संस्कृति
मंदोदरी की प्रार्थनाओं को अनसुना कर युद्धभूमि में पहुँचा रावण (अकाल बोधन भाग- 5)

शक्तिशाली, मायावी महिरावण की मृत्यु (पिछला भाग यहाँ पढ़ें) का समाचार सुन रावण अत्यधिक क्रोधित होकर युद्ध हेतु उद्वेलित होने लगा। लंकेश्वर ने अभिमान व शोक से प्रमत्त होकर युद्ध हेतु अपने सभी अंगों को राज-आभूषणों से भूषित किया व रणभूमि की दिशा में प्रस्थान कर गया।

अचानक सहस्र रानियों ने उपस्थित होकर लंकेश्वर को चहुँ दिशा से घेर लिया किंतु अनेक प्रयासों के पश्चात् भी वे रावण का मार्ग बाधित करने में असमर्थ रहीं। यह देख अंततः मंदोदरी भी रावण के सम्मुख आकर अपना विरोध प्रकट करने लगी।

मंदोदरी ने अत्यंत कोमल स्वर में कहा, “हे लंकाधिपति, आप महाबुद्धिमान, महापंडित हो, महावीर, महाशक्तिशाली हो, परम् ज्ञानी विश्वश्रवा मुनि के पुत्र हो। आपने अपने बाहुबल से त्रिलोक पर विजय प्राप्त की है। यम तथा इंद्र आपको देखकर थरथराने लगते हैं।

सर्वशास्त्रों में पारंगत हे लंकेश्वर, मैं दीन-हीन नारी आपको क्या ज्ञान दे सकती हूँ किंतु किस युग में तुमने वर्तमान में घटित हुई घटनाओं को देखा है? किस युग में वानरों ने समुद्र लांघा है, किस युग में जल पर पाषाणों को तैरते हुए देखा है? क्या यह विचित्र घटना नहीं कि स्पर्श मात्र से पाषाण मूर्ति मनुष्य में परिवर्तित हो जाती है?”

मंदोदरी ने रावण को पुनः समझाया, “हे महाशक्तिशाली दशानन, अब तो आपको भी यह ज्ञात हो चुका है कि श्रीराम मनुष्यमात्र नहीं अपितु, विष्णु अवतार हैं। पतितपावन श्रीराम ही समस्त संसार के कर्ता-धर्ता हैं तथा वे ही त्रिभुवन में सभी जीवों का पालन करते हैं।

यह आपको भी ज्ञात है, हे परम पंडित, कि अभाग्य होने पर प्रवीण मनुष्य भी बल-बुद्धि विहीन हो जाता है। मुझे भय है कि इस आसन्न-समय में कहीं कुछ विपरीत घटित ना हो जाए।

अतः हे महाराजा, कोप न करो, तनिक ध्यान से मेरे वचन सुनो। माँ सीतादेवी माँ लक्ष्मी के रूप में समस्त संसार में पूजित हैं तथा आप उन्हीं माँ लक्ष्मी को अशोक-वन में बंदी बना कष्ट दे रहे हो। श्रीराम, जो समस्त संसार का पालन करते हैं, उन्हीं पालनहार से आप युद्ध करना चाहते हैं।

मुझ दीन-हीन की प्रार्थना सुनो तथा सीता को लौटा दो क्योंकि अब युद्ध की कोई आवश्यकता नहीं। हे लंकाधिपति, यदि पालनकर्ता ही शत्रु रूप में आपका वध करने आए हैं तो आपसा कोई अभागा नहीं है।”

दंभ से चूर रावण ने मंदोदरी को परिहस पूर्ण उत्तर दिया, “हे रानी मंदोदरी, तुम्हारे वचन सत्य ही हैं कि तुम मंद बुद्धि हो। क्या तुम्हें यह प्रतीत होता है कि मुझे यह ज्ञान नहीं कि जिन्हें मैंने अपने वन में बंदी बना रखा है वह सीता शक्तिरूपिणी महालक्ष्मी है?

किंतु शायद तुम्हें यह ज्ञान नहीं और ना ही यह विचार किया कि जिस महादेवी शक्ति का समस्त संसार जप, यज्ञ, पूजा आदि का आयोजन करके भी आवाहन नहीं कर पाता, वह महाशक्ति हमारे द्वार पर पड़ी हैं। सहस्र ऋषि-मुनि निराहार जप कर, इस आशा के साथ, शक्ति की आराधना करते हैं कि मृत्युकाल में इन चरणों की प्राप्ति हो, किंतु उनकी आशा पूर्ण नहीं होती। इस समय वही शक्ति हमारे द्वार बंदी है।”

रावण ने पुनः अट्टहास किया और बोला, “हे रानी मंदोदरी, तुम्हारे यह वचन भी सत्य ही हैं कि तुम दीन-हीन बुद्धि हो। क्या तुम्हें यह प्रतीत होता है कि मुझे यह ज्ञान नहीं कि परमध्यान में भी मुनि-ऋषि जिनके दर्शन नहीं पाते हैं, वह राम निराहार बैठे मेरे बारे में विचार करते हैं?

