राजनीति
ममता बनर्जी की नए मोर्चे वाली चाल में राजनीतिक शतरंज के खिलाड़ी पस्त

ममता बनर्जी के दो-दिवसीय मुंबई (महाराष्ट्र) दौरे का आकलन लोकजीवन में प्रचलित ‘तीन बातों’ को दृष्टिगत रखते हुए किया जा सकता है। पहली बात– कहते हैं, राजनीति में कोई किसी का स्थाई मित्र नहीं होता और न कोई स्थाई विरोधी (शत्रु?) ही होता है।

सत्य है, राजनीति नानाविध समीकरणों से संचालित होती है। अतः जोड़-तोड़ और गठजोड़ के साथ-साथ उखाड़-पछाड़ इसकी चारित्रिक विशेषता कहलाती है। एक तरह से नित नवीन समीकरणों के सृजन और संचालन को राजनीति की अकाट्य बाध्यता कहा जा सकता है।

दूसरी बात– कहते हैं, कोई भी किसी से अकारण ही नहीं मिलता। अर्थात् हर मेल-मुलाक़ात का कोई विशिष्ट उद्देश्य निश्चित ही होता है। तीसरी बात– कहते हैं, कोई किसी की प्रशंसा अकारण ही नहीं करता। अर्थात् प्रशंसा करने वाले के मानस में किसी-न-किसी समीकरण(ओं) की ‘सायास’ बनावट-बुनावट हो चुकी होती है।

अतः वह स्वहित (दलहित?) की कामना से प्रेरित होकर एक मायावी संसार की सर्जना की तैयारी करता है तथा विरोधकों के साथ सामंजस्य की भावभूमि सृजित करने के उद्देश्य से प्रशंसा का सहारा लेता है। उपरोक्त तीनों बातें लोकजीवन पर तो नहीं, परंतु राजनेताओं के जीवन पर शतशः लागू होती हैं।

अतः जब भी कोई नेता किसी अन्य नेता से मेल-मुलाक़ात करता/ करती है, तो लोकजीवन में नानाविध बातें सुगबुगाने लगती हैं। ऐसी ही सुगबुगाहट ममता बनर्जी के दो-दिवसीय मुंबई (महाराष्ट्र) दौरे से आरंभ हुई।

प्रश्न उपस्थित हुआ कि ममता बनर्जी का महाराष्ट्र पहुँचना तथा क्षेत्रीय ‘पारिवारिक’ दलों को लामबंद करना क्या भारतीय राजनीति में नए ‘महाभारत’ के रूप में देखा जाना चाहिए? भारतीय जनमानस ने बनर्जी को शून्य (तृण) से सत्ता (मूल) का निर्माण करते हुए देखा है।

‘खेला होबे’ से लेकर खेला करने के लिए ‘पैर तुड़वा कर’ पहियेदार कुर्सी पर ‘रोड शो’ करते हुए जनता में सांत्वना भरते हुए देखा है। जनता ने ममता बनर्जी को जीतते हुए भी देखा है और जीतने के बाद विरोधकों (भाजपा समर्थक हिंदुओं) के दमन-उत्पीड़न का वह उग्र रूप भी देखा है।

अतः लोक में एक धारणा बनी है कि बनर्जी भारतीय राजनीति में इंदिरा के बाद एक दमनकारी राजनेता के रूप में (कु)ख्यात है। वैसे भी, बनर्जी मिली भी तो किनसे मिलीं? महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार में सत्ता के सौदागर, शक्ति-केंद्र और संचालक शरद पवार के साथ-साथ मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के सुपुत्र आदित्य ठाकरे और संजय राउत से मिलीं।

इनके अतिरिक्त महेश भट्ट, जावेद अख्तर, शत्रुघ्न सिन्हा, ऋचा चड्ढा, स्वरा भास्कर, कॉमेडियन मुनव्वर फारुकी और सुधींद्र कुलकर्णी तथा अन्य से मिलीं। और बोली भी तो क्या बोलीं?– “भारत को जनबल (श्रमबल) पसंद है, बाहुबल नहीं। अनेकता में एकता ही हमारा मूल मंत्र है। दुर्भाग्य से हम भाजपा के क्रूर, अलोकतांत्रिक और अनैतिक रवैये का सामना कर रहे हैं।”

