संस्कृति
महिरावण अष्टावक्र ऋषि के श्राप के कारण बना था राक्षस-राज (अकाल बोधन भाग- 3)

कृत्तिवास रामायण के अनुसार, प्रासाद में प्रवेश-पश्चात् (पिछला भाग यहाँ पढ़ें) हनुमान को ज्ञात होता है कि महिरावण द्वारा देवी महामाया के सम्मुख श्रीराम-लक्ष्मण की बलि का प्रयोजन रचा गया है। हनुमान माँ दुर्गा के सम्मुख मक्षिका रूप में प्रकट हो, अपना श्रीराम तथा सुग्रीव के दास के रूप में परिचय देने के पश्चात् महिरावण की मृत्यु का भेद जानने की साग्रह प्रार्थना करते हैं।

देवी कात्यायनी हनुमान का निवेदन सुन मंद-मंद मुस्कुराकर उन्हें महिरावण की मृत्यु का भेद बताती हैं। वे कहती हैं कि जब दुष्ट तथा महापापी राक्षस श्रीराम-लक्ष्मण को बलि स्वरूप लेकर आएगा, तभी उनको उस महापापी के वध का अवसर प्राप्त होगा।

महादेवी कहतीं है कि उन्हें ज्ञात है कि श्रीराम शिव के गुरु हैं। उन्हें यह भी ज्ञात है कि शिव तथा राम में कोई भेद नहीं। श्रीराम अनाथ के नाथ हैं, संसार के सार हैं। श्रीराम क्षण भर में समस्त संसार की उत्पत्ति, परिरक्षित तथा प्रलय का आयोजन कर सकते हैं।

महिरावण की मृत्यु के भेद का ज्ञान देते हुए महादेवी कहती हैं, “सर्वप्रथम महिरावण बलिवेदी पर श्रीराम को मेरे चरण-वंदन की आज्ञा देगा। उस समय श्रीराम यह प्रस्ताव रखें कि चूँकि वह राज-पुत्र हैं तो उन्हें चरण-वंदन की विधि ज्ञात नहीं, अतः महिरावण स्वयं महादेवी महामाया के चरण-वंदन की यह विधि बताए।

इस प्रकार जब वह दंभी तथा महापापी राक्षस मेरे चरण-वंदन हेतु साष्टांग भूमिष्ट हो, उसी समय, हे हनुमान, इस खड्ग से तुम उस दंभी का मस्तक विच्छेद कर डालना।” हनुमान को यह ज्ञात नहीं था कि यह भी विधि का विधान था कि महिरावण श्रीराम-लक्ष्मण का अपहरण कर उन्हें पाताल-लोक लेकर आया था।

यह उस काल की घटना है जब शत्रुधनु नामक एक गंधर्व-पुत्र महाविष्णु के सम्मुख नित्य प्रतिदिन नृत्य तथा गायन से उनका मनोरंजन करता था। देव नारायण उसकी लीलाओं से अतिप्रसन्न रहा करते थे तथा उसके आमोद-प्रमोद से संतुष्ट थे। एक दिवस विष्णु से भेंट हेतु अष्टावक्र मुनि का आगमन हुआ।

अष्टाव्रक ऋषि कहोड़ के पुत्र थे, जिन्हें संपूर्ण वेदों का ज्ञान देने के पश्‍चात् उद्दालक ऋषि ने अपनी रूपवती एवं गुणवती कन्या सुजाता के साथ उनका विवाह संपन्न कराया था। तत्पश्चात्, एक दिवस गर्भवती सुजाता वेदपाठ कर रहे ऋषि कहोड़ के समीप विश्राम कर रही थीं।

अपने पिता को वेदों का त्रुटिपूर्ण पाठन करता सुनकर गर्भस्थ शिशु अपने पिता को उनकी त्रुटि का स्मरण कराता है। गर्भस्थ शिशु के ऐसे वचन सुन ऋषि कहोड़ क्रोधित हो, अपने पुत्र को श्राप देकर उसके शरीर को आठ स्थानों से वक्रीय कर देते हैं।

मुनि अष्टाव्रक के वक्रीय अंगों को देखकर वह गंधर्व उनसे परिहास कर बैठा। उसके परिहास तथा व्यंग्य बाणों से रुष्ट होकर मुनि अष्टाव्रक उस गंधर्व को राक्षस कुल में, पाताल-लोक में जन्म लेने का श्राप दे देते हैं। गंधर्व श्राप सुनकर व्यथित हो जाता है तथा अविलंब मुनि चरणों में साष्टांग प्रणाम कर क्षमा याचना की प्रार्थना करता है।

वह स्वयं को अबोध पापी कहते हुए निवेदन करता है कि उस मूर्ख को यह अभिज्ञान नहीं था कि वही वे महामुनि हैं जो त्रिभुवन में पूजित हैं। वह चरण वंदना करते हुए कृपा की याचना करता है जिसपर मुनिवर प्रसन्न हो जाते हैं। वे कहते हैं-

“मेरा श्राप अन्यथा नहीं होगा किंतु तुम पाताल में राक्षस-राज बनकर रहोगे। तुम्हारी तपस्या के बल पर महामाया तुम्हारे प्रासाद में वास करेंगी। कालांतर में दुष्ट राक्षस-वंश के विनाश हेतु महाविष्णु अवतार रूप में प्रकट होंगे। महाविष्णु के अवतार श्रीराम, उनके भाई लक्ष्मण का तुम अपहरण कर अपने लोक में बंदी बनाओगे। उन्हीं के दास महाबली हनुमान द्वारा तुम्हारा वध होगा, तत्पश्चात् तुम शापमुक्त हो स्वर्गवास करोगे।”

ऐसे वचन दे मुनि वायु विलीन हो जाते हैं। कथाओं में गुँथी कथाएँ सुनाते हुए आपको यह भी ज्ञात होना आवश्यक है कि महिरावण को महामाया द्वारा यह वरदान प्राप्त था कि अहि, देवता, गंधर्व, यज्ञ, रक्त, किन्नर, पिशाच योनि आदि से महिरावण सर्वदा विजयी रहेगा।

नर तथा वानर को उस दंभी महिरावण ने यह सोचकर इस सूची में संयोजित नहीं किया था कि नर-वानर तो राक्षस कुल के भक्ष्य थे। नियति यह थी कि वह मूर्ख द्विनरश्रेष्ठ श्रीराम-लक्ष्मण का अपहरण कर पाताल-लोक ले आया था। उसे यह भी ज्ञात नहीं था कि श्रीराम-लक्ष्मण की मुक्ति हेतु एक वानर का भी पातल-लोक में आगमन हो चुका है।

आगे की कथा अगले भाग में।