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आपको पता है असहिष्णुता क्या है? विविधता को स्वीकार न करना

प्रसंग
  • सबरीमाला मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले ने विविधता की कीमत पर समानता को जबरन थोप दिया है।

“गॉड नोस, गॉड नोस आई वान्ट टू ब्रेक फ्री।” – क्वीन

विकासवादी मनोविज्ञान हमें सिखाता है कि मनुष्यों में पैटर्न्स देखने की प्रवृत्ति होती है। हम नियम-कानून पसंद करते हैं। हम अराजकता के प्रति असहज होते हैं। यह अनिश्चितता और खतरे को कम करने के लिए पोषित प्रचलित स्वाभाविकता का हिस्सा है। भविष्य वचनीयता ने शुरूआती इंसानों वाले पर्यावरण के बारे में सुगमता की समझ प्रदान की। “नियंत्रित करने योग्य को नियंत्रित करके” अन्य अनिश्चितताओं का सामना किया जा सकता है। घिसे-पिटे और मिलते-जुलते पैटर्नों का गठन तथा अनियोजित फैसले आदि, इस स्वाभाविकता में दिखाई पड़ते रहते हैं।

हम लोग इसमें इतना ज्यादा रम गए हैं कि कई सालों से, हमने अपने समाज को ज्यादा से ज्यादा व्यवस्थित बनाने के लिए डिजाइन करना शुरू कर दिया है। हमारे घरों में, हमारी कलाओं में, हमारे स्कूलों में – सभी में नियमितता और अनुशासन की भावना पाई जाती है। लेकिन कुछ बिन्दुओं पर बुरे नतीजे रहे होंगे। एक छिपे हुए पथ की अवसर लागत और मानव प्रकृति में निहित विविधता सामने आई होगी।

तब समाज ने विविधता को ‘सहन करना’ करना शुरू कर दिया होगा। वे पागलों की तरह इस पर मुँह ढककर हँस सकते थे, लेकिन पूरे समाज को विचार में विचलन का फायदा तो हासिल ही हुआ होगा। पार्श्व सोच ने पथभ्रष्टों को भगवान के नजदीक मान लिया होगा। कलाकारों और वैज्ञानिकों, जो नियम के अनुरूप नहीं थे, ने केवल उन्हीं सीमाओं पर अपनी पकड़ बनाई होगी जो नियम के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा करते होंगे और इस प्रकार से उन्होंने खुद जन कल्याण को खतरे (संदेह) में डाल दिया होगा।

हमारा समाज सदियों तक शायद इसी तरह विकसित हुआ होगा। हर युग में पथभ्रष्ट लोग होंगे। कवि, दार्शनिक और वैज्ञानिक और कुछ इसी तरह के या दूसरे तरह के सभी प्रतिभाशाली लोग पथभ्रष्ट थे। उदाहरण के लिए, 63 तमिल नयनारों में से कारइक्काल अम्मई नाम की एक महिला। भगवान शिव के प्रति उसके असाधारण जुनून के लिए उसे ‘कारइक्कल पाई’, कारइक्कल की पिशाचिनी, कहा जाता था। आण्डाल के साथ 12 अलवरों का भी यही मामला है। लेकिन मुख्य रूप से सबसे बड़ी स्वतंत्रता यह थी कि विचारों के साथ प्रयोग (एक्सपेरीमेंट/छेड़छाड़) किया जा सकता था।

सबरीमाला मामले में उच्चतम न्यायालय का फैसला वर्तमान सोच के साथ समानता और समरूपता के विचार पर आधारित था। अदालत ने एक नियम के इतर इसे एक बार भी केंद्रभ्रष्ट विचलन या एक अपवाद के रूप में नहीं देखा। महिलाओं को कुछ मंदिरों को छोड़कर दुनिया भर के हर मंदिर में जाने की अनुमति तो थी ही। पुरूषों के लिए भी इसी तरह की पाबंदियाँ मौजूद हैं। समूह के अधिकारों को, समग्र स्तर पर लागू करने बजाय, एक विशिष्ट उदाहरण पर जबरन थोप दिया गया था।

क्या महिलाओं को चर्चों में पादरी बनने की इजाजत है? क्या महिलाओं को सामान्य रूप से मस्जिदों में जाने की अनुमति है? यह सभी महिलाओं के मौलिक अधिकारों के बड़े उल्लंघन हैं। अवसर की समानता अनुपस्थित है। वास्तविक भेदभाव व्याप्त हैं, न्यायाधीशों की भाषा में कहा जाए तो यह अस्पृश्यता है। इनपर बात करने की हिम्मत तक नहीं की जाती है। इनको केवल सीधी-साधी पुरानी ईमानदारी कहा जाता है।

