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योगी आदित्यनाथ को मंदिर आंदोलन को नई दिशा देने के लिए मथुरा में क्यों घोलना चाहिए ‘पंचामृत’

प्रसंग
  • मथुरा ने योगी आदित्यनाथ को शहरी और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का एक नया आदर्श स्थापित करने का एक अनोखा मौका दिया है।
  • एक वास्तविक भारतीय जागरण के साथ ब्रज को सशक्त बनाना उन्हें बड़ी यात्राओं के लिए एक माध्यम साबित होगा, और इस बड़ी लड़ाई में हिंदुओं को सांत्वना देगा।

19 अक्टूबर को पांडलम पैलेस ट्रस्ट ने सबरीमाला मंदिर के कार्यकर्ताओं से अनुष्ठानों के उल्लंघन के मामले में उन्हें मंदिर के दरवाजे बंद करने की याचना करते हुए पत्र लिखा। पंडलम पैलेस सदस्य समिति के कार्यकारी सदस्य पी एन नारायण वर्मा ने मंदिर के द्वार बंद करने का फैसला लेने के बारे में फोन पर जानकारी देते हुए स्वराज्य को बताया, “हमारी परंपराएं बहुत प्राचीन हैं; भक्तों को विशेष परिस्थितियों में भगवान की सच्चाई की रक्षा करनी होती है। नैष्ठिक ब्रह्मचारी के अनुष्ठान, जो कि सबरीमाला मंदिर के विशेष अनुष्ठान हैं, लंबे समय से चल रहे हैं। हम परंपराओं की रक्षा कर रहे हैं।”

दो दिन बाद मंदिर के द्वार बंद कर दिए गए और परंपरा की रक्षा हुई। वर्मा ने फोन पर आगे बताया, “समर्थकों और समर्थकों के अधिकारों की सफलता के बाद जो यह खलबली मची है उसमें हमारी जीत नहीं है। हम राम जन्मभूमि, काशी और मथुरा जाएंगे।” धर्म के पैदल सैनिकों के लिए कृष्ण की मथुरा का एक विशेष स्थान है।

हालांकि, मथुरा में ब्रज और गोवर्धन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सांस्कृतिक परिवर्तनों के साक्षी रहे हैं जो कि चिंताजनक बात है। इस साल की शुरुआत में, राज्य ने मंदिरों के मामले में टांग अड़ाई। अब, यह उनके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।

यह कहानी 2013 में शुरू हुई थी जब गोवर्धन के संबंध में, जिसमें वहां के तालाबों और अन्य जल निकायों में अपशिष्ट बहाया जाना शामिल था, पर्यावरणीय मामलों पर वास्तविक याचिका नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) पहुंच गई। मथुरा स्थित संगठन गिरिराज परिक्रमा संस्कार संस्थान और अन्य ने याचिका दायर की थी। 2014 में एनजीटी ने कचरा प्रबंधन के लिए विशेष प्रयास किए।

आने वाली सरकारों को इस मामले में अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए थी। आदेश में कहा गया था, “आवेदक की ओर से अधिवक्ता यह प्रस्तुत करते हैं कि प्रशासन एमएसडब्ल्यू के उचित संग्रह और निपटान के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठा रहा है और पवित्र भूमि में कहीं भी और हर जगह कचरे के ढेर लगा दिए जाते हैं।”

एनजीटी ने नगर प्रशासन को कचरा प्रबंधन के बारे में कदम उठाने का निर्देश दिया था। इसने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के उप आयुक्त तथा क्षेत्रीय अभियंता, पीडब्ल्यूडी और नगर पंचायत के कार्यकारी अधिकारी को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि कचरा कहीं भी नहीं फेंका गया है और नगर कचरा प्रबंधन (प्रबंधन और निगरानी) नियमों के तहत इसे हटाया जाए और निपटान किया जाए।”

गोवर्धन परिक्रमा के सात कोस (21 किलोमीटर) मार्ग का एक छोर- जहां पूरे भारत और दुनिया के लोग पहाड़ियों की परिक्रमा के लिए इकट्ठे होते हैं- प्रायः यात्रा के शुरुआती स्थान के रूप में चिह्नित किया जाता है, जिस पर लोग अधिकतर पैदल ही यात्रा करते हैं। परंपरा के अनुसार वही बिंदु यात्रा के अंतिम स्थान के लिए भी उपयुक्त है। गोवर्धन को कृष्ण के ‘स्थाई चिह्न’ के रूप में सम्मान दिया जाता है और वल्लभ तथा वैष्णव संप्रदाय के लोगों द्वारा इसकी पूजा की जाती है। दानघाटी मंदिर, जो गिरिराज जी महाराज की पूजा के लिए जाना जाता है, के बाहर एक दुकानदार अपनी दुकान की दीवार पर प्रदर्शित “नोटिस” की तरफ इशारा करते हैं। वह बताते हैं, “यह सूचना हमारी दुकानों को हटाने के बारे में है। ये सभी दुकानें जो आप यहां देख रहे हैं जल्द ही हटने वाली हैं। यह अदालत के आदेश पर पर्यावरण को बचाने के लिए अधिकारियों की ओर से आदेश है, और हम इस बारे में कुछ भी नहीं कर सकते हैं। हम चुपचाप यह जगह छोड़कर अपनी खेतिहर भूमि पर वापस चले जाएंगे, कोई दुख नहीं। हम लोग तो किसान हैं, हम आराम से रहेंगे। लेकिन हमारी असली चिंता यह है कि आखिरकार इन परिवर्तनों का गोवर्धन में और विशेष रूप से दानघाटी के मंदिरों पर क्या असर होगा।” उन्होंने आगे बताया, “अगली बारी आरती स्थल की है। यह गोवर्धन पर्वत का नजारा देखने में बाधा उत्पन्न करता है।”

गोवर्धन क्षेत्र में हुए बदलावों ने 2015 में एक अन्य एनजीटी आदेश के कारण गति प्राप्त की।

आदेश में एनजीटी ने गोवर्धन और गिरिराज जी पर्वत से संबंधित पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर सिफारिशें कीं कि भक्तों के बीच और ब्रज के सांस्कृतिक आचारों में पर्वत को इतना परंपरागत माना जाता है। सिफारिशों में उल्लिखित सभी पर्यावरणीय पहलुओं को प्रत्यक्ष रूप से संबोधित करने की बहुत ही आवश्यकता थी। इस मामले में सत्रहवीं सिफारिश में एनजीटी ने बयान दिया, “इस धार्मिक स्थल के उचित प्रबंधन के लिए देश में अन्य मंदिर बोर्डों की तरह एक स्वतंत्र संगठन गठित किया जा सकता है जिसमें पवित्र स्थान / कुंड, सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, प्रदूषण नियंत्रण, जलाशय जिसमें कुंड, पोखर, तालाब, झाड़ी और संबंधित चीजें शामिल हैं इनका पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखते हुए सभी आवश्यक सुविधाएं प्रदान करना और पवित्रता बनाए रखना आवश्यक है।”

गोवर्धन को कृष्ण के ‘स्थाई चिह्न’ के रूप में श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। यहां एक भक्त हरे मैदानों की ओर जा रहा है। (सुमति महर्षि / स्वराज्य)

इस साल की शुरुआत में मीडिया रिपोर्टों में कहा गया था कि उत्तर प्रदेश सरकार ने श्री गिरिजा मुखारविंद मंदिर, दानघाटी मंदिर और मुकुट मुखारविंद मंदिर पर अधिकार करने का प्रस्ताव रखा था। राज्य धार्मिक कार्य विभाग एक मंदिर बोर्ड स्थापित करने की योजना बना रहा था। उसका उद्देश्य गोवर्धन की रक्षा करना था। इससे मथुरा और ब्रज के लोगों में, खासकर इन मंदिरों से जुड़े लोगों में और जिनकी आजीविका मंदिरों, अनुष्ठानों, परंपराओं, और मंदिर परिसर से चलती है आदि लोगों में संदेह और चिंता व्याप्त हो गई।

यह मामला पुरोहितों के पक्ष में नहीं रहा। विद्युत मंत्री श्रीकांत शर्मा, जो मथुरा से हैं और यहां से विधान सभा के सदस्य हैं, ने एक ब्रजवासी की भूमिका निभाई। उनका पहला कार्य था पुजारियों को शांत करना। उन्होंने भरसक प्रयास किए। उन्होंने अपने समुदाय के लोगों को बताया कि योगी सरकार एनजीटी सिफारिशों के अनुसार मामले पर काम कर रही है और वह यह मामला मुख्यमंत्री के समक्ष ले जाएंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वास्तव में आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आने से बहुत पहले 2015 में एनजीटी आदेश आया था। यह भरोसा शायद पर्याप्त नहीं था इसलिए नाराज पुरोहितों ने आवाज उठाई और विरोध किया, और यहां तक कि एक बुद्धि-शुद्धि यज्ञ भी किया और तीन लोगों- प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और शर्मा- की उचित (बेहतर) बुद्धि के लिए हवन सामग्री अग्नि को समर्पित की। तीनों लोगों की तस्वीरें होम के पास रखी गईं और मंत्रों का उच्चारण किया गया।

इस साल जून में, एक अन्य एनजीटी आदेश में गोवर्धन में आधिकारिक “लापरवाही” का उल्लेख किया गया था। “वर्तमान में अधिकारियों के सम्बन्ध में आदेश के अनुपालन में लापरवाही देखी गई, उन पर जुर्माना लगाया गया और उसे उनके वेतन से काटने का निर्देश दिया गया था। यहाँ तक कि यह आदेश भी अधिकारियों की नींद तोड़ने में नाकाम रहा।” टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट दी, “नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने उत्तर प्रदेश सरकार को गिरिराज पर्वत पर सभी अवैध रूप से निर्मित मंदिरों और मथुरा में वन विभाग के तहत 12 हेक्टेयर भूमि के दायरे में आने वाले मंदिरों को हटाने का निर्देश दिया है।”