भारतीय जनमानस में यह बात अत्यंत रूढ़ है कि स्वार्थाकांक्षी अनैतिक राजनीतिज्ञ निर्लज्ज तो होते ही हैं, परंतु उनमें स्मृति-लोप (क्षणजीवी) की भी गंभीर समस्या होती है। तिस पर झूठ बोलने में उन्हें महारत हासिल होती है। परंतु, भारतीय जनमानस की स्मृति अत्यंत दृढ़ एवं अमिट है।

भारतीय जनता ने जनबल अर्जन (चुनावी जीत) के बावजूद ममता बनर्जी के दमनकारी-बर्बर रूप एवं बर्ताव को 2021 में चुनावी जीत के बाद भली-भाँति देखा है। ऐसे में बनर्जी का दर-दर और घर-घर भटक कर वर्तमान केंद्र सरकार के विरुद्ध ‘नया मोर्चा’ बनाने का प्रयास करना बहुत कुछ बयान कर जाता है।

जिन-जिन से मिलीं, उनके संबंध में जनता जनार्दन का जनमत क्या हो सकता है? अभद्र भाषा एवं टिप्पणियाँ, शराबी-गंजेड़ी, भारत-विरोधी मानसिकता, सेक्युलरिज़्म के नाम पर हिंदू विरोधी, परिवारवाद के दृढ़ संपोषक, घनघोर भ्रष्टाचारी इत्यादि विशेषणों के साथ इनकी महिमा का बखान किया जा सकता है।

लोक (जनबल) कहता है कि मोदी विरोध में उपरोक्त तथा बनर्जी की सभा में सम्मिलित लोग भारत-विरोधी, विभाजनकारी एवं राष्ट्रैक्य के लिए घातक बन चुके हैं। अब उपरोक्त पहली और दूसरी बात स्मरणीय है कि बनर्जी सत्ता के सौदागर शरद पवार से मिल कर 2024 के लिए सत्ता प्राप्ति हेतु नवीन समीकरण बनाने में जुट चुकी हैं।

पीछे उनके सलाहकार और राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी इसी कड़ी में कइयों से मिल चुके हैं। यहाँ तक कि गांधी परिवार की ‘नई उम्मीद’ प्रियंका वाड्रा से भी मिल चुके हैं। बनर्जी के इस दौरे से स्पष्ट हो जाता है कि 2004 में बने यूपीए (संयुक्त प्रगतशील गठबंधन) को 2024 में ध्वस्त कर मोदी-भाजपा को पछाड़ने के लिए ‘नया मोर्चा’ खड़ा करना ही दौरे का प्रमुख उद्देश्य है।

यूपीए के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न अर्थात् राजनीतिक गांधी परिवार द्वारा संचालित कांग्रेस और प्रधानमंत्री पद का स्वप्न देखने वाले राहुल गांधी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न के रूप में देखा-समझा जाना चाहिए। अर्थात् बनर्जी को जिताने हेतु अपनी चुनावी सभाओं को अत्यंत नाटकीय रूप में स्थगित कर कोरोना महामारी के फैलाव को रोकने का बहाना बनाने वाले राहुल गांधी बनर्जी के लिए अक्षम, अमान्य और विरोधी हो चुके हैं।

सर्वविदित है कि मोदी-भाजपा को पराजित करने के लिए वामपंथी और कांग्रेसियों ने अपनी चुनावी सभाओं को समेट लिया था। इसी से ममता बनर्जी का पलड़ा भारी हो गया था। यदि ऐसा न होता, तो आज पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार होती और वर्तमान में प्रताड़ित हिंदुओं की जनभावनाओं का सम्मान होता।

अब ममता बनर्जी या तो स्वयं प्रधानमंत्री का स्वप्न देख रही हैं अथवा शरद पवार को चेहरा बना कर अपना मोहरा ‘सेट’ करना चाह रही हैं। बनर्जी जानती हैं कि यदि शरद पवार को चेहरा-मोहरा बनाकर कर 2024 का चुनाव लड़ा जाता है, और जीता भी जाता है तो वे भला कितने वर्ष जीने वाले हैं?

