पत्रिका
क्यों विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए

जैसा कि हमने ‘ग्लैडिएटर’ जैसी फिल्मों में देखा है कि प्राचीन रोम में आदमियों को खूंखार जानवरों से लड़वाया जाता था, उसमें और भी कई तरह के खेल होते थे जैसे कि तलवार-बाजी और दूसरे खूनी खेल, जिसका फैसला किसी एक लड़ाके की मौत से होता था। उस समय के लोगों को भी ऐसे खेल काफी रोमांचित करते थे, चाहे वह कितने ही क्रूरतापूर्ण और निर्दयी हों। इन खेलों को महत्त्व देने का कारण था मनुष्य के अंदर के ज़िंदा रहने के मूल गुणों को दर्शाना, मगर इसके पीछे वीरता, पराक्रम और सम्मान जैसी भावनाएँ छुपी हुई थी।

इसके ही अनुरूप आज के समय में छात्र संघ चुनावों के नाम पर वैसा ही खेल खेला जा रहा है। जैसे कि अभी एक चुनाव सितंबर के महीने में पूरा हुआ, उसमें भी क्रूरता और निर्दयता साफ़ झलक रही थी। यह तो अच्छी बात है कि इसमें किसी को भी अपनी जान गँवानी नहीं पड़ी। छात्र संघ चुनावों के पीछे तर्क दिया जाता है कि इससे लोकतंत्र मज़बूत होगा, इसमें आम लोगों की भागीदारी बढ़ेगी, मगर इन सब के पीछे राजनीतिक पार्टियाँ छात्रों के जीवन की कीमत पर अपनी गंदे राजनीतिक युद्ध को जारी रखना चाहती हैं और अपने लिए मोहरों को भर्ती करना चाहती हैं।

हर साल इस तरह के तमाशे हमें भारत के किसी न किसी विश्वविद्यालय में देखने को मिल ही जाते हैं। इन सब में दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ (डीयूएसयू) और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्र संघ (जेएनयूएसयू) के चुनाव सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित करने वाले होते हैं। शोर-शराबा तो तब और भी बढ़ जाता है जब कहीं पर वामपंथी दलों के छात्र संघ की जीत होती है, जैसा कि इस साल पंजाब विश्वविद्यालय के चुनावों में देखने को मिला।

इस साल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छात्र संघ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यक्ष पद के चुनाव में जीत मिली, वहीं वामपंथी दलों के साथ चुनाव लड़ रहे, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन, स्टूडेंट्स फ्रेडरेशन ऑफ़ इंडिया, डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फ्रेडरेशन ऑफ़ इंडिया और आल इंडिया स्टूडेंट्स फ्रेडरेशन ने जेएनयूएसयू  के चुनावों में जीत हासिल की। इन चुनावों में पैसो को लेकर लग रहे आरोप अब बहुत बढ़ते जा रहे हैं। 2000 के दशक के प्रारंभ में ही नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया के एक उमीदवार पर डीयूएसयू के अध्यक्ष बनने के लिए चुनाव में एक करोड़ से ज्यादा पैसा खर्च करने का आरोप लगा था।

अभी हाल में ही डीयूएसयू के अध्यक्ष अंकिव बैसोया को एबीवीपी ने उसके नकली डिग्री होने के आरोप के कारण पद से हटा दिया। फिर कुछ कन्हैया कुमार जैसे लोग भी हैं जो अपनी स्नातक डिग्री को आगे टालते रहते हैं और छात्रावास की सुविधाओं का लाभ उठाते रहते हैं ताकि वे छात्र चुनावों में भाग ले सकें। इन चुनावों के विजेताओं का स्वागत-सत्कार किया जाता है और यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत होती है। इसलिए लोग इसमें जल्दी से आगे बढ़ने और इस गंदी राजनीति में अपना कौशल दिखाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। लेकिन बाकी के समाज के लोग जो इन चुनावों की खबरों को पढ़ते हैं, उनके लिए सवाल यह है कि “यह सब क्यों और किसके लिए?”