स्वराज्य ने इस साल की शुरुआत में पुरोहित विरोध प्रदर्शन की सूचना दी थी। मनीश शर्मा, जो दानघाटी मंदिर में पुरोहित हैं जिनसे स्वराज्य ने पिछले महीने एक बार फिर मुलाकात की थी, बताते हैं कि आरती स्थल के हटाए जाने से पुरोहित और भी अधिक व्याकुल हो रहे हैं। उन्होंने बताया, “गिरिराज जी महाराज की आरती एक प्राचीन परंपरा है। इसमें हजारों भक्त शामिल होते हैं। विशेष अवसरों- जैसे गोवर्धन पूजा, शरद पूर्णिमा, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा इत्यादि- पर इनकी संख्या में बढ़ोत्तरी होती है। मंदिर अधिग्रहण की खबर ने उन लोगों को परेशान कर दिया जो सेवा कार्य में आगे रहते हैं। अब आरती स्थल के विध्वंस और हटाने से हमें असहजता हो रही है। लेकिन हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। हम इस नई योजना को लेकर दुख झेलने के लिए बाध्य हैं।”

वह मंदिर बोर्ड की स्थापना के बारे में क्या सोचते हैं? “हमारे मंदिरों और परंपराओं को इससे होकर गुजरना है। हम 15-20 पुरोहित मंदिर के हिस्सेदार हैं।” उनका अनुमान है कि लगभग 400 परिवारों के 3,000- 4,000 लोग मंदिर बोर्ड के तहत मंदिर प्रशासन में बदलावों के शिकार होंगे। मथुरा में लगभग 4,000 मंदिर हैं। शर्मा के अनुसार, मंदिर में होने वाले अनुष्ठानों और परंपराओं के मामलों में मंदिर बोर्ड कई हस्तक्षेप करेगा।

काशी, राम जन्मभूमि और मथुरा में से काशी अपनी छवि, घाट और आरती को बहाल करने के लिए प्रयासरत है, रामजन्मभूमि में भगवान राम का कोई मंदिर ही नहीं है और मथुरा मंदिरों पर सरकार द्वारा कब्जा करने और अधिग्रहण करने के भय और अनिश्चितताओं के सागर में गोते लगा रहा है। कम्युनिस्टों ने कभी इस राज्य पर शासन नहीं किया है। एक के बाद एक सरकारें और वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार उस महिमा को बहाल करने में कम या अधिक असमर्थ रही है जिस महिमा को कोई भी राम और कृष्ण की भूमि से जोड़ना चाहता है। यह आदित्यनाथ के गोरखपुर से लखनऊ आगमन तक था जिन्होंने हिन्दुओं और मथुरा को एक नयी उम्मीद, विशेषकर उन पर अधिक ध्यान दिया।

संस्कृति पर हमला करने वाले आडम्बर करने में पारंगत हैं। एक जीवंत परंपरा के वास्तविक या अमूर्त रूप को नष्ट करने के लिए हमला करने से पहले, वे मौजूदा लोकाचार समाप्त करने के लिए ढोंग करते हैं। जब सांस्कृतिक आक्रमणकारी मंदिर, इसके अनुष्ठानों, इसके देवताओं, मूर्तियों की ओर बढ़ते हैं, तो वे कभी-कभी भक्ति या संरक्षण का आडम्बर करते हैं – यानी वे दिखाना चाहते हैं कि वे भी भक्तों की ही तरह रक्षार्थ भाव रखते हैं।” मथुरा के विभिन्न मंदिरों में सेवा करने वाले कुछ पुजारियों और पुजारियों के अधिकारों की रक्षा करने वाले समूह का नेतृत्व करने वाले विभिन्न जातियों के कई लोगों का ऐसा कहना है जो कृष्ण जन्मभूमि परिसर से संबंधित हैं।

परिक्रमा का एक स्थलः गोवर्धन में दानघाटी मंदिर। (सुमति महर्षि/स्वराज्य)

पिछले महीने स्वराज्य की टीम एक बार फिर मथुरा पहुंची थी। अक्टूबर के महीने में मथुरा में रोशनी के त्योहार दीवाली की तैयारियां की जाती हैं, जिसमें पूरे भारत से भक्तगण यहां आते हैं। अनुष्ठानों और संबंधित उत्सवों में गोवर्धन पूजा और परिक्रमा का विशेष स्थान है। लेकिन वर्तमान समय में गोवर्धन में मनोदशा अनिश्चितता और उत्सव के एक असंतुष्ट मिश्रण की तरह है। स्थानीय लोग स्पष्ट रूप से “मंदिर नियंत्रण” संकट को लेकर परेशान हैं।

लेकिन वे स्वीकार करते हैं कि गोर्वधन में तीर्थस्थल को अव्यवस्था और खलबली से बचाने के लिए कई साल पहले ये बदलाव किए जाने चाहिए थे। अशांति की अवस्था में, एक पुजारी का कहना है, “गोवर्धन में लोग स्थानीय प्रशासन के साथ सहयोग कर रहे हैं, और जो कुछ बताया जाता है, वह पर्वत या पवित्र पहाड़ी की पारिस्थितिकी और सुरक्षा के लिए अच्छा है। गोवर्धन के पारंपरिक निवासियों को बाहरी लोगों के आगमन और सेवायत के रूप में रहने वाले लोगों को लेकर कोई दिक्कत नहीं होती। वे हम में से एक हैं। हालांकि, हम गोवर्धन संरक्षण के नाम पर हमारे अनुष्ठानों में हस्तक्षेप से डरते हैं। इस पहाड़ी की हम पूजा करते हैं। इसके पर्यावरण का हम सम्मान करते हैं। हम जानते हैं कि इसे कैसे संरक्षित किया जाए।”

आदित्यनाथ की सरकार बनने तक, उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थल, विशेषकर मथुरा के धार्मिक स्थल इतनी भक्तों की इतनी बड़ी संख्या को आकर्षित करने के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी के सानिध्य में केंद्रीयता हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। एक बेहतर सांस्कृतिक परिदृश्य में, मथुरा जैसे धार्मिक केंद्र में पुजारियों और लोगों को भारत के किसी भी हिस्से में किसी भी धार्मिक लड़ाई के लिए बौद्धिक आधार और भावनात्मक अवशोषक के रूप में कार्यरत होना चाहिए था। वर्तमान में स्थिति उनसे कुछ और मांग कर रही है। धैर्य और आस्था। क्या मथुरा हिंदू महिमा का शीर्ष बनने और सभ्यतापूर्ण निरंतरता का पर्याय बनने के लिए “अनुकूल” राजनीतिक माहौल से सुसज्जित है? क्या कृष्ण के सुरक्षात्मक छत्र और चक्र के तहत उनके उत्कृष्ट मानकों के लिए अनोखे अनुष्ठानों और परंपराओं को फिर से स्थापित किया गया है?

यदि आपके मन में है कि मथुरा में सकारात्मक राय बन रही है तो उत्तर है ‘नहीं’। कृष्ण से संबंधित लोगों को नाराज करने से कई समुदाय अस्त-व्यस्त हो जाएंगे जिनसे मिलकर हिंदू समुदाय का गठन हुआ है। चूंकि सामूहिक धर्म परिदृश्य 2019 की ओर तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए राज्य सरकार को ऐसे कदम उठाने पर विचार करना चाहिए जो न केवल मंदिरों और अनुष्ठानों की पवित्रता की रक्षा करते हैं, बल्कि अधिक प्रभावी ढंग से मंदिरों और उनके परिसरों पर निर्भर लोगों के जीवन में बदलाव लाते हैं।

इसके लिए आदित्यनाथ को पहले मथुरा के हिंदुओं का विश्वास पुनः स्थापित करना चाहिए। इसके लिए, उन्हें धर्म को एक बड़े सांस्कृतिक दृष्टिकोण के रूप में मानना चाहिए, मथुरा को एक ऐसे धार्मिक केंद्र में परिवर्तित करना चाहिए जो इसके मंदिरों और लोगों के लिए अनुकूल हो। इसके लिए उन्हें ब्रजवासियों का समर्थन करना चाहिए जिससे वे भविष्य में गोवर्धन, अनुष्ठानों, मंदिरों, इनकी सांस्कृतिक विरासत, और उनकी सभ्यता की पहचान के साथ बहादुरी के साथ खड़े हो सकें।

पंचामृत- बदलाव के लिये पाँच जरुरी तत्व

आदित्यनाथ पंचामृत निकाल सकते हैं। मथुरा के मंदिरों की ख्याति को फिर से सबसे पहले जीवित करते हुए पांच तत्वों के मिश्रण और उसे प्रसाद की तरह उपयोग करें। आध्यात्मिकता के प्रयासों, जो दीयों को प्रज्ज्वलित करने और करोड़ों की निधि घोषित करने से जाया होती है, से आगे जाना है। ऐसा समझा जाता है कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को एनजीटी के निर्देशों पर बातचीत करनी होगी और उनका सम्मान करना होगा। फिर भी, उनसे एक महंत के रूप में अपनी पहचान के अनुसार काम करने की उम्मीद की जाएगी। चाहे उन्हें प्रतिद्वंद्वियों और मीडिया से चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें गर्व और उत्साह दोनों को संरक्षित रखना चाहिए।

आदित्यनाथ के लिए पंचामृत के पाँच तत्व हैं, भूमि (मंदिर से परे जाकर भूमि पर काम), अग्नि (मथुरा का अनुष्ठान, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, बौद्धिक बहाली), जल, (यमुना और कुण्डों को पुनर्जीवित करना), व्योम (अपने दरवाजे पर चुनावी और सांस्कृतिक मंथन के लिए संचार), और मारुत (भारतीय हिन्दू संचार की गति और गर्व)।

भूमि

आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में पाने लिए जरुरी काम निश्चित कर रखा है। उन्हें हिन्दू छवि के लिए जाना जाता है। 2019 के पहले वह सही कदमों को तैयार कर रहे हैं, और मथुरा इस मंथन की शुरुआत को चिन्हित करना चाहिये। दिलचस्प बात यह है कि अगर आदित्यनाथ सरकार 2015 के एनजीटी आदेश में सिफारिशों का पालन करती है और जून 2018 में आए आदेश में गोवर्धन के पर्यावरण और विकास के सभी अवलोकनों को समझती है, तो मंथन आसान, तेज, और ज्यादा असरदार हो जाएगा।

पहला: एनजीटी आदेशों के लिए दिमाग और ब्रज के लिए दिल रखें 

मथुरा को एक समेकित हिंदू पहचान का विचार स्थापित करना चाहिए। इसके लिए, आदित्यनाथ को अपने दिल से थोड़ा और दिमाग से बड़े स्तर पर सोचना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि मंदिरों से सीधे जुड़े ब्राजवासियों को डर है। एक मंदिर बोर्ड की संभावना बहुत ही अनिश्चितता की भावना पैदा करती है, और ऐसा कुछ लगता है क: “योगी जी हमारे और मंदिरों की देखभाल नहीं कर रहे हैं; एनजीटी आदेश हमारे मंदिरों को नियंत्रित करने का बहाना है; हमारी परंपरा और रिवाज खतरे में हैं।” डर के पीछे तीन मंदिरों के पुजारी हैं।

