राजनीति
मोदी के नेतृत्व से भारत की ‘सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी’ को मिलता मज़बूत वैश्विक आधार

संस्कृत का एक श्लोक है, ‘नयति इति नायक:’ यानी जो आगे लेकर चले वही नायक है, जो लक्ष्य की ओर सबको लेकर बढ़े वही नायक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया विदेश दौरों पर दृष्टि डालें, तो संस्कृत का यह श्लोक उनपर बिल्कुल सटीक बैठता है।

मोदी अपनी नेतृत्व क्षमता से 21वीं सदी में भारत को गौरवशाली पथ पर लेकर मज़बूती से चल रहे हैं। एक तरफ कोविड ने जहाँ दुनिया की अर्थव्यवस्था को पलीता लगा दिया है, वहीं दूसरी ओर मोदी का नेतृत्व कौशल ही है कि भारत तेज़ आर्थिक गति के साथ वैश्विक कूटनीति में भी मज़बूती से आगे बढ़ रहा है।

नेतृत्व क्षमता को परिभाषित करते हुए विचारक हाज एवं जानसन कहते हैं, “औपचारिक, अनौपचारिक परिस्थितियों में व्यक्तियों के व्यवहार को अनुकूल करने की योग्यता ही नेतृत्व कहलाती है।” प्रधानमंत्री मोदी की नेतृत्व क्षमता उपरोक्त परिभाषा का दर्शन है।

विदेश के राजनेता हो या वहाँ की आम जनता, सभी पर उनका जबरदस्त प्रभाव पड़ता है। यही वह कला है जो मोदी की ‘पीपल कनेक्ट’ क्षमता को एक अलग ही आयाम देती है। हाल ही में यूरोप यात्रा के दौरान भी मोदी का यह विशेष प्रभाव देखने को मिला था।

कुछ ऐसा ही जापान में भी देखने को मिला, जब प्रधानमंत्री मोदी क्वाड सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए वहाँ पहुँचे थे। उनका ज़ोरदार स्वागत कर प्रवासी भारतीय और जापानी लोगों ने एक अलग ही उदाहरण स्थापित किया। टोक्यो के न्यू ओटानी होटल के बाहर उनके स्वागत के लिए भारतीय और जापानी समुदाय के लोगों की एक बड़ी संख्या जुटी थी।

स्वागत में लोगों ने मोदी-मोदी, वंदे मातरम् और भारत माता की जय के नारे भी लगाए। उनसे मिलने के लिए एक बड़ी संख्या में बच्चे भी पहुँचे हुए थे। भेंट के दौरान, एक जापानी बच्चे ने प्रधानमंत्री से हिंदी में बात की। इस बच्चे का नाम रित्सुकी कोबायाशी है जो कि सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। यह मोदी की लोकप्रियता और उनके कौशल का प्रतीक नहीं तो और क्या है।

अपनी यात्रा के दौरान, प्रधानमंत्री ने क्वाड सम्मेलन के अलावा द्विपक्षीय बैठकों के साथ-साथ कई जापानी कंपनी के सीईओ और प्रवासी भारतीयों से भी बातचीत की। गौरतलब है कि जापान में करीब 40,000 भारतीय समुदाय के लोग रहते हैं। हमेशा की तरह प्रधानमंत्री मोदी अपनी इस यात्रा के दौरान प्रवासी भारतीयों से रूबरू हुए।

राजनीतिक और आर्थिक पहलुओं के अलावा मोदी की इस यात्रा का महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय समुदाय के लोगों और जापानी युवाओं के साथ सीधा संवाद स्थापित करना भी था। प्रधानमंत्री मोदी को देखने और सुनने के लिए लोगों के बीच एक अलग ही जोश का माहौल बना हुआ था।

करीब 700 भारतीय समुदाय के लोगों के साथ-साथ जापानी लोगों से भरे सभागार को प्रधानमंत्री ने संबोधित कर एक नई ऊर्जा का संचार किया। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने एक बार फिर ‘चलो इंडिया’ इनिशिएटिव का नारा लगाया।

इस बार उन्होंने न सिर्फ डेनमार्क यात्रा की तर्ज पर प्रवासी भारतीयों से सीधा संवाद स्थापित कर ‘चलो इंडिया’ इनिशिएटिव के नारे को दोहराया बल्कि एक अनूठी बात बोलकर जापानी युवाओं से सीधा संवाद स्थापित किया, जिसका मूल उद्देश्य जापानी युवाओं के मन में भारत के प्रति विचार और भाव को जागृत करना था।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “स्वामी विवेकानंद जब अपने ऐतिहासिक संबोधन के लिए शिकागो जा रहे थे, तो उससे पहले वो जापान की यात्रा पर आए थे। जापान से प्रभावित होकर स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि भारतीय नौजवानों को अपने जीवन में कम से कम एक बार जापान की यात्रा अवश्य करनी चाहिए। विवेकानंद जी ने भारत के लोगों को कहा था कि एक बार देख कर तो आओ की जापान कैसा है। उस ज़माने में स्वामी विवेकानंद जी ने जो कहा था, आज के युग के अनुरूप, उसी बात को, उसी सद्भावना को आगे बढ़ाते हुए मैं कहना चाहूंगा कि जापान का हर युवा अपने जीवन में कम से कम एक बार भारत की यात्रा करें”।

प्रधानमंत्री ने भारत को एक ‘स्वाभाविक टूरिस्ट डेस्टिनेशन’ कहते हुए जापान में रह रहे हर भारतीय से आग्रह किया कि ‘भारत चलो, भारत देखो, भारत से जुड़ो’ संकल्प से जुड़ें। इस प्रयास से भारत-जापान की म्त्रता को नई बुलंदी मिलेगी।

अपने संबोधन से पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने जापानी भारतविदों (इंडोलॉजिस्ट), सांस्कृतिक कलाकारों और खिलाड़ियों से भी भेंट की थी, जो कि निश्चित तौर पर न केवल भारत-जापान के बीच संबंधों के लिए एक मज़बूत कड़ी सिद्ध होगी बल्कि इससे जापान में भारतीय सांस्कृतिक कूटनीति को और मज़बूती मिलेगी।

यह प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति का एक मजबूत पक्ष है। वे अपनी कूटनीतिक क्षमता से न केवल दुनिया भर के नेतृत्व, कारोबारियों, शैक्षिक-सांस्कृतिक वर्ग और आम लोगों से सीधा संवाद स्थापित कर रहे हैं बल्कि पूरे ग्लोब पर फैले प्रवासी भारतीयों में एक नई ऊर्जा को फूँककर ‘सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी’ को भी मज़बूत आधार प्रदान कर रहे हैं।

डॉ मुकेश कुमार श्रीवास्तव भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, नई दिल्ली में वरिष्ठ सलाहकार हैं। इस लेख में व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।