क्या तुम्हें यह ज्ञात नहीं, हे मूर्ख स्त्री, कि श्रीराम के मन में मेरा ही रूप जाग्रत है। वह मात्र इसी चिंता में हैं कि किस काल में वह मेरा वध कर अपनी स्त्री को मुक्त करेंगे। यह सभी ज्ञात होने पर भी यदि तुझे यह प्रतीत होता है कि मैं अभागा हूँ तो अभागी तू है मैं नहीं।”

“यदि मेरा भाग्य यही है कि मेरी मृत्यु श्रीराम द्वारा होनी है तो यम का क्या साहस कि मेरे निकट भी आ सके। क्या तुम्हें यह ज्ञात नहीं कि श्रीराम द्वारा वध होने की स्थिति में मुझे विष्णु दूतों द्वारा बैकुंठ ले जाया जाएगा?

जीवित दशा में इंद्र आदि देवता तुम्हारे स्वामी के सदैव आज्ञाकारी रहे हैं तथा मृत्यु पश्चात् मेरा बैकुंठ गमन होगा। यह सब ज्ञात होने पर तुम्हें यह प्रतीत नहीं होता कि मुझ-सा भाग्यवान इस संसार में एक भी मनुष्य नहीं? अतः तुम यह दुख-अश्रु त्याग, निवास स्थान प्रस्थान करो, युद्ध स्थल से शुभ समाचार की प्रतीक्षा करो।”

सत्य ही है कि जिनकी मृत्यु निकट हो उनपर किस भी प्रकार की औषधि कार्य नहीं करती। इसी प्रकार रावण भी महारानी मंदोदरी के किसी भी परामर्श से युद्धविमुख नहीं हुआ। अंत में रावण की प्रदक्षिणा कर, मंगल आरती उच्चारित कर, शुभकामनाएँ प्रेषित कर मंदोदरी अंतःपुर की दिशा में प्रस्थान कर गई।

उसके प्रस्थान करते ही ध्वज तथा पताकाओं से शोभित तथा सुसज्जित रथ पर आसीन होकर रावण पश्चिम द्वार की दिशा में प्रस्थान करता है। पश्चिम द्वार के निकट श्री राम की सेना महाबली रावण की ही प्रतीक्षा में थी।

रावण ने पश्चिम द्वार पर अपने अष्ट अश्वों तथा स्वर्ण रजित रथ द्वारा प्रवेश करते ही श्रीराम की सेना पर बाणों की वर्षा आरंभ कर डाली। रावण द्वारा राम की दिशा में प्रेक्षित प्रत्येक अस्त्र-शस्त्र का श्रीराम ने उचित उत्तर दिया।

श्रीराम को रथ विहीन तथा लंकेश को रथ-आसीन देखकर सभी देवतागण दुखित हो ब्रह्मा से याचना करते हैं तो ब्रह्मा इंद्र के सारथि मातलि को श्रीराम हेतु दिव्य धनुष-बाण, स्वर्ण मुकुट तथा स्वर्ण रथ सौंपकर अविलम्ब युद्धस्थल की दिशा में प्रस्थान करने की आज्ञा देते हैं।

इंद्र के रथ पर श्रीराम को आसीन पाकर रावण इंद्र तथा अन्य देवतागणों को अपशब्द कहता है। क्रोधित होकर वह श्रीराम पर सर्पबाण तथा नागपाश से आक्रमण करता है जिसे श्रीराम खग-बाण द्वारा विच्छेदित कर डालते हैं।

कुपित हो रावण ने मंत्र पाठ कर वज्र-जाठा से श्रीराम पर प्रहार किया जिसे श्रीराम ने इंद्र द्वारा उपहार स्वरूप प्रदत्त शूल्यास्त्र द्वारा निष्क्रिय कर डाला। अचानक वानरों ने रावण की सेना पर वृक्ष तथा शिलाओं की वर्षा कर डाली।

यह परिस्थिति देख रावण विचलित हुआ, उसका मनोबल डगमगाने लगा। श्रीराम ने जब रावण की यह मनः स्थिति को देखा तो वज्रास्त्र द्वारा प्रहार कर उसे मूर्छित कर डाला। अपने स्वामी को मूर्छित पा सारथि रथ लेकर युद्धभूमि से प्रस्थान कर गया किंतु चेतन अवस्था में आते ही रावण ने तुरंत युद्ध आरंभ कर दिया।

आगे की कथा अगले भाग में।

मनीष श्रीवास्तव इंडिका टुडे जैसे कई मंचों से जुड़े लेखक हैं। वे @shrimaan के माध्यम से ट्वीट करते हैं।