क्या सरकार ने विशेष रूप से पुजारियों को “नियंत्रण” दिया है? क्या इसका झुकाव गोवर्धन में तीन मंदिरों के प्रबंध मामलों पर स्पष्ट हुआ है? सीधे और स्पष्ट रूप से बिलकुल नहीं क्योंकि गोवर्धन में पुजारी पेंट किए गए बोर्डों पर विभिन्न पूजा समारोह आयोजित करने के लिए शुल्क का जिक्र करते हैं।

पुजारी के लिए एक मंदिर की संस्था की सम्भावना का मतलब क्या है? उनका मानना ​​है कि सबसे पहले, सरकार खुद मंदिरों के माध्यम से मंदिरों के प्रबंधन और प्रशासन में भी शामिल हो सकती है। मुख्य चिंता है: एक बार जब सरकार शामिल हो जाती है, तो उन्हें पूजा के मामलों और संख्याओं में हस्तक्षेप करने के लिए ” अपने आदमी” (अपने गुट के पुरुष) मिल सकते हैं; पुजारी को पूजा और पूजा करने के लिए जो राशि मिलती है, उसे निश्चित करें (वर्तमान में, दानघाती मंदिर के पुजारी ‘स्वराज्य’ को बताते हैं, हर पुरोहित को मंदिर से 10,000 रुपये प्रति माह और बच्चे की शिक्षा के लिए 5,000 रुपये मिलते हैं)। प्रबंधन और प्रशासन के मामलों के प्रबंधन के लिए, सरकार हर उस क्षेत्र में पुरोहितों की चिंता करेगी जो मंदिर निधि के विनियमन या पीढ़ी से संबंधित है।

न्यायालय और ट्रिब्यूनल के आदेशों का पालन करते समय ‘नियंत्रण’ को परिभाषित करें, डर और चिंता को फैलाए। परिक्रमा में कच्चा और पक्का रास्ता है- कच्चा रास्ता ज्यादा स्वच्छ हवा और सांस लेने की जगह उपलब्ध करता है।

इस सरकार को दोनों के लिए कदम उठाने चाहिए।

दूसरा: मिशन गोवर्धन 

चलिए 2015 में आए एनजीटी आदेश पर वापस आते हैं- आदित्यनाथ की अगुआई वाली बीजेपी की सरकार के उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने से पहले। और सत्तर की सिफारिश करने के लिए। यह आपको क्या बताता है? गोवर्धन, जिस पर्वत को कृष्ण ने उठाया था, को मंदिर बोर्ड के साथ क्या करना है? पर्यावरण और गोवर्धन, सब कुछ करना है। गोवर्धन में विशेष रूप से परिक्रमा मार्ग पर समय-समय पर बिताए गए समय, आपको बताएंगे कि एनजीटी के सभी आदेश इस सूची से पहले, यदि न्यूनतम विवरण के बाद, गोवर्धन के स्वास्थ्य और सांस को बदल देंगे, इसकी पारिस्थितिकता, और तीर्थ केंद्र, साइट और लोगों के समग्र कल्याण में योगदान देता है।

गोवेर्धन के परिक्रमा मार्ग पर बार बार बिताया गया समय, बताएगा कि इससे पहले लिस्ट में दिए गए एनजीटी के सभी आदेश अगर बारीकी से अनुसरण किए जाएं तो गोवेर्धन की हवा, स्वास्थ्य और उसकी पारिस्थितिकता को बदल देंगे और तीर्थ, स्थान और लोगों के समग्र कल्याण में योगदान देंगे।

मथुरा के किसान को कार्य के केंद्र में रखें (सुमति महर्षि/ स्वराज्य)  तीन: सेवायत को सशक्त बनाना; किसान को कार्य के केंद्र में रखें

  परम्परा गरिमा है और गरिमा, परम्परा है। सामूहिक रूप से और क्रमशः मंदिरों की परम्पराओं में अनुष्ठान, प्रथाओं और परंपराओं की पवित्रता रखते हुए पुजारी को संरक्षित करें। मनीष शर्मा कहते हैं, “सेवयत कई जातियों के हैं। हर जाति न केवल मंदिर के पारिस्थितिकी तंत्र बल्कि पुजारी के लिए भी जरुरी है। अगर पुजारी भावनात्मक और वित्तीय असुरक्षा में जी रहा है, तो दूसरे कैसे आगे बढ़ सकते हैं?  हम सब एक हैं।”

किसानों के साथ बातचीत बढ़ाएं, मंदिरों से संबंधित मुद्दों पर उनके ज्ञान का सम्मान करें और उनका उपयोग करें। मथुरा के त्यौहार और मंदिरों के मामलों में, मथुरा का किसान भी सेवयत है (जो सेवा करता है या देवता की सेवा करता है)। वह श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी है जो मथुरा के मंदिरों में शुरू होता है और वहीँ समाप्त होता है। वह राल का निवासी है, वह गांव, जहाँ से आगंतुक के लिए गोवर्धन शुरू होता है, वह पुंछरी का लोटा का वह व्यक्ति है, जो फूलों सहित पूजा में इस्तेमाल किए जाने वाले तत्वों को साथ लेकर आता है। मथुरा का किसान भी अमूर्त विरासत, हर अवसर के लिए लोकगीत, कहानियों, परंपरागत ढोल और थाप का हिस्सा है- जिसे ‘स्वराज्य’ ने बरसाना में आदित्यनाथ के होली उत्सव के दौरान देखा था।मथुरा के किसान, स्थानीय संस्कृति के करीब होने और इसका उपभोग करने के कारणों की बहुतायत होने की वजह से बौद्धिक और सांस्कृतिक गहराई से परिपूर्ण  हैं। मथुरा के किसान बरसाना और नंदगांव के बीच लट्ठमार होली की आध्यात्मिक रूप से चलती प्रतियोगिता में एक कलाकार के लिए आकर्षक रूप से अपनी भूमिका निभाने के लिए तब्दील हो जाते हैं। वह मंदिरों में पूजा-अर्चना में उपयोग की जाने वाली कई सामग्रियों को उपलब्ध करता है।

मार्च में, जब सरकार ने बड़े स्तर पर होली समारोह आयोजित किया तो किसान  आदित्यनाथ के पक्ष में थे। तब बरसाना में किसान ऋण (पूर्ण छूट) को लेकर  असंतोष को सुना गया था, लेकिन किसानों ने ‘स्वराज’ को बताया था कि वे खुश थे कि वह जिस पर “विश्वास” करते हैं वह राज्य पर शासन कर रहे थे और मथुरा पर अधिक ध्यान देते थे, जो पहले कभी नहीं दिया गया था। यह किसान और मंदिर पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अच्छा फल साबित होगा।

चौथा: ब्रज की परिधि को मजबूत करना

यह ब्रज तीर्थ विकास परिषद के माध्यम से करोड़ों रुपयों के साथ भी किया जा सकता है। भक्तों की भावनाओं का सम्मान करते हुए वर्ष 2017 में वृंदावन और बरसाना को तीर्थ स्थल घोषित किया गया था। जहाँ विभिन्न हितधारकों के बीच समन्वय सुनिश्चित करने के लिए “मंदिर प्रबंधन/ट्रस्ट” परिषद के मकसदों में से एक है, जो मथुरा में कई करोड़ों की विभिन्न परियोजनाएं भी चला रहा है, ब्रज विकास योजना की तैयारी की, और “योजना में संकेतित चरणों के अनुसार” ब्रज क्षेत्र की बात भी करती है, इसके कार्य का हिस्सा हैं। ब्रज तीर्थ विकास परिषद (बीटीवीपी) के अध्यक्ष आदित्यनाथ हैं।

पिछले महीने, ‘दैनिक जागरण’ की एक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया था कि एक मंदिर बोर्ड के लिए संकेत को अधिक बल तब मिला जब वह उस मंच से आया। जहाँ मुख्यमंत्री मौजूद थे। यह ब्रज विकासोत्सव का अवसर था। शीर्षक और रिपोर्ट के अनुसार, आदित्यनाथ ने इसके संकेत दिए थे। रिपोर्ट में यह कहा गया कि मंदिर बोर्ड और उद्योगपतियों के माध्यम से राज्य सरकार मथुरा को बड़ा तीर्थ स्थल और पर्यटन स्थल बनाने के लिए आवश्यक बजट को पूरा करने के लिए धन की संभावना को देख रही है। ‘इस बीच, सितंबर में, जन्माष्टमी के अवसर पर घोषित विभिन्न परियोजना योजनाओं को शुरू करते हुए मथुरा में करोड़ों रुपए लगाए गए हैं। गोवर्धन के एक स्थानीय व्यापारी ने अक्टूबर में ‘स्वराज्य’ को बताया, “करोड़ों रुपए मथुरा में भेजे गए हैं। हमें उम्मीद है कि वे लोगों की अपेक्षाओं और योगी (आदित्यनाथ) जैसे व्यक्ति के अच्छे इरादों को पूरा करेंगे; हालांकि, गोवर्धन में बहुत सुधार करने की जरूरत है और इन निधि से किए गए कामों से आखिर में परिणाम दिखने चाहिए।”

हालांकि ब्रज में, शर्मिंदगी नहीं बल्कि आशावादी होकर कोई परियोजनाओं और सुरुचिपूर्ण मूल्य को पूरा करने की उम्मीद कर रहा है, यह देखना अच्छा होगा कि बीटीवीपी एक साथ ब्रज के भाव- इस क्षेत्र के असली सार को संरक्षित करने के लिए और अधिक ध्यान केंद्रित करने की दिशा में काम करता है। यह स्थानीय भावनाओं में कम बजट वाला होगा। समझदार भक्त की नज़रों में एक आश्वासन वाला विकास होगा। ब्रज मंदिर पारिस्थितिकी तंत्र के सभी वर्गों में विश्वास का क्षण होगा।

केंद्र जब आध्यात्मिक, सरल और सादगीभरा होता है, तो वह हमेशा मजबूत और वास्तविक होता है। हिंदू पुनरुत्थान हमेशा कई करोड़ों रुपयों से ज्यादा का केंद्र चाहता है। अतीत में देखते हुए और वर्तमान के नियंत्रण में रहकर, भविष्य का निर्माण करें।  