चलिए एक बार अब डीयूएसयू के चुनाव के समय के एबीवीपी के घोषणा-पत्रों को देखते हैं, उसमें लिखा है कि “छात्राओं के आत्म-विश्वास को बढ़ाने के लिए हम लोग हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में आत्म-रक्षा प्रशिक्षण केंद्र लगवाएँगे।”, “हम लोग कोशिश करेंगे कि हर छात्रावास और कॉलेज के सामने पुलिस चौकी की व्यवस्था हो और हर चौकी में महिला पुलिस भी उपस्थित रहे।” कुछ और भी मुद्दे जैसे कि “कॉलेज शुल्क को तर्कसंगत करना, छात्रावास की सुविधाओं को बेहतर बनाना, प्रवेश प्रक्रिया को सुधारना, सभी कॉलजों को डीयूएसयू से जोड़ना, लिंग-भेद को समाप्त करना आदि।” क्या इन मुद्दों पर ध्यान देने के लिये थका देने वाली और ध्रुवीकरण की राजनीति की ज़रूरत है? क्या इन मुद्दों को सही करना चुने गए छात्र नेता की जिम्मेदारियों के अंदर आता है?

दूसरे छात्र संगठनों के घोषणा पत्रों में भी यही मुद्दे विशेष रूप से दिखते हैं। अगर हम इनके द्वारा की गई रैलियों में दिए गए भाषणों को याद करें तो पाएँगे कि इनके भाषणों में गुरमीत राम रहीम से लेकर रोहिंग्या और तीन तलाक से लेकर वन-रैंक-वन-पेंशन जैसे मुद्दे भी शामिल होते हैं। अब ये तो भगवान ही जाने कि ये अपने कॉलेज परिसर को कैसे बेहतर बनाएँगे।

हमारे यहाँ की मीडिया भी इन खबरों का ऐसे प्रसारण करती है जैसे कि इनका सीधा संबंध राष्ट्रीय चुनावों से हो। जेएनयूएसयू के चुनावों में वामपंथी दल के छात्र संघ के प्रदर्शन को देख कर बहुत से वामपंथी दल से सहानुभूति रखनेवाले अखबार जैसे कि द हिन्दू, उनकी जय-जयकार करने लगे।

छात्र संघ चुनावों की अच्छाइयाँ बहुत ही कम है, जैसे “इससे छात्रों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ज्ञान होता है” आदि, अब इसके बुरे परिणामों के बारे में जानते है।

पहला, यह राजनीति में रचनात्मक सोच को खत्म कर देती है और जो लोग राजनीति और समाज के बारे में सोचते हैं उनको अलग-थलग कर दिया जाता है। राजनीति के कारण छात्रों के मन में एक विचारधारा जीवन भर के लिये समा जाती है और वे चाहकर भी उससे बाहर नहीं आ पाते। एक कॉलेज परिसर छात्रों में मूल सोच को बढ़ावा देता है और समाज की समस्याओं को सुलझाने के लिये नए-नए समाधान ढूँढने को प्रेरित करता है। मगर यहाँ ठीक इसका उल्टा हो रहा है। यहाँ छात्रों को ब्रेनवॉश करके उनके दिमाग में एक विचारधारा डाल दी जाती है और जब उन्हें इसका ज्ञान होता है तब वो चाह कर भी इस विचारधारा को अपने मन से निकाल नहीं पाते हैं।

दूसरा,  विचारधारा से बढ़कर यह छात्रों के आपसी रिश्तों पर असर डालता है, उनके बीच मतभेद पैदा करता है। यह राजनीति जोड़ने से अधिक तोड़ने पर ध्यान देती है। ये जातिवादी और धर्म आदि भेद-भाव के बारे में छात्रों को सोचने पर मजबूर कर देती है। इस गंदी राजनीति के गुंडागर्दी और पैसों की चमक के कारण कितनी ही दोस्ती बर्बाद हो जाती है। जो छात्र ऐसे समाज से आते हैं जहाँ पहले से ही काफी भेद-भाव है, जैसे कि बिहार, ये उनकी धारणाओं को और भी मज़बूत कर देती है, जिनसे वो बाहर आना चाहते थे।

