सामाजिक भारतीय जड़ों पर ज़ोर देकर डॉ भागवत आह्वान कर रहे हैं कि वे (और कुछ हिंदू भी) कृत्रिम पूर्वाग्रहों और थोपे गए मजहबी सिद्धांतों की सीमाओं को त्यागकर मुक्त हो जाएँ।

वे एकता के भाव के साथ उन्हें साथ आने के लिए कह रहे हैं ताकि राजनीतिक इस्लाम का कट्टरवादी नेतृत्व उन्हें जिन रियायतों और विशेषाधिकारों के माध्यम से अलग रखना चाहता है, वह न हो पाए। मुक्ति के लिए आह्वान तुष्टिकरण नहीं है।

दुर्भाग्यवश एक नई पीढ़ी का उदय हो रहा है जो ‘गोयल-एल्स्ट सिंड्रोम’ से संक्रमित है। मैं स्पष्ट कर देता हूँ कि इस सिंड्रोम (रोग के लक्षण) का सीताराम गोयल और कोएनराड एल्स्ट से अधिक लेना-देना नहीं है। दोनों ही बौद्धिकों ने अंग्रेज़ी-भाषी हिंदुओं के बीच हिंदू विवेक को जागृत करने के लिए बहुत बड़े योगदान दिए हैं जो उनके बिना मार्क्सवाद और नेहरूवाद की चकाचौंध की ओर आकर्षित हो जाते।

गोयल और एल्स्ट ने जिस समर्पण और कठिन परिश्रम में अपना जीवन व्यतीत कर दिया, वह किए बिना नए कीबोर्ड योद्धाओं ने सिर्फ संघ की आलोचना को आत्मसात कर लिया है और यह आलोचना अब घृणा का रूप ले चुकी है।

कई बार तो यह घृणा डॉ एल्स्ट के प्रति भी देखने को मिलती है जब वे पंथनिरपेक्ष मानववादी सत्यों की बात करते हैं जिसे कट्टरपंथी पचा नहीं पाते। तब डॉ एल्स्ट को ‘श्वेत नस्लवादी’ कह दिया जाता है। अयोध्या आंदोलन के शिखर पर भी एल्स्ट और गोयल के महत्त्वपूर्ण योगदान एक छोटे समूह तक ही सीमित थे।

आज सीताराम गोयल और राम स्वरूप पर वेबिनार और पाठ्यक्रम हो रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि राजनीतिक परिवेश बदल गया है। यह परिवर्तन आया है लाखों अनाम स्वयंसेवकों के प्रयासों से। वे रेलवे प्लैटफॉर्म और बस स्टैंड पर सोए, तपती धूप और तेज़ तूफान के बीच साइकल चलाकर पहुँचे। यदि सौभाग्य रहा तो उनकी बात काटी गई और दुर्भाग्य रहा तो पीटा गया।

और हाँ, सुबह वे त्यागराज और बसवन्ना के साथ-साथ कबीर और रस खान को सम्मानित करते थे, सावरकर और शिवाजी के साथ-साथ अंबेडकर और गांधी को। उनके बलिदानों और उनके परिवारों के मूक आँसुओं पर खड़े होकर आज हम ‘ट्रैड-वोकिज़्म’ की बात करते हैं और उन्हें मूर्ख कहते हैं।

घृणा आपको उत्तेजित कर सकती है लेकिन वह धर्म का सुख नहीं दे सकती है, भले ही वह घृणा कितनी ही सूचित क्यों न हो। हिंदू धर्म की रक्षा इसलिए नहीं करनी है क्योंकि वह सबसे पुराना धर्म है, बल्कि इसलिए करनी है क्योंकि वह सभी जटिलताओं के साथ आध्यात्मिक विविधता को संरक्षित और पोषित करता है।

इस विविधता को पोषित करने से जो संभवानाएँ और चुनौतियाँ सामने आती हैं, वे हिंदुत्व को परिभाषित करती हैं। इसलिए दारा शिकोह जिनका निस्संदेह औरंगज़ेब से करीबी डीएनए था, वे हिंदुओं को मिर्ज़ा राजा से कई अधिक प्रिय हैं जो एक हिंदू होने के बावजूद छत्रपति शिवाजी महाराज को औरंगज़ेब के लिए कैद करना चाहता था।

अरविंदन लेखक एवं स्वराज्य स्तंभों में नियमित योगदान करने वाले संपादक हैं। वे @arvindneela के माध्यम से ट्वीट करते हैं।