पाँचवा: ऐसे शिक्षा के संस्थान स्थापित करें जिसके ब्रजवासी लायक हैं  

स्थान पर मंदिर बोर्ड का संकेत? बढ़िया है। ब्रज में ब्रज के शिक्षण संस्थानों को स्थापित करने के लिए, ब्रज तीर्थ विकास परिषद्, उद्योगपतियों, राज्य सरकार और मंदिर बोर्ड को साथ में मिलकर काम करने दीजिये। क्या आप चाहते हैं कि संकेत मूल्यों के आधार पर मंदिरों को सुधारा जाए? ब्रज्वासियों को इक्कीसवीं सदी में अच्छा भविष्य देने के लिए शिक्षास्थलों को समर्पित बनाया जाए, जबकि वह धार्मिक विकास में धर्म से जुड़े हुए हैं। दानघाटी मंदिर में सेवा दे रहे एक पुजारी ने बताया, “यहाँ हमारे बच्चों के लिए अच्छे स्कूल नहीं हैं। सरकारी स्कूल या ‘कोंवेंट’ स्कूल हैं जो ज्यादा अच्छे नहीं हैं। अपने बच्चों के लिए हम मूल्य आधारित धार्मिक इक्कीसवीं-सदी की शिक्षा चाहते हैं”।

पुजरियों को लाइसेंस दिया जा सकता है। क्यों नहीं? (सुमति महर्षि/ स्वराज्य)

छठवां: यजमान-पुरोहित के सम्बन्ध प्रगाड़ करने में मदद करता है  

यहाँ मंदिर भी हैं। लोगों का आना-जाना भी है। और पुजारी भी हैं। ओह! पुजारी, बहुत सारे। दूसरी तरफ, धार्मिक, पूजा करने वाला और भगवान कृष्ण और उनके स्वरूपों का प्रेमी है। सबकुछ सही जगह पर प्रतीत होता है। गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर एक मंदिर में, परिक्रमा के दौरान आध्यात्मिक रूप से मूल्यवान इतनी खूबसूरत तस्वीर नहीं आती है, जो इससे पहले आपकी आंखें कृष्ण के स्वरुप को अपने मन के अन्दर देख सकती हैं। मंदिर में प्रवेश द्वार पर रुकने के कुछ सेकंड के बाद, भक्त को पंडों और पुजारियों के झुण्ड दान के लिए घेर लेते हैं। श्रद्धा में आकर भक्त दान तो कर देता है लेकिन कुछ कमी रह जाती है। पुजारी-यजमान संबंध का आश्वासन। कोई भी भक्त पहले लीलास्थल, फिर मंदिर की उदासीन स्थिति, और फिर समुदाय और आखिर में खुद को रुंधे हुए गले के साथ छोड़कर नहीं जाना चाहता/जाना चाहिए। कोई मंदिर बोर्ड इसे हासिल नहीं कर सकेगा। पुजारियों के बीच सुरक्षा की भावना होगी। मिश्रा आगे कहते हैं, “सरकार को एक पहलू को समझना है। यदि भक्त वास्तविक पुरोहितों, जो उन्हें अनुष्ठानों और पुजाओं के साथ मदद करेंगे, तक पहुंचने की बजाए लपकों और बिचौलियों का शिकार होकर धार्मिक स्थल पर प्रामाणिकता खो रहे हैं, तो पूरे मंदिर के पारिस्थितिकी तंत्र को भुगतना पड़ेगा। क्यों? जब तक पुरोहित मंदिर में यजमान की मेजबानी नहीं कर लेता है, तब तक वह संबंध प्राप्त नहीं होता है जिसके लिए वह बना है। यहां तक ​​कि गरीब से सबसे गरीब पुरोहित तक पहुंचने में सक्षम होना चाहिए।”

पुजारियों को लाइसेंस दिया जा सकता है। क्यों नहीं? और बिचौलियों और लपकों पर नज़र रखनी चाहिए।

तो, बदलाव कहाँ से शुरु होना चाहिए। पुजारी के हस्तक्षेप के माध्यम से। दखलअंदाजी से नहीं।

पुजारी को गर्व की भावना के साथ सशक्त बनाना, मंदिर के पारिस्थितिकी तंत्र की मूल्यवान इकाई होने की धारणा की भावना है (चाहे यह राजनीतिक शुद्धता निर्धारित करता है)। परिवार के मुखिया के रूप में अपनी जरूरतों को जानें। देखें कि यह जरूरतें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चल रहे, प्रबंधित या गलत रूप से प्रबंधित मन्दिर से कैसे जुड़ी हुई हैं। इन चीज़ों को अपने शब्दों, दृष्टि और कार्रवाई में लाओ। बिजली मंत्री शर्मा कहते हैं, “सेवायत का कल्याण हमारी प्राथमिकता है। हम अदालत के आदेशों का पालन करेंगे, साथ ही, हम, सेवायतों की देखभाल करेंगे। मैं श्रीकांत शर्मा के रूप में यह कहता हूँ।

सातवाँ: मंदिर बोर्ड, ठीक है। मंदिर निधि मंदिर, धर्म और यजमान के लिए होनी चाहिए  

वर्तमान में सांस्कृतिक मार्क्सवादी होने के बोझ के नीचे कोई भी नहीं है। आइए फिर चीजों को सुखद और धार्मिक रूप से देखते हैं। पुरोहित मंदिर के पैसे कुछ कार्यों में खर्च करना चाहता है। शायद यह जानना अच्छा विचार है कि ये कारण क्या हैं और क्या हो सकते हैं। हो सकता है कि पुरोहित “विकास” के नाम पर सड़क पर एक कठोर खूंटी में रूपए लगाने की जगह एक शहीद सैनिक के परिवार की मदद करना चाहता है। हो सकता है कि वह एक जरुरतमंद यजमान की-किडनी प्रत्यारोपण या शल्य चिकित्सा के लिए- कृष्ण के नाम पर मंदिर में दिए गए चढ़ावे से- मदद करना चाहता है। हो सकता है कि पुजारी मंदिर के धन का एक हिस्सा धर्म के लिए कठोर आदेश के खिलाफ के विरोध में समर्पित करना चाहते हैं। या शायद गोवर्धन में एक मंदिर ने संगीत की पेशकश के लिए एक मुरली बजाने वाले की मेजबानी करने का फैसला किया। तो, उसके और उसके सह-पुजारियों को निर्णय लेने और लेने की आजादी होगी?

आखिर में, एक अलग मुद्दा। मान लीजिए कि एक मंदिर बोर्ड का सदस्य एक संगीतकार है जो अचानक सूफी संगीत में चला गया है क्योंकि वह दिल्ली के शक्तिशाली मंडली में जरुरी संतुलन बनाना चाहता है। क्या पुजारी मंदिर के बाहर मंदिर के पैसे पर विचारों और सांस्कृतिक पहलुओं के प्रचार से इंकार कर पाएंगे?

आठवाँ: स्वच्छता का मतलब सफाई से है। इसे साफ रखें।

गंदगी से पटे तीर्थ स्थल, खराब सीवेज और गंदे नाले, परिक्रमा मार्ग पर घूमने वाले सूअर, भक्ति या बैकुंठ का कोई रास्ता नहीं है। सूअरों और दूसरे भटकने वाले जानवरों को छोड़कर कुछ समुदायों या जातियों को खुश रखने से तीर्थयात्रियों को परेशान करना, यह कोई आतिथ्य नहीं है। परिक्रमा मार्ग को जाकर देखें। कृपया इसे आगे आगे बढाएं।

नौवाँ:  सामाजिक और पर्यावरणीय बाधा की पहचान करें

उपद्रव के क्षेत्रों और हर व्यक्ति के मूल्य में उनकी पहचान करें। इन परेशानियों का पेपर में मोटे तौर पर सूक्ष्म विवरण दें। देखें कि रचनात्मक अवसरों और विकल्पों की पेशकश के ज़रिये कैसे परेशानियों को प्रतिस्थापित किया जा सकता है जो एक सुरक्षित, भक्त-अनुकूल अनुभव बनाता है, जो पुजारी और उसके परिवार के लिए अनुकूल ही नहीं है, बल्कि मंदिर प्रणाली को छिपाने वाले ‘कदाचार’ से संबंधित बाधाओं को भी दूर करता है।

दसवाँ: तीर्थयात्रा और पर्यटन के बीच एक रेखा खींचे

वर्तमान में, ऐसा लगता है कि, दोनों एक दूसरे में फैल रहे हैं, जिसकी वजह से अदृश्य और दिखाई देने वाली अराजकता हो रही है। दृश्य अराजकता में इमारतों, स्वच्छता, सड़कों, वाहन, और संबंधित यातायात, भीड़ प्रवाह, आदि जैसे क्षेत्र शामिल हैं। अद्रश्य अराजकता में, भक्ति और मंदिरों के मामलों में अदृश्य-अंतर्निहित उदासीनता, शहरी सौंदर्यशास्त्र, भक्तों के बारे में नीति, खासकर त्यौहारों के दौरान जो पर्यटकों और भक्त दोनों के झुंड को आकर्षित करती हैं। वाहन यातायात आखों का काँटा बना हुआ है। गिरिराजजी पर्वत (2015) के आसपास के पर्यावरण से संबंधित एक आदेश में एनजीटी ने कहा था: “सभी यातायात को सेवा सड़क पर समाप्त कर दिए जाने के लिए कहा गया था और चिकित्सा और अग्नि सेवाओं के अलावा किसी भी वाहन चालन के लिए परिक्रमा मार्ग पूरी तरह से बंद हो सकता है।” उन्होंने अवैध निर्माण का भी उल्लेख किया था और कहा था कि यह सिफारिश की जाती है कि परिक्रमा मार्ग और गिरिराज जी के स्थान के बीच इस तरह के अवैध निर्माण को ध्वस्त कर दिया जाए, ताकि तीर्थयात्रियों को गिरिराज गोवर्धन के स्पष्ट और अबाधित दर्शन हो सकें। अगर पहले की सरकारों ने वर्तमान सरकार की सत्ता में आने से पहले, तीर्थयात्रा और पर्यटन के बीच एक रेखा तैयार की होती, तो  कम से कम गोवर्धन की स्थिति काफी बेहतर रही होती।

अग्नि

सांस्कृतिक दृष्टिकोण राजनीतिक खोज में खतरे और असभ्यता को जन्म देता है जबकि राजनीति और धर्म के पुनर्स्थापन के साथ मिलकर यह संस्कृति और कलाओं को अग्नि की शक्ति प्रदान करता है।

कृष्ण सबसे महान कलाकार, महानतम संगीतकार, और लीला तथा नृत्य के अधिपति हैं। फिर उनकी अपनी भूमि को उनकी विरासत का सबसे अच्छा उपयोग करने से वंचित क्यों होना चाहिए?

