संस्कृति
मकरध्वज, यानी अपने ही पुत्र को पराजित करके हनुमान जी ले आए श्रीराम-लक्ष्मण को (2)

मकरध्वज की कथा (पिछला भाग यहाँ पढ़ें) भी अत्यंत चित्ताकर्षक है। कृत्तिवास रामायण में उसे हनुमान का पुत्र बताया गया है। संदर्भ इस प्रकार है कि जिस समय हनुमान अपनी पूँछ की अग्नि द्वारा संपूर्ण लंका को अग्निकुंड में परवर्तित करने के पश्चात अग्निशमन की प्रक्रिया हेतु समुद्र में प्रवेश करते हैं, तभी उनके स्वेदजल की एक बूंद वहाँ विचर रही एक सरीसृप के मुख में प्रविष्ट हो जाती है।

सरीसृप के उदर विच्छेदन पर “मकरध्वज” की उपस्थिति से आश्चर्यचकित होकर पाताल-लोक निवासी महिरावण को सूचना प्रेषित करते हैं। मकरध्वज की बुद्धि तथा शक्ति के परीक्षण पश्चात महिरावण उसे अपने प्रासाद का रक्षक बना देता है। जब हनुमान महिरावण से युद्ध हेतु प्रासाद में प्रवेश करने की चेष्टा करते हैं, तब मकरध्वज हनुमान का मार्ग निषेध कर प्रतिरोध करता है।

मकरध्वज से परिचय का अनुरोध करने पर हनुमान को ज्ञात होता है कि वह पाताल-लोक का संरक्षक है। हनुमान तब हतप्रभ रह जाते हैं, जब मकरध्वज स्वयं को शक्तिशाली पुत्र के रूप में प्रस्तुत करता है। विस्मित हनुमान को मकरध्वज के कथन पर विश्वास नहीं होता क्योंकि हनुमान जीवनपर्यंत ब्रह्मचारी रहे थे।

हनुमान ध्यानमग्न होकर जब विचार करते हैं तब उन्हें दिव्य दृष्टि से मकरध्वज की उत्पत्ति की कथा का ज्ञान होता है। मकरध्वज हनुमान को प्रासाद में प्रवेश पूर्व युद्ध के लिए बाध्य करता है। वह हनुमान से निवेदन करता है कि वह अपने पिता के दर्शन द्वारा अनुग्रहित हुआ किंतु वह अपने स्वामी महिरावण के साथ छल नहीं कर सकता।

अपने पुत्र की स्वामीभक्ति तथा प्रतिबद्धता से हनुमान अतिप्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। अंततः युद्ध होता है जिसमें हनुमान विजयी होते हैं। तत्पश्चात, वे मकरध्वज को बांधकर राम तथा लक्ष्मण की खोज में प्रासाद में प्रवेश करते हैं।

श्री हनुमंत प्रकर्णम में श्री विद्यार्नवतनम अनुसार, हनुमान पंचमुख तथा दसभुजा धारी हैं। यहाँ हनुमान की एक महान योगी के रूप में कल्पना की गई है जिन्होंने अपनी पंच इंद्रियों को वश में कर लिया है। रामावतारम्, जिसे लोकप्रिय रूप में “कंबा रामायणम्” के रूप में जाना जाता है, में पंच संख्या का वर्णन किया गया है।

पंच तत्वों में से प्रथम “वायु” तत्व पुत्र ने “जल” (महासागर) तत्व को लांघते हुए “आकाश” तत्व से “पृथ्वी” तत्व पुत्री माँ सीता देवी से भेंट कर “अग्नि” तत्व द्वारा लंका को भस्म कर डाला था। प्रचलित कथानुसार पाताल-लोक में चंद्रसेना से भेंट होने पर हनुमान को ज्ञात होता है कि महिरावण के वध का मात्र एक ही उपाय है।

एक ही समय में पंच दिशाओं में प्रज्वलित पंचदीपों का शमन ही वह उपाय था। यह ज्ञात होने पर हनुमान पंचमुखी हनुमान के रूप में प्रकट होते हैं। इस रूप में श्रीहनुमान, श्रीवराह, श्रीगरुड़, श्रीनरसिंह तथा श्रीहयग्रीव के पंचमुख, पंच दिशाओं में प्रज्वलित पंचदीपों के शमन हेतु प्रकट होते हैं।

हनुमान पूर्वमुखी, वराह दक्षिणमुखी, गरुड़ पश्चिममुखी, नरसिंह उत्तरमुखी तथा हयग्रीव नभमुखी होते हुए पंच दीपों का शमन करते हुए महिरावण का वध कर देते हैं। इस प्रकार विभीषण को दिए गए वचन का पालन करते हुए हनुमान श्रीराम तथा लक्ष्मण को लेकर पृथ्वी लोक की ओर प्रस्थान करते हैं।

आगे की कथा अगले भाग में।