क्योंकि स्मरणीय है, कुछ वर्ष पूर्व डॉक्टरों ने शरद पवार के कुछ ही महीने जीने की संभावना बताई थी। वैसे भी, वे निरंतर स्वास्थ्य संबंधी कोई-न-कोई परेशानी से दो-चार हो रहे हैं। ऐसे में बनर्जी जानती हैं कि वे ही इस मोर्चे का एकमात्र विकल्प रह जाएँगी। कुलमिलाकर, किस्सा प्रधानमंत्री की कुर्सी का है। येनकेनप्रकारेण बनर्जी को उस कुर्सी पर विराजमान होना है।

अब, उपरोक्त तीसरी बात स्मरणीय है। शिवसेना सांसद संजय राउत ने हाल ही में नरेंद्र मोदी को ‘सबसे बड़ा नेता’ कहा-माना है। वे कहते हैं, “मोदी जी के सामने लड़ना है तो एक बड़ा चेहरा चाहिए।… फिर भी मोदी जी, मोदी जी हैं।”

उधर, उद्धव ठाकरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी भेंट कर चुके हैं। साथ ही महाराष्ट्र में हुई अमरावती हिंसा, कर्फ्यू और उस कड़ी में रज़ा अकादमी की भूमिका को भी रेखांकित करना चाहिए। विशेष रूप से, मुस्लिम समूहों द्वारा की गई कार्रवाई ने महाविकास अघाड़ी सरकार को चौंका दिया था। तब भी संजय राउत के बोल और तेवर बदले थे।

स्पष्ट है कि शिवसेना ने वैचारिक दृष्टि से विरोधकों के साथ सामंजस्य स्थापित कर सत्ता हासिल की है। ऐसे में अमरावती जैसी घटनाएँ इस कृत्रिम विचारहीन गठबंधन को ध्वस्त कर सकती है। तिस पर नरेंद्र मोदी की प्रशंसा और वैचारिक दृष्टि से स्वजन (भाजपा) से स्वाभाविक निकटता कब कौन-सी करवट लेगी, कहना कठिन है।

बनर्जी के नए मोर्चे के संबंध में कहा जा सकता है कि यद्यपि यह सत्य है कि ‘चोर-चौर मौसेर भाई’ होते हैं, तथापि यह भी सत्य है कि चोरों में बड़ी मुश्किल से एकता बनी रहती है। कहा जा सकता है कि स्वहितकामी बनर्जी एक मायावी संसार रचने का प्रयास कर रही हैं। विरोधकों के साथ कितना सामंजस्य स्थापित हो पायेगा और यदि सामंजस्य होता भी है तो वह कितनी स्थिरता रहेगी, कहना कठिन है।

‘सुखस्य मूलं धर्मह’ प्रथम चाणक्यसूत्र है। अर्थात् प्रजा और राज्य के सुख का मूल ‘धर्म’ है। अर्थात् मानवोचित (नीतिगत) कर्तव्य! चिंतनीय है कि बनर्जी जिन नेता-अभिनेताओं से मिल रही हैं, क्या उनके कृत्य ‘धर्मानुकूल’ (लोकानुकूल-राष्ट्रानुकूल) हैं? लोक में उनके लिए प्रचलित विशेषण ऊपर उल्लिखित हैं ही।

वहीं, चतुर्थ चाणक्यसूत्र है – ‘राज्यस्य मूलं इन्द्रीयजयः’, अर्थात् राज्याधिकारियों की स्वेच्छाचारिता, लोलुपता और स्वार्थांधता राज्य (लोक) के लिए विष का कार्य करती है। किसी भी राज्य में स्थिरता की अपेक्षा तब ही की जा सकती है, जब वहाँ के शासक(ओं) ने इन्द्रियों को जीत लेते हैं। .

कुलमिलाकर, राज्य में स्थिरता सरकार के मानवोचित (नैतिक) कर्तव्य, आचार-विचार-व्यवहार पर निर्भर होती है। भारतीय जनमानस ने देखा है कि ममता बनर्जी की राजनीति स्वेच्छाचारिता और लिप्सा पर आधारित है। उनके लिए शरद पवार हो या अन्य कोई भी नेता, शतरंज के प्यादे मात्र हैं।

डॉ आनंद पाटील तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AnandPatilCU के माध्यम से ट्वीट करते हैं।