दुर्भाग्यवश कई भारतीय (जिसमें उत्तर भारत के कई भाजपा-समर्थक शामिल हैं) सांस्कृतिक मूल्यों, कला के रूपों और सांस्कृतिक संपत्ति के घटते महत्व का हवाला देते हुए “नाच”, “गाना” और “नौटंकी” के रूप में अपनी संस्कृति के कई पहलुओं को अस्वीकार करते हैं और इनका उपहास करते हैं। विडंबना यह है कि इन पहलुओं की प्रकृति तथा शैली समृद्ध, ग्रामीण, शास्त्रीय और सुस्पष्ट है और ये क्षेत्र को अपनी अनूठी पहचान देते हैं। दूसरी तरफ भारतीयों के अलावा, सामाजिक और सांस्कृतिक विपदाओं और विभाजन ने भी कला के माध्यम से सांस्कृतिक संपत्ति के निर्माण के लिए पर्याप्त कारणों के रूप में कार्य किया है। फिर ब्रज, जो कि हमारे प्रेम तथा अंतर्निहित आनंद, रस और राग का आधार है, सभ्यता की निरंतरता के उद्गम स्थल पर कला का उत्सव क्यों नहीं मनाता?

नारी शक्ति को आमंत्रित तथा संगठित करें, ब्रज को सशक्त बनाने के लिए उनके विचारों और प्रतिभा का उपयोग करें। (सुमति महर्षि/स्वराज्य)

ग्यारहवाँ-ब्रज को आकार दें और रक्षा करें, इसका मतलब यह केवल ब्रज नहीं एक पहचान होनी चाहिए।

ब्रज एक भाव है, कृष्ण के प्रेम की अभिव्यक्ति है। इसका वास्तविक पुनरूद्धार कला के सबसे बड़े अग्रदूत और कई लीलाओं के प्रमुख बिंदु की प्रिय भूमि के रूप में सुधार के माध्यम से होगा। कृष्ण की यादगार के लिए ब्रज का अवलोकन करें, संभवतः जैसे वे इसका अवलोकन किया करते थे।  एक बार न्यायोचित सुधार कार्यवाही हो जाने के बाद, मंदिरों, पुजारियों और सेवायतों के कल्याण समेत सब कुछ अपनी जगह सही हो जाएगा। भाव की पुनर्स्थापना और पर्यटन से संबंधित गतिविधियों के लिए मंदिरों से दूर और यमुना से दूर ब्रांडिंग की जा सकती है।

बारहवाँ- ब्रज के लिए एक सांस्कृतिक नीति अपनाएं और प्रलेखीकरण निश्चित करें

अलग-अलग रूपों में मथुरा और ब्रज का उल्लेख एक पद्धति को इंगित करता है जो उन्हें विभाजित करता है। मथुरा और ब्रज अलग भाव हैं जिनके अलग-अलग आध्यात्मिक उद्देश्य/अर्थ हैं। पहली बात यह है कि बरसाना, नंदगांव, बृंदावन, गोवर्धन और मथुरा में कृष्ण के लिए अलग-अलग अर्थ और भाव थे। उन पर शासन करते समय उनके साथ कैसे प्रेम करना है, एक के लिए दूसरे का त्याग, वहां से हट जाना और फिर से दिखाई देना आदि के लिए कृष्ण ने संकेत छोड़े हैं। मथुरा के लिए सांस्कृतिक नीति जल्द ही निर्मित होनी चाहिए। इसे “विकास” के लिए  केवल धन पर ही ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए बल्कि ऐसे पहलुओं के मामले में सफल होने में सक्षम होना चाहिए जिन्हें तत्काल, अल्पकालिक और दीर्घकालिक उत्थान की आवश्यकता हो। इसे गतिविधियों के ऐसे तंत्र को तैयार करना चाहिए जो कि तीर्थयात्रा केंद्र की सांस्कृतिक विरासत और लोकाचारों की पुनर्स्थापना करने के लिए किए गए कार्यों को ध्यान में रखते हैं, प्रगति पर काम करते हैं और नए विचारों का संग्रह हैं जो लागत और न्यूनतम धन के तहत परिवर्तन ला सकते हैं। इसकी रूपरेखा मथुरा में तैयार होनी चाहिए, लखनऊ में इस पर विचार होना चाहिए और मथुरा की जमीन पर इसकी कार्यवाही होनी चाहिए।

दूसरी बात यह है कि ब्रज के लिए एक उल्लेखनीय सांस्कृतिक नीति बहुत ही आवश्यक है जो इक्कीसवीं शताब्दी के अनुकूल प्राचीन और सभ्यतात्मक परिवेश स्थापित कर सके। निश्चित रूप से, अधिकारी-वर्ग इस क्षेत्र को विचारकों, कलाकारों, दूरदर्शियों और विद्वानों के लिए अनुकूल मानने का समर्थक रहा है। देश में कला के क्षेत्र में सच्चे विचारकों की कोई कमी नहीं है जो दार्शनिक गहनता को सामने ला सकें और सांस्कृतिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दे सकें साथ ही साथ अमूर्त विरासत, मौखिक परम्पराएं, पूजा विधि, मथुरा के गीत और प्रेमगीत, कुंड और लीलास्थल, संबंधित लीलाएं और अन्य के प्रलेखन के लिए प्रणाली को सुदृढ़ कर सकें।

तेरहवाँ: ब्रज को ज्ञानदान के केंद्र के रूप में स्थापित करें

आज हिंदू अपने सवालों के जवाब की तलाश में है। यह ज्ञान से ही संभव होगा-जो मुक्त रूप से ज्ञानियों से प्राप्त होता है। ज्ञानदान समय की जरूरत है। सबसे पहले मथुरा के बच्चों के लिए, पुजारियों-सेवायतों, वहां के सभी जाति के निवासियों और वहां कार्यरत लोगों के बच्चों के लिए इसे शिक्षा का एक अंग बनाया जाए जिनकी भाषा ब्रज है। फिर बाहरी लोगों को इसकी हिस्सेदारी दी जाए। गुरु-शिष्य परम्परा के तहत और दिन या सप्ताह या महीनों तक चलने वाले व्याख्यान के तहत ज्ञानदान में धार्मिक शिक्षाविदों, विचारकों, दूरदर्शियों, और विद्वानों को शामिल किया जाना चाहिए जो कला और विज्ञान पर बात करने और ज्ञान देने के लिए संगठित होना चाहते हैं।

चौदहवाँ: संस्कृत की बुनियाद मजबूत करें, “संस्कृति” को सुदृढ़ बनाएं

जैसा कि पहले बताया जा चुका है, पुजारी और स्थानीय निवासियों ने स्वराज को बताया है कि वे मथुरा में प्राथमिक शिक्षा संस्थानों सहित बेहतर शैक्षणिक संस्थान देखना चाहते हैं। उनमें से अधिकतर लोग, विशेष रूप से पुजारी मानते हैं कि ब्रज का भविष्य उनके बच्चों के भविष्य पर निर्भर करता है। इक्कीसवीं सदी की शिक्षा के साथ, वे उन संस्थानों की उम्मीद करते हैं जो “पाश्चात्य मूल्यों और जीवन शैली के बजाय” बच्चों को भारतीय मूल्यों की शिक्षा प्रदान करते हैं। वे संस्कृत के प्रचार-प्रसार को भारतीय शिक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग मानते हैं, जो आने वाले समय में ब्रज की आत्मा को संरक्षित रखने के लिए बच्चों को एक कारण, विचारधारा और aesthet।cs प्रदान करेगा। जब बच्चों को उच्च शिक्षा, करियर और नौकरी के लिए मथुरा, या यूपी या भारत के बाहर जाना पड़ेगा तो वे परंपराओं, ब्रज भाषा और अमूर्त विरासत के अन्य तत्वों के अग्रदूत होंगे। हमें इस पर अहमत होने का कोई कारण नहीं दिखाई दे रहा है। शिक्षा की मौखिक परंपरा को संस्थागत बनाया जा सकता है और मौखिक परंपराओं का प्रलेखीकरण किया जा सकता है।

पंद्रहवाँ: नारी शक्ति को आमंत्रित करें और शामिल करें; ब्राज के भाव को सशक्त बनाने के लिए उनके विचारों और प्रतिभा का प्रयोग करें

तीर्थस्थल या पारंपरिक केंद्रों में महिलाओं को शामिल करने वाले अधिकांश उपक्रमों का लक्ष्य हस्तशिल्प होता है या सामुदायिक रसोई या हाट के लिए उनके शिल्प या खाना पकाने के कौशल का उपयोग करना होता है। यह बिल्कुल न्यायोचित बात है। लेकिन उत्तर प्रदेश के मथुरा में उसी कौशल क्षमता या उससे बड़ी कौशल क्षमता का उपयोग महिलाओं की भूमिका को विविधता दे सकता है। सबसे पहले, सुधार के लिए क्या किया जा सकता है इसके बारे में विभिन्न तीर्थ स्थलों, गांवों, मंदिर परिसरों, मंदिरों, कुंडों की ओर जाने वाली गलियों, कुंडों आदि पर उनके विचारों और दृष्टिकोण के बारे में जानकारी लें।

उनकी योगदान करने की इच्छा, उनके कौशल समूह, उनके पिछले जीवन का रिकार्ड बनाएं। विचारों को अलग-अलग रखें। जैसे ही सांस्कृतिक नीति से परिणाम प्राप्त होने लगें, महिलाओं को उनके घर पर ही काम देकर उनकी भागीदारी का उपयोग करें। उपक्रम की संरचना के अनुकूल पारिश्रमिक पर समूहों या व्यक्तिविशेष का शोषण किया जा सकता है। ब्रज की विधवाएं इसकी आध्यात्मिक आत्मा हैं। ब्रज के लिए उनकी भावनाएं ब्रज के कुंडों से भी गहरी हैं। वे हर साल विदेशियों के कैमरों में कैद होने भर की चीज नहीं हैं। उनके विचारों और कौशल क्षमता को जानें, उन्हें मंदिर में सेवा, ब्रज-भक्त रिश्तों, शैक्षिक संस्थानों, गोशाला और उनके प्रबंधन, परिक्रमा मार्गों, त्यौहारों और मेलों और दस्तावेजीकरण कार्यों आदि से संबंधित विभिन्न पहलुओं में शामिल करें।

