भारती / राजनीति
राज्यों को अधिक शक्तियाँ सौंपकर बनेगी मोदी की 2024 की राह

संसद में सरकार और विपक्ष का गतिरोध एक संवैधानिक संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए रुक गया था। ओबीसी आरक्षण की सूची बनाने का अधिकार राज्यों को देने वाले विधेयक का सर्वसम्मति से पारित होना दो बातें बताता है-

पहला यह कि जब राजनीतिक स्वार्थ एक हों तब ही नीति-निर्माण को लेकर सर्वसम्मति बन सकती है और दूसरा यह कि यदि कई सारे क्षेत्रों में राज्यों को उनका काम करने दिया जाए तो भारत बेहतर तरीके से काम कर सकता है।

ये बातें संकेत करती हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार को सुधारों पर किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। केंद्र को राज्यों को अधिकतर शक्तियाँ सौंपनी चाहिए ताकि वे विधायी कामों में व्यवधान डालना बंद कर दें जो कि पूरे देश के हित में होगा।

कोविड प्रबंधन में राज्यों को शक्ति सौंपने का लाभ हम देख रहे हैं। पिछले वर्ष केंद्र ने कोविड से लड़ाई का नेतृत्व किया था लेकिन धीरे-धीरे राज्यों को अधिक शक्तियाँ दीं। इसने कोविड मामलों के लिए संबंधित राज्यों को उत्तरदायी बनाया है और अब वे अपने स्वास्थ्य संसाधनों का बेहतर उपयोग करना सीख रहे हैं।

पहली लहर से कई गुना खतरनाक दूसरी लहर के दौरान लगे लॉकडाउन यदि पिछले वर्ष जैसा आर्थिक नुकसान नहीं पहुँचा रहे हैं, तो वह इसलिए ही है कि हर राज्य ने अपने अनुसार पाबंदियों पर काम किया।

राज्य जानते हैं कि कुप्रबंधित लॉकडाउन आर्थिक गतिविधियों और कर राजस्व की दृष्टि से उन्हें भारी पड़ेंगे। कुल मिलाकर अपने आप चीज़ों को संभालने की राज्यों की क्षमता बढ़ रही है।

अपने द्वारा खड़ी की गई समस्याओं के लिए केंद्र को दोषी ठहराने के बावजूद राज्यों ने टीका खरीद के केंद्रीकरण की माँग की जबकि स्वयं इसकी विपरीत माँग वे कुछ समय पहले उठा रहे थे।

यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय भी पीछे हट गया है। वह समझ गया है कि जब केंद्र और राज्य राजनीतिक स्तर पर आपसी मामले सुलझा लें तो उसमें न्यायािक हस्तक्षेप का कोई स्थान नहीं रह जाता है। यह भी एक अच्छी बात है।

यदि नरेंद्र मोदी 2024 का चुनाव जीतना चाहते हैं तो उन्हें विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को और आगे ले जाना होगा। सोचिए कृषि सुधारों को आगे बढ़ाना कितना सरल होता यदि राज्यों के स्तर पर कानून लाए जाते।

अब जब केंद्र कृषि सुधार ला रहा है तो विपक्षी राज्य इसे बाधित कर रहे हैं और विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं। वे उस चीज़ को नष्ट करना चाह रहे हैं जो समय के साथ किसानों को अधिक लाभ देगी और कृषि क्षेत्र में फँसे अतिरिक्त श्रम को भी दूसरे क्षेत्र में जाने का रास्ता दिखाएगी।

राज्यों को अधिक शक्तियाँ सौंपने का मोदी सरकार को राजनीतिक लाभ भी होगा- यह विपक्ष को अत्यधिक एकजुट होने से रोकेगा। कारण यह कि यदि एक आयोग स्थापित हो जो सुझाव दे कि कौन-सी शक्तियाँ केंद्र राज्यों को दे सकता है और समवर्ती सूची को पूर्ण रूप से राज्य सूची में मिलाया जा सकता है तो क्षेत्रीय पार्टियाँ और राष्ट्रीय पार्टियाँ इस विषय पर एक-दूसरे से अलग हो जाएँगी।

यदि नीचे की ओर अधिक संसाधन वितरित किए जाएँ तो धनवान एवं निर्धन राज्य केंद्र के विरुद्ध एक ही मुद्दे पर एकजुट नहीं होंगे। आपको याद हो कि जब वस्तु एवं सेवा कर पर सहमति बनी थी तो पक्ष में बड़ी मात्रा में मत कम उपभोग वाले राज्यों से मिला था, वहीं धनवान राज्य वित्तीय संप्रभुता खोने के डर से विरोध कर रहे थे।

कल्पना की गई थी कि अधिक उपभोग वाले राज्य जीएसटी से अधिक लाभ उठाएँगे- हालाँकि, ऐसा हुआ नहीं- और उसी आधार पर जीएसटी के पक्ष में बहुमत प्राप्त किया जा सका था।

अब सोचें कि कितने राज्य कृषि कानूनों का विरोध करेंगे यदि मोदी सरकार कह दे कि जनसंख्या और गरीबी के आधार पर खाद्य सुरक्षा सब्सिडी का 90 प्रतिशत भाग राज्यों को बाँटा जाएगा ताकि वे स्वयं खरीद कर सकें। इससे पंजाब की मुखर किसान लॉबी अकेली पड़ जाएगी और हारी हुई लड़ाई लड़ती रहेगी।

भारत में राजनीतिक गतिरोध कम करने का तरीका है शक्तियाँ का अधिक वितरण। इससे हमें सीमित क्षेत्रों में एक अधिक मज़बूत केंद्र मिल सकेगा और अन्य क्षेत्रों में राज्यों की बेहतर योग्यता व सुधार देखने को मिलेगा।