तीसरा, कॉलेज जीवन में हमारा सबसे ज्यादा ध्यान हमारी शिक्षा और दूसरे रचनात्मक कार्यों और थोड़ी बहुत मस्ती पर होना चाहिए, मगर लगातार राजनीतिक दंगो, धारणाओं और दूसरे मामलों में फँस कर अपना ध्यान पढ़ाई पर नहीं दे पाते हैं और इससे हमारी शिक्षा प्रभावित होती है।आने वाले कुछ दशकों के बाद केवल सबसे कुशल उमीदवारों को ही नौकरी मिल पाएगी, और सच्चाई तो यह है कि इस मामले में चीन हमसे काफी आगे है।

चौथा, छात्रसंघ चुनाव, राजनीति पार्टियों के लिए मात्र एक प्रक्रिया है जिससे वे अपने लिए मोहरों को चुनते हैं। इन पार्टियों के छोटे नेता इसमे अहम भूमिका निभाते हैं, वे छात्रों को लगातार उकसाते और अपने साथ आने के लिए मनाते रहते हैं। ये लोग चुनाव प्रचार-प्रसार को देखते हैं और चुनाव पूरा करने की ज़िम्मेदारी भी इन्हीं की होती है। इनके लिए छात्र बस एक भीड़ भर है जो इन्हें बड़े नेताओं की रैलियों के लिए चाहिए होती है।

पाँचवा, अध्यापक और कॉलेज प्रशासन भी केवल मूक दर्शक नहीं होते। ये लोग जिस विचाधारा से जुड़े होते हैं, वही छात्रों के मन में भी डालते रहते हैं। वे छात्रों का मन इन विचारधाराओं से भर देते हैं। ये सब करके छात्रों को इन चुनावों में भाग लेने के लिए प्रतिबद्ध कर दिया जाता है और उन्हें राजनीति में अनुसंधान करने के लिए भी प्रेरित किया जाता है। छात्र संघ चुनावों से ही शिक्षा व्यवस्था के राजनीतिकरण की शुरुआत हो गई थी।

छठा, आधारभूत सुविधाओं, लड़कियों की सुरक्षा, लव जिहाद, छात्रावास शुल्क आदि समस्याओं के लिए किसी राजनीतिक प्रक्रिया की ज़रूरत नहीं है। ये सब आमतौर पर कॉलेज के डीन या कॉलेज प्रशासन के द्वारा भी सुलझाई जा सकती हैं। आज कॉलेजों में ऐसी व्यवस्था होती है जिससे कि छात्र अपनी असुविधाओं को सीधे कॉलेज प्रशासन तक पहुँचा सकता है।

सातवाँ, छात्र राजनीति किसी भी रूप से आम राजनीति के लिये महत्त्वपूर्ण नहीं है। कुछ मामलों में हमें देखने को मिलता है कि कुछ बड़े नेता जैसे कि अरुण जेटली, अजय माकन, सीताराम येचुरी आदि छात्र राजनीति की ही देन हैं लेकिन भारत का कोई भी प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी भी, छात्र राजनीति से नहीं आए हैं।

तमिल नाडु के कॉलेजों में जेएनयू या डीयू जैसे छात्र संघ नहीं होते। वहाँ विद्यार्थी जीवन सुखद और स्वस्थ है। वहाँ छात्रों की समस्याओं को प्रशासन सुलझाता है। वहाँ के छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद राजनीति में हिस्सा लेते हैं और अच्छा प्रदर्शन भी करते हैं।

इस बीमारी जैसी फैलती हुई छात्र राजनीति को रोकने के लिए सभी बड़े राजनीतिक दलों को एक साथ मिलकर इस पर प्रतिबंध लगाने के बारे में फैसला लेना होगा। केवल अपने स्वार्थ के लिए छात्रों के जीवन से खेलना बंद करना होगा। अगर किसी का मानना है कि हमारे भविष्य के नेताओं का विद्यार्थी जीवन शांतिपूर्ण, सही सोच और सही दिशा में जाए तो उन्हें छात्र राजनीति के खिलाफ खड़ा होना होगा।

यह लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है।