सोलहवाँ: स्थानीय त्योहारों और मेलों को पुनः प्रचलित करें जो खो गए हैं और भुला दिए गए हैं

उत्तर प्रदेश और मथुरा में मेलों की भरमार है। इन मेलों और त्योहारों को, विशेषकर जिन्हें भुला दिया गया है, उनको पुनः प्रचलित करें । उनके सार्थक संगठन, सामुदायिक संरचना और दर्शकों पर विचार कीजिए। उनमें से कुछ पर्यटन से संबंधित गतिविधियों और राज्य पर्यटन मानचित्र से जोड़े जा सकते हैं। होली, गोवर्धन पूजा आदि जैसे बड़े त्योहारों से संबंधित समारोहों को त्योहारों के साथ न मिलाएं। जो भी इस बहुमूल्य पहलू को “साहित्यिक उत्सव” का सुझाव देता है, वह दक्षिण दिल्ली कला दीर्घाओं में ही नहीं बल्कि जीवनभर के लिए सांझी मेला या सांझी कला की झलक देखने का भी अधिकारी नहीं है।

मथुरा और ब्रज अलग-अलग ‘भाव’ हैं जिनके अलग अलग आध्यात्मिक उद्देश्य हैं। (सुमति महर्षि/स्वराज्य)

सत्रहवाँ: राग, रास, रासलीला, हरिदास

सौंदर्यशास्त्र और वर्णन के इन सभी पहलुओं को मथुरा में बहुत ही कम प्रतिनिधित्व मिला है। गोकुल, ब्रज, मथुरा और बृंदावन न केवल हमारी संगीत रचना (विशेष रूप से हिंदुस्तानी परंपरा में) में प्रचुर मात्रा में उल्लिखित हैं, बल्कि राग में भाव को एक सौंदर्यपूर्ण स्थिति भी प्रदान करते हैं। मथुरा ने रागों का वैसा उत्सव नहीं मनाया है, जैसी कल्पना कृष्ण भक्ति द्वारा प्रेरित महान संगीतकारों द्वारा की गई थी। फिर, भक्ति संगीत (इसकी कई अभिव्यक्तियों में) नई दिल्ली पार्क संगीत-गोष्ठियों और घमंडी आयोजकों की एक वस्तु बनकर रह गई है। इसका विकास मथुरा और ब्रज में होना चाहिए था। यह भक्तों के लिए था। यहां आमतौर पर रासलीला प्रस्तुत की जाती है। कथक नृत्य में पारंगत उमा शर्मा ने वृन्दावन में इसके लिए एक जगह सुनिश्चित करने की इच्छा व्यक्त की है लेकिन इसके लिए बड़े पैमाने पर दर्शकों की आवश्यकता है। कला प्रचार के लिए दिल्ली ही एक सांस्कृतिक स्थल नहीं है। मणिपुर, असम, उत्तर पूर्व के अन्य राज्यों से लेकर ओडिशा और दक्षिणी राज्यों तक बड़े पैमाने पर रास का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। यह सब मंदिरों की मदद के माध्यम से किया जाना चाहिए जो नए दर्शकों के संरक्षक बन सकते हैं।

अठारहवाँ: गौ, गोबर, गोशाला, गोवर्धन, गिरिराज

पांच ग (गकार) मथुरा और ब्रज को एक तीर्थस्थल के रूप में मूलतत्व और लोकाचार प्रदान करते हैं। इन पांचों की सुरक्षा और उचित रखरखाव किया जाना चाहिए। गौ और गोशाला की सुरक्षा और संरक्षण, गोबर से व्युत्पन्न ऊर्जा और वस्तुओं का एक अच्छी तरह से योजनाबद्ध और अत्यधिक निष्पादित संवर्धन और गोवर्धन तथा गिरिराज पर्वत की निःस्वार्थ सुरक्षा आदि बिंदु यहां के निवासियों और आगंतुकों के लिए एक समर्थ सामाजिक वातावरण सुनिश्चित करेगा। इस साल मार्च में आदित्यनाथ भव्य होली उत्सव का शुभारंभ करने के लिए बरसाना में थे जो दुनिया भर के लोगों को आकर्षित करता है। उन्होंने माताजी गौशाला का दौरा किया, जो आज 55,000 गायों का आश्रयस्थल है और एक गोबर गैस संयंत्र का उद्घाटन किया। मन मंदिर गुरुकुल से श्री राधा कांत शास्त्री ने स्वराज्य को बताया, “हम क्षेत्र में गायों की रक्षा करके वह काम कर रहे हैं जो सरकार को करना चाहिए। कई जानवर पड़ोसी राज्यों से आते हैं और उनमें से ज्यादातर गायें हैं जिनकी हत्या होने की नौबत आ गई थी। हम उनके चारा-दाना की व्यवस्था करते हैं और सरकार से कोई मदद नहीं मिलती है। हमारे पास युवा पुरुष हैं जो स्वयंसेवकों के रूप में हमारी मदद कर रहे हैं। हमारे पास समूह हैं जो ऐसी घटनाओं के प्रति सतर्क हैं। हम गायों का दूध नहीं निकालते हैं।”

यदि अपशिष्ट से पैसे कमाने का प्रस्ताव किया जाए तो ब्रज (और मथुरा) ऊर्जा क्रांति का एक वास्तविक प्रतीकात्मक गढ़ बन सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018-2019 के बजट में गोबर धन योजना शुरू होने की घोषणा की। गोबर, जिसका अर्थ है खाद, इसका अर्थ और उद्देश्य तब सिद्ध हो गया जब इसे पशुधन और कृषि उपज में सुधार करने के उत्प्रेरक के रूप में घोषित किया गया था। यहां पर इसे बायो कार्बनिक उत्प्रेरक कहा गया। इस योजना का उद्देश्य किसानों से मवेशी और ठोस अपशिष्ट इकट्ठा करना और इस तरह के अपशिष्ट को खाद, बायोगैस और ऊर्जा के अन्य रूपों का उत्पादन करने के लिए इसे बेचना है। क्षेत्र और आसपास के गांवों में काफी मात्रा में गोबर मौजूद है। इतना ही नहीं, इसमें घर और हस्तशिल्प उत्पादों, स्थापत्य, अतिथि सत्कार और ऐसे क्षेत्रों के लिए परिवर्तनकारी कच्ची सामग्री होने की संभावना है जहां इसकी मांग पहले से ही है और सीमित पैमाने पर इसे उपयोग में भी लाया जा रहा है। ब्रज को एक विकसित उद्योग का केंद्र क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए जिसका लक्ष्य आने वाले सालों में शहरी और ग्रामीण जीवन में प्रवेश करना है? चारों दिशाओं में कई कृषि केंद्रों तक कई फास्ट लेन और एक्सप्रेसवे बनाए जाने की उम्मीद है जो इस योजना को गति दे सकते हैं।

अब बात आती है गिरिराज की जो गोवर्धन की आत्मा है और एक समृद्ध मंदिर परिसर की चट्टान है। यह इस परिसर का केंद्र है और स्थिर चिह्न है। यह वास्तविक भक्ति का एक बिंदु है। अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ इसका इतना अच्छा संरक्षण करें कि देवलोक से इंद्र भी इसे देखने आएं।

उन्नीसवाँ: मथुरा के बुद्धिजीवियों और प्रतिनिधियों की पहचान करें

यह मथुरा के स्वरूप के बारे में है। केवल वे बुद्धिजीवी मथुरा की धार्मिक आत्मा को वास्तविक अर्थ में पुनर्स्थापित कर सकते हैं, जो कृष्ण भक्ति, भाव, कुंड और लीला से प्रेरित हैं। ऐसे कम ही लोग हो सकते हैं। यह संख्या उससे भी कम हो सकती है जिन्हें आप गिन सकते हैं। चलो कोई बात नहीं। वे लोग कम लोकप्रिय हो सकते हैं-शायद लोकप्रिय न भी हों। उनके ट्विटर अकाउंट नहीं हो सकते हैं। और भी बेहतर बात है। उदार बनिए। मणिपुर और बंगाल की ओर देखिए। केरल और तमिलनाडु की ओर देखिए। गुजरात और राजस्थान की ओर देखिए। इन राज्यों के बीच भी हो सकते हैं। जौनसार, तिरुपति, सबरीमाला, मायापुरी की ओर देखिए। कौशल में देखिए। लेकिन मथुरा को संरक्षित करने के लिए सबसे पहले मथुरा में ही उनकी तलाश कीजिए।

‘भक्त’ परंपरा, श्रद्धा, परिवार, कथाओं और ‘प्रसाद’ को फिर से अपना रहे हैं। (सुमति महर्षि/स्वराज्य)

बीसवाँ: ब्रज भक्तों के लिए मुफ्त है; पर्यटन पर धन खर्च होता है

प्रतिबंध सांस्कृतिक गौरव, विशिष्टता और विविधता का एक तरीका है। सुनने में यह बात थोड़ी उलझाने वाली है, चलिए एक पल के लिए मथुरा के मामले में तीर्थयात्रा के एक स्वरूप, पर्यटन पर विचार करें। इस परिदृश्य में, भक्तगण पर्यटन और राज्य वित्त में योगदान दे रहे हैं, और वे किसी भी अवसर पर और हर मामले में ऐसा करते रहेंगे। वे सबसे पहले मंदिरों की यात्रा करते हैं। मंदिर धार्मिक सांस्कृतिक आंदोलन के मुख्य केंद्र हैं। भक्त’ परंपरा, श्रद्धा, परिवार, कथाओं और ‘प्रसाद’ को फिर से अपना रहे हैं।

अब लट्ठमार होली को शूट करने के लिए बड़े-बड़े कैमरों को साथ लिए पर्यटकों की संख्या पर विचार करें। मंदिरों में दिव्य और भव्य समारोहों- होली, जन्माष्टमी, गोपाष्टमी जैसे अवसरों के दौरान भी, जब अधिक लोग इकट्ठे होते हैं, की तस्वीरों की भी कीमत होनी चाहिए।