इंजीनियरिंग कॉलेजों में आपको त्रुटियों और पक्षपातों (Biases) के बारे में पढ़ाया जाता है। अपेक्षित मूल्य से अवलोकन के बीच की दूरी या अंतर को ‘त्रुटि’ कहा जाता है। पक्षपात उन अवलोकनों को कहा जाता है जो एकसाथ बंधे होते हैं और एक समूह के रूप में अपेक्षित मूल्य से दूर होते हैं। त्रुटि आ जाने पर प्रयोग (एक्सपेरीमेंट) को ज्यादा ध्यान से किये जाने की ज़रूरत होती है और पक्षपात होने पर प्रयोग (एक्सपेरीमेंट) में उपयोग किए जा रहे उपकरण (मशीन) की फिर से जाँच करने की ज़रूरत होती है।

वैज्ञानिक भाषा में कहा जाए तो सबरीमाला को एक ‘त्रुटि’ माना जा सकता है। सदियों से इसको माना जाता है और स्वीकार किया जाता है। त्रुटि इतनी सूक्ष्म होती है कि प्रयोग जारी रहता है। लेकिन व्यापक रूप से महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश की अनुमति न देना एक पक्षपात है। इसका अभ्यास कर रहे लोगों को अभी भी मशीन की फिर से जाँच करने की जरूरत नहीं दिख रही है, भले ही इसमें सातवीं शताब्दी में अरब के एल्गोरिदम पर आधारित प्रोग्राम किया गया हो।

एक अन्य मामले में, विद्वान न्यायाधीशों ने बड़े ही जोर शोर से यह घोषित किया था कि “असंतोष लोकतंत्र का सुरक्षा वाल्व है।” यह असंतोष को स्वीकार करने के लिए उच्च स्तर के ज्ञानात्मक मतभेद की माँग करेगा और प्रथा की विविधता को अनुमति नहीं देगा। सदियों से न्यायाधीशों ने खुद को हिन्दुओं के सामूहिक ज्ञान से ज्यादा अभिमानित किया है। जिन लोगों ने यह फैसला दिया है उन्होंने धर्म की स्वतंत्रता पर संविधान की समानता को प्रधानता दी है, जैसा कि बुद्धिमान असंतोषी न्यायाधीश ने दावा किया है।

न्यायाधीश ऐसा क्यों करेंगे? क्या वे समुदाय का हिस्सा नहीं हैं? या वे स्वयं पथभ्रष्ट हैं? क्या ये प्रतिभाशाली हैं जिन्हें हम नहीं देख पा रहे हैं? ये उचित प्रश्न होंगे, वे भी इसी समाज के हैं। लेकिन न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया अपारदर्शी कमरों में की जाती है। चयन पर कोई लोकतांत्रिक जाँच नहीं है। अगर न्यायाधीशों ने नियमों का अनुपालन किया होता तो उनके फैसले में भी सच्चाई होती जिसकी आज कमी है। ऐसा लगता है जैसे विलुप्त, उदार बौद्धिक अभिजात वर्ग ने जनता के चेहरों पर कुछ फेंक दिया है, जिनसे उन्होंने मनोवैज्ञानिक रूप से वापस ले लिया है।

समाज पर नियमों के पालन का थोपा गया यह विचार कुछ समय तक ही प्रभावी है। आनुवांशिकी ने साबित कर दिया है कि युग्‍मविकल्‍पी में भिन्नताएँ एक प्रजाति के रूप में विकसित हुई हैं। सजातीय विवाह समूहों को नष्ट कर देते हैं। यदि विविधता के लाभों को समझने की सूक्ष्मदर्शिता अनुपस्थित है, तो “कितना पागलपन है” इस पर कम से कम एक उपयोगितावादी दृष्टिकोण बनाया जा सकता है। सबसे बड़ी संख्या के लिए सबसे अच्छी बात होगी।

समाज ज्यादातर लोगों – विचारों या प्रथाओं से लाभान्वित हुआ है। यहाँ तक कि आजाद देश में भी प्रतिभूतियों और विनिमय आयोग ने एलोन मस्क पर एक अनियमित ट्वीट के लिए प्रतिबंध लगाया। कितना अपमानजनक! (यह मीडिया के लिए अपने “लाइव टीवी पर धूम्रपान पॉट” प्रभार का संदर्भ लेने का मेजबान है। ढाई घंटे के वीडियो में दुनिया के भविष्य पर शिक्षा थी)

यूरोप चाहता है कि ब्रिटेन अनुरूप हो। चीन उइघुर और तिब्बतियों को अनुरूप बनाना चाहता है। अमेरिकी विश्वविद्यालयों में कैंपस उदारवादी छात्रों को यह समझाने की इच्छा रखते हैं कि वे बहिष्कार का सामना करें। कम्युनिस्ट समरूपता और बेतुकी विचारधाराओं का प्रचलन चाहते हैं जो मानवीय भावना के खिलाफ हैं। अपनी नीति बनाने में, हम स्कूलों को एक ही पाठ्यक्रम के अनुरूप बनाना चाहते हैं।

इन अनुरूपवादियों की हत्या क्या विविधता की प्रचुरता है। विविधता की स्वीकृति वास्तविक सहिष्णुता है। समाज आगे नहीं बढ़ता है। यह केवल अधिक लोकप्रिय और आरामदायक हो जाता है। माओ की भावना नहीं, “एक हज़ार फूल खिलने दो।”