इक्कीसवाँ: मंदिरों से मंदिरों के बीच आवागमन दुरूस्त किया जाए

विशेष शहरों या धार्मिक स्थलों में मंदिरों, कुंडों और आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक महत्व वाले अन्य स्थलों की मरम्मत, स्थापना और उनके प्रचार में एक सांस्कृतिक परिपथ के बीच सक्रिय भागीदारी के लिए संस्कृति विभाग की स्थापना की जाए। अन्य चीजों के साथ यह निम्नलिखित को भी स्थापित करेगा – मंदिरों के बीच तीर्थयात्रियों और यात्राओं के आवागमन में पैटर्न, गति और प्रवाह। यह लोगों को मंदिरों से संबंधित आध्यात्मिक पहलुओं पर शिक्षित करेगा और उनकी खोज को एक लय देगा। यमुना के पालने में मनसगंगा क्या है? राधा और कृष्ण ने एक कुंड कैसे बनाना, इससे जुड़ी कथाओं के बारे में जानने के लिए किसी को कहाँ जाना चाहिए? गोवर्धन (परिक्रमा नहीं) की यात्रा किस मंदिर से शुरू होनी चाहिए? गोवर्धन में कृष्णा की सभी चीजों में से गौवध पर चर्चा क्यों की जानी चाहिए? एकबार आपका जवाब मिल जाने पर आपको कहाँ पर ठहरना चाहिए? यह बाहरी रूप से भी किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए।

बाईसवाँ: बृज को कृष्ण पर केन्द्रित परंपरागत दृश्य कला के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक केंद्र के रूप में स्थापित किया जाए

संग्रहालय पर विचार करें। मथुरा से उन सभी मंदिरों और स्थलों पर एक मानसिक पदयात्रा (यदि वास्तविक नहीं है) पर जाएं जहाँ की मूर्तियाँ और चित्रकलाएं लीलाओं और महाभारत का बखान करती हैं – उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक। मथुरा में उनकी छवियों और बहु-आयामी संस्करणों को लाया जाए। कला और वास्तुकला के स्कूलों से नाता जोड़ा जाए। खंडों का परिचय दिया जाए और कला का उत्सव मनाया जाए। कृष्ण की विरासत को कृष्ण और उनकी मथुरा के लिए वापस लाया जाए। भारतीय संग्रहालयों से कला को देखने के लिए शहर को केन्द्र के रूप में स्थापित किया जाए। कला के विभिन्न विद्यालयों में प्रचलित कृष्ण की लीलाओं और कलाओं के कार्यों को मथुरा में लाया जाए, इसकी एक शाखा राजस्थान और कुरूक्षेत्र में स्थापित की जाए लेकिन बृज में इसका बड़ा भाग स्थापित किया जाए। सांझी और अन्य स्थानीय अभिव्यक्तियों को भी बढ़ावा दिया जाए। मथुरा को अन्य सांस्कृतिक केन्द्रों की तरह कलाकृतियों, वस्तुओं और संग्रहालयों का घर बनने दिया जाए।

तेईसवाँ: ग्रामीण जीवन को सुरक्षित और संरक्षित रखें

नंदगांव और बरसाना के बीच बालाएं अभी भी कुएं के पास मिट्टी तथा स्टील के पात्र में  मीठा पानी भरकर अपने साथ ले जाती हैं, हालांकि अब कुछ के पास मोबाइल फोन होता है। सांस्कृतिक पहलुओं में किसी भी दो गांव के लोगों के बीच प्रतिस्पर्धी भावना से पता चलता है कि कृष्ण का वह भोलापन अब ग्रामीणों के अंदर मौजूद नहीं है।

चौबीसवाँ: रात्रिउत्सव को पुर्नजीवित करें

ब्रज और मथुरा का जीवन – शरद पूर्णिमा की पूरी चमक में चमकता चाँद और टिमटिमाते सितारों की रोशनी – के बीच शुरू होता है, जब सच्चे भक्तों के  सामने रासलीला का प्रोग्राम शुरू होता है। कृष्णा, राधा को उनके अनंत प्रेम और रास को समर्पित कुछ प्राचीन संगीतकारों और कवियों-रचनाकारों के सबसे महान कार्यों में से किसका उपयोग जाता है, यदि वे ब्रज में रात के दौरान न मनाए जाएं? ब्रज बिना किसी दूसरी सोच के रातोंरात शास्त्रीय संगीत त्योहारों की राजधानी बनना चाहिए। अंधेरे में रास का उत्सव कहाँ है? साल भर तेल से भरे दीपकों की चमक में मनाया जाने वाला मंदिरों का पारंपरिक उत्सव कहां है? अंधेरे की वह शांति कहां है जो लाखों लोगों को ब्रज की तरफ आकर्षित करती थी? गोवर्धन की गहरी अंधेरी छाया चन्द्रमा के लिए गाए जाने वाले रात्रि राग गीत कहां हैं? कृष्ण के साथ इंद्र के संघर्ष की लीला के लिए गाए गए मल्हार का उत्सव कहां है? संक्षेप में, सरकार को ब्रज क्षेत्र में सांस्कृतिक नाईट लाइफ विकसित करने के लिए आगे आना चाहिए। यह मंदिर जीवन का एक अद्भुत विस्तार है और इसकी सतत जरूरत है — न कि मात्र छिटपुट अभिव्यक्ति की।

पच्चीसवाँ-भातखंडे को ब्रज में स्थापित कीजिए

अगर मथुरा को हिंदुस्तानी संगीत, शास्त्रीय संगीत और संबंधित रूपों के एक शैक्षिक आधार के रूप में पुनर्स्थापित किया जाता है तो यह न केवल छात्रों को बल्कि समझदार दर्शकों और अन्य आधारों के लिए भी लाभदायी होगा। मैलप्पुर की तरह ब्रज का भी एक हिस्सा  महान लोगों का घर बन सकता है। इसके अलावा, मथुरा भातखण्डे संगीत संस्थान के प्रकरण के रूप में अच्छा प्रदर्शन करेगा, जो वर्तमान में लखनऊ में स्थित है। अगर शहर में फैली हुई आबादी के लिए जगह है, तो इसमें निश्चित रूप से शास्त्रीय कला सीखने के लिए एक केंद्र की स्थापना की जा सकती है। हिंदुस्तानी संगीत के मूल को लाना और दिलों में क्लासिकल म्यूजिक का प्यार जगाने से मथुरा और ब्रज क्षेत्र का विकास शिक्षा और कला के प्रदर्शन केंद्र के रूप में होगा।

छब्बीसवाँ- उत्तर प्रदेश में मथुरा को हिंदू संस्कृति की परिभाषा के रूप में स्थापित करें

अगर अयोध्या-काशी-मथुरा-प्रयागराज चतुर्भुज है, तो उपरोक्त विचारों या नीचे दिए गए विचारों पर प्रकाश डालने के बाद मथुरा को परिभाषित करें। अब इस लोकप्रियता को बड़े स्तर- सम्पूर्ण दुनिया के सामने आने दें। भक्त परंपराओं, श्रद्धा, परिवार, पुरानी कथाओं और प्रसाद को पुनः प्रचलित कर रहे हैं।

ब्रज के कुंड इसे शांति, स्थिरता और लीला प्रदान करते हैं। (सुमति महर्षि/स्वराज्य)

जल

तीर्थशालाओं और मंदिरों के बीच में, यमुना देवता और भक्त के बीच की प्राथना के बहाव को पूरा करती है। मथुरा और ब्रज में, सरकारी प्राथमिकता के मामलों में यह मथुरा और ब्रज के ही रहने चाहिए। सांस्कृतिक संवेदनशीलता और उसके मतलब, जो तुरंत बदल जाते हैं जब यमुना किसी दूसरी विरासत या पर्यटक स्थल के लिए बढ़ती है, कृष्ण की यमुना को आगे नहीं बढ़ाना चाहिये या दबाव नहीं डालना चाहिए। वहां, यह अपनी शांति, प्रवाह, और भाव वापस पाने के लायक है। बहाव ऐसा होना चाहिए कि कृष्ण की यमुना ने समय की बांसुरी और उसके भक्तों को वापस प्राप्त कर लिया हो।

कुंड: कुछ ने शानदार सफलता और पुनर्जीवन को देखा है। दूसरी तरफ, राधा और कृष्ण कुंड उदाहरण हैं कि कैसे आस्था और स्वच्छता स्थल को आध्यात्मिकता से अलग बना सकते हैं। इसका रहस्य- गति को जारी रखने के लिए उन लोगों को बहाली और फिर से उद्धार कार्य के लिए चारों ओर रखने में है, जो परिवर्तन करने में सक्षम हैं और काम जारी रखने के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाते हैं। जल शांति, स्थिरता, प्रवाह, और निरंतरता लाता है।

सत्ताईसवाँ: मन्दिर बोर्ड के अंतर्गत आने वाले कुंड अच्छी संभावना हो सकते हैं

हालांकि, यह परियोजनाओं के लिए विचारों के संघर्ष और टकराव का कारण नहीं बनना चाहिए। गैर-सरकारी संगठन की ओर से कुंडों पर किया गया बहाली का काम बदलाव लाया है। ब्रज फाउंडेशन के बहाली अभिलेखागार में पहले और बाद की तस्वीरें देखने में परेशानी होती है। इन तस्वीरों में, हिंदू मध्यम वर्ग की प्रशंसा और अब दशकों तक कठोर सरकारी उदासीनता महसूस की जा सकती है जो पूर्व पत्रकार और कुछ कुंडों की बहाली के पीछे व्यक्ति, विनीत नारायण के लाभदायक जिद्दीपन के कारण प्रशंसनीय काम संभव है।

क्ष्रेय वहां दिया जाना चाहिए जहाँ ब्रज को बेहतर बनाने ले लिए ब्रजवासिओं के उचित और भावुक अनुरोध को सुना जाए। सौंदर्यशास्त्र कोई व्यवसाय नहीं है।

अठाईसवाँ: यमुना को ज्ञानस्थल के रूप में सोचें, न कि क्रीडास्थल के रूप में हालांकि यमुना पर पर्यटन और पर्यटन से संबंधित गतिविधियों का प्रचार उन लोगों के लिए फायदेमंद होगा जिससे उनकी आजीविका चलती है, सरकार को यमुना को बुद्दिजीवियों के लिए मिलने की जगह के रूप में, प्राचीन ग्रंथों, स्थानीय बोलियों और परंपराओं के अध्ययन की जगह स्थापित करने के बारे में सोचना चाहिए। यह समुदायों को मंदिरों की एक नई परंपरा के साथ आध्यात्मिक संबंध प्रदान करेगा

उन्तीसवाँ: यमुना तक भागवत और मंत्र लायें

यह मंदिर के प्रतिनिधित्व के माध्यम से किया जा सकता है। पूजा सामग्री मंदिरों में रखी जा सकती है। न मंत्र यमुना के प्रवाह को बाधित नहीं करेंगे और न ही प्राचीन ग्रंथों का वर्णन। बीटीवीपी के माध्यम से, मथुरा और ब्रज मंदिरों को यमुना के किनारों पर मंत्रोच्चारण, व्याख्यान, कथाओं का प्रतिनिधित्व करने दें। यहां पर सरकार मामलों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए “विनियमन” औऱ “अनुशासन” लागू कर सकती है। इससे मंदिर पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार होगा। इससे हर पीढ़ी के ब्रजवासियों और नदी के बीच संबंध स्थापित होगा। यह सब मंदिरों के अनुष्ठानों को बरकरार रखने वाला साबित होगा। और वह सेवा और मंदिर जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र को समृद्ध रखेगा।

व्योम

सरकार के लिए न्यायालय के आदेश का पालन करना अनिवार्य हो सकता है। इसके लिए मंदिरों, सेवायतों और भक्तों के बीच एक आसान तालमेल के लिए संचार व्यवस्था एक तरीका है। इस साल जून में, एनजीटी ने अपने आदेश में कहा: “अधिकारी, जो गोवर्धन से लेकर राज्य की राजधानी में प्रधान सचिवों की सुरक्षा के लिए तैनात थे, को अदालत के समक्ष पेश किया था और उनमें से प्रत्येक आदेश के अनुपालन के लिए बहुत सकारात्मक और आशावादी था। लेकिन बाद में कोई परिणाम नहीं आया।” इसे ठीक करें।

तीसवाँ- संतुलन के लिए ‘स्थानीयता’ बल दें

श्रद्धा का प्रदर्शन भ्रामक हो सकता है, और एक तीर्थस्थल शहर के आदर्श को बहाल करने के लिए सौन्दर्ययुक्त श्रद्धा आवश्यक है। पुनर्जागृत हिन्दू एक प्रतिभाशाली जनसमूह हैं और सांस्कृतिक पुनरुद्धार उनका मुख्य मुद्दा है। निगरानी मददगार हो सकती है। गोवर्धन का भाव इंगित करता है कि चुनाव से संबंधित कोई भी व्यक्ति ब्रज के उद्देश्य के लिए गंभीर नहीं माना जाता है। मंदिरों और ब्रज की महिमा बहाल करने की हर कोशिश को भाग्यवादी होकर पांच साल की कहानी में क्यों फंसना पड़ता है? आदित्यनाथ को इसका जवाब देने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

इकतीसवाँ- स्थानीय लोगों के साथ संचार में सुधार

उन लोगों पर नजर रखें जो मुख्यमंत्री से दूर हैं या उनसे कटे हुए महसूस करते हैं।

बत्तीसवाँ- स्थानीय लोगों का विकासपरिभाषित करें

2015 और 2018 के एनजीटी आदेश में स्पष्ट रूप से उन क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है जिन्हें गोवर्धन और गिरिराज-जी परिक्रमा मार्ग के रखरखाव और विकास के लिए अपनाए जा सकते हैं। लोगों के बीच धारणा है कि विनाश सहित सभी परिणामी परिवर्तन सरकार- “योगी जी”- के कारण होते हैं। इन पहलुओं पर बेहतर बातचीत बेहतर समझ में मदद करेगी।

तैंतीसवाँ- मंदिर नियंत्रण मामले पर भूमिका को स्वयं व्यक्त होने दें

आदित्यनाथ की विशिष्टता उनकी विविधता में निहित है। अयोध्या, प्रयागराज, काशी और मथुरा- सभी चारों को उनके सभी अवतारों- पुरुष, महन्त, भगवा भाजपा नेता और यूपी के मुख्यमंत्री-की आवश्यकता है। उन्हें वह आदेश चुनना चाहिए जो वे चाहते हैं या वे इसमें फेरबदल करें। मथुरा और ब्रज केंद्रबिंदु हैं। तब उनके लिए इसे परिभाषित करने के लिए यह एक अच्छा विचार नहीं होगा?

इस साल, एक बुद्धिमान योजनाकार के रूप में उनके राज्य के लिए सांस्कृतिक और व्यावसायिक पहुंच के प्रति उनकी प्रतिक्रिया से उनकी छवि औपचारिक रूप से धूमिल हो गई है। अगर आदित्यनाथ मंदिर बोर्ड संपत्ति को कम करते हैं तो उन्हें अपनी कृष्णनीति प्रकट नहीं करनी चाहिए।

चौंतीसवाँ- पुनर्यात्रा, भ्रमण, परिक्रमा करें

अपने आप को मंच और पंडाल उत्सवों तक ही सीमित न रखें। ब्रज के लिए, लखनऊ के लिए, लोगों के साथ परिक्रमा करें। यह भारत भर में भ्रमण के लिए लोगों को मजबूती प्रदान करेगा।

मारुत

पैंतीसवाँ – कृष्ण के विस्तारित परिवार को विस्तृत किया जाए

कृष्ण के परिवार के लोग, जैसे कि राम, बाधाओं को समाप्त करने और उन सीमाओं के टूटने का इंतजार कर रहे हैं जो उन्हें क्षेत्रों में बाँटती हैं। रंगोत्सव में बरसाना में जिसका खुलासा हुआ था, इस साल होली का उत्सव मनाने के लिए आदित्यनाथ की सांस्कृतिक पहल – मणिपुर, असाम, हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के सांस्कृतिक कलाकार बृज के लिए अपनी पेशकश लेकर आए थे। आदित्यनाथ का विचार एक बड़ी सफलता थी। रंगोत्सव पर विविधता के भव्य प्रदर्शन ने एक अवधारणा की विशिष्टता के लिए एक बड़ा दायरा छोड़ा। लट्ठमार होली, जिसको हर जगह पसंद किया जाता है, पर नया ध्यान केन्द्रित किया गया। योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में मथुरा में अपनी सांस्कृतिक सिकुड़न को दूर करने की शक्ति है। इसको एक तेज दृष्टिकोण और विस्तार की जरूरत है। यमुनोत्री के घर और खुद यमुना के बिंदु – उत्तराखंड को शामिल करने की प्रतीक्षा की जा रही है। इस बार जातिपुत्र के किसान और अन्य 84 कोस पर कृष्णाट्टम देख सकते हैं या मधुरष्टकम सुन सकते हैं।

भक्ति का मार्गः आध्यात्मिक यात्रा पर परिक्रमा के दौरान पत्थर ले जाता एक साधु (सुमति महर्षि/स्वराज्य)

छत्तीसवाँ –  मृदु शक्ति के एक पहलू के रूप में जातीय विविधता और आध्यात्मिकता का उत्सव मनाया जाए

इसको ऐसे उपायों के तहत किया जाए कि धर्म या जातीय भावनाओं के दुरूपयोग के लिए कोई स्थान न रह जाए, यह न केवल क्षेत्र के लिए बल्कि तीर्थस्थलों की प्रतिष्ठा के लिए भी अच्छा होगा। मार्च के बाद, मंदिर अधिग्रहण की चिंताओं की पृष्ठभूमि में सवर्ण जाति के मुद्दों पर जो राजनीतिक हवाएं उत्पन्न हो गईं थीं वे सार्वजनिक चेतना का नाश करने में सक्षम थीं। धर्मक्षेत्र पर कोई भी कामचलाऊ आघात रणक्षेत्र में एक बुरी जातीय राजनीति उत्पन्न करेगी। धर्मक्षेत्रीय और धार्मिक सैनिकों को यह समझ लेना चाहिए और मान भी लेना चाहिए कि वे सभी जातियों के होते हैं।

गोरखपुर के महंत आदित्यनाथ को राज्य के मुख्यमंत्री और बीटीवीपी के अध्यक्ष के संपर्क में रहना चाहिए। हजारों साल पहले अपनी भूमि को एक सफल और मृदु शक्ति में बदलने के लिए कृष्ण अपनी नियमावली और दिशा-निर्देशिका छोड़ गए थे। आदित्यनाथ को इसे चुनना चाहिए – इससे पहले कि गैर-धार्मिक ऐसा करें और गड़बड़ी पैदा करें।

यह है लोकप्रसिद्ध “छत्तीस” – 36.

परिक्रमा वाले पथ पर, एक युवा साधु किशनदास 108 दंडवत परिक्रमा कर रहे हैं। धरती से वह पहले अपनी नाक उठाते हैं फिर पेट को और फिर खुद को। वह कहते हैं कि “यहाँ तक कि कृष्ण भी बृज नहीं छोड़ना चाहते थे। उनकी बड़ी यात्रा यहीं से शुरू हुई थी।” भावनाएं सर्वोपरि हैं। यदि आदित्यनाथ लोगों की इच्छाओं के साथ ताल से ताल मिलाने में, ब्रज के सभी समुदायों का कल्याण सुनिश्चित करने में और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों पर सक्रिय होते हुए (और फिर अयोध्या, प्रयागराज और काशी पर), वर्तमान में अन्य राज्य सरकारों द्वारा अपनाये जाने वाले एक ही लाठी से सबको हांकने वाले हथकंडे को बाहर का रास्ता दिखा सकने में सक्षम हैं, तो यह उन्हें भले ही अजेय न बनाये लेकिन न्यायपूर्ण बना देगा। उत्तर प्रदेश में कई मोर्चों पर विकास के लिए अपने सपने में बेरोक, वह भारत में भगवाधारी राजनीतिक सान (किसी धातु में धार लगाने वाला पत्थर) बन जाएंगे। इससे घर्षण और ऊष्मा उत्पन्न होगी।

लेकिन फिर, गोवर्धन और कृष्ण रक्षा करते हैं, यहां तक कि इंद्र के क्रोध से भी।

यह लेख इंडिक हेरिटेज पर स्वराज्य की श्रृंखला का हिस्सा है। अगर आपको यह लेख पसंद आया हो और आप चाहते हैं कि हम ऐसे और लेख लिखें तो हमारे प्रायोजक बनने पर विचार करें – आप 2999 रुपये तक का सूक्ष्म अनुदान दे सकते हैं।

सुमति महर्षि स्वराज्य के वरिष्ठ संपादक हैं।