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क्यों कोएनराड एल्स्ट हिंदुत्व के लिए आवश्यक हैं

आशुचित्र- 30 निबंधों के संग्रह के साथ कोएनराड एल्स्ट प्रस्तुत हैं और हमेशा की तरह वे तार्किक एवं सीधे तौर पर मुखर हैं। 

बेल्जियाई भारतविद कोएनराड एल्स्ट एक खतरनाक विद्वान हैं। मीडिया अधिष्ठान और अधपके विद्वान उन्हें अल्पज्ञ पीएन ओक और अति-उत्साही एनएस राजाराम के समतुल्य मानकर एक कुटिल सुख की अनुभूति करते हैं। दोनों ही, हिंदू अधिष्ठान और नया उभरता हुआ इंटरनेट हिंदू प्रकार, उनके साथ पूर्ण रूप से सहज नहीं हैं। लेकिन फिर भी जब यह कोलाहल शांत हो जाएगा तब उनकी पुस्तकें अमूल्य साक्ष्यों की तरह हमारे पास रहेंगी जो हिंदुत्व के पक्ष को बिल्कुल निष्पक्ष होकर सबके सामने प्रस्तुत करेगी। कुंद लेकिन सत्य।

हाल ही में आई उनकी पुस्तक स्टिल नो ट्रेस ऑफ़ एन आर्यन इनवेज़न  आर्य इनवेज़न (आक्रमण) व माइग्रेशन (प्रवास) थियोरी (एआईटी) और आउट ऑफ़ इंडिया (भारत के बाहर) थियोरी पर वाद-विवाद का प्रमुख स्रोत सिद्ध होगी। इस पुस्तक में जाति, जातीयता और नस्ल पर गहन विश्लेषण, पुस्तक समीक्षाएँ और प्रत्युत्तर हैं।

समतावाद के विरुद्ध मनु एक हथियार

पुस्तक का पहला लेख ‘समतावाद के विरुद्ध मनु एक हथियार’ (50 पृष्ठों में) सभी हिंदूवादियों को पढ़ना चाहिए जो धर्म का बचाव करना चाहते हैं और सबसे महत्त्वपूर्ण जो धर्म को वर्तमान परिदृश्य में समझना चाहते हैं। एल्स्ट कहते हैं कि मनु स्मृति  एक जातीय घोषणा-पत्र नहीं है जैसा कि वामपंथी कहते हैं। इसका विस्तार अधिक है और यह स्वयं में ही विरोधाभास भी रखती है। एक महत्त्वपूर्ण बात जिसे एल्स्ट रेखांकित करते हैं, वह यह है कि मनु ने समझाया था कि वर्णों के मिलने से जातियाँ अशुद्ध होती हैं।

मनु के लिए चांडाल वह था जो दास पिता और ब्राह्मण माता से जन्मा हो। एल्स्ट कहते हैं कि यहाँ मनु एक बुद्धिजीवी थे जो वास्तविकता को स्पष्ट छोटे प्रतिमानों के अधीन करना चाहते थे, और वह भी नैतिक तरीके से, क्योंकि एल्स्ट बताते हैं कि अंतर्जातीय विवाह से जन्मे बच्चे किसी नई जाति के नहीं होते थे बल्कि माता-पिता में से किसी एक की जाति में ही सम्मिलित होते थे। यहाँ पर मनु वर्णों के मिश्रण के प्रति अपना असंतोष जताते हैं।

फ्रेडरिक नीट्ज़शे ने नस्लवाद और एंटी-सेमीटिज़्म (दूसरे धर्मों के प्रति विरोध का भाव) मनु से नहीं सीखा था, एल्स्ट कहते हैं। असल में उन्होंने मनु को गलत पढ़कर समकालीन यूरोप की जड़ों में निहित अपने पूर्वाग्रहों को मज़बूत किया। नीट्ज़शे के लिए चांडाल शब्द महत्त्वपूर्ण बन गया, लेकिन

मनु द्वारा इस शब्द के प्रयोग के संदर्भ से कोसों दूर, वे चांडाल को यहूदी राष्ट्रीय चरित्र के मानसिक-सामाजिक उद्गम से संबंधित करते हैं और फिर रोष की मानसिकता से जो कथित रूप से ईसाइयत में निहित है।
स्टिल नो ट्रेस ऑफ़ एन आर्यन इनवेज़न, पृष्ठ 49

इसी के साथ जातियों के मिलने पर मनु के विरोध को नीट्ज़शे की कुलीनता से जोड़ा गया जिसपर संदेह था कि उस समय उभरती हुई मानवीय वास्तविकता के नस्लवादी अध्ययन और नीट्ज़शे के कार्य के साथ सहयोजित है।

पुस्तक को कैसे मिला यह शीर्षक/ 2011 में कैमरन पेट्री का व्याख्यान

2011 में एस्ल्ट ने कैम्ब्रिज के पुरातनविद कैमरन पेट्री जो हड़प्पा पुरातन के विशेषज्ञ हैं। पुरातनविद घग्घर नदी की स्लाइड दिखाकर शुरू करते हैं जिसमें वही मानचित्र होता है जो मिशैल डेनिनो ने सरस्वती पर अपनी पुस्तक में उपयोग किया है। लेकिन एक परेशान करने वाला अंतर भी है। जहाँ डैनिनो के मानचित्र में हड़प्पा स्थलों का संकेंद्रण था, “पेट्री के मानचित्र में इसी क्षेत्र में कम स्थान दिखाई दिए।”

यह स्लाइड देखकर एल्स्ट चिंतित हो गए। सौभाग्यवश अगले ही भाग का इसके विपरीत प्रभाव पड़ा जिसमें “सैकड़ों हड़प्पा स्थल दिखाए गए जहाँ अभी खुदाई नहीं हुई है”, उसी घग्घर नदी के क्षेत्र में। इस लेख के अंत में एल्स्ट उस प्रश्न का उल्लेख करते हैं जो उन्होंने पेट्री से पूछा था, “एक पुरातनविद की तरह जहाँ आपने हाल ही में हुई खुदाई भी देखी है, क्या आपको आर्य आक्रमण के कोई साक्ष्य दिखे।” इस प्रश्न का उत्तर ही इस पुस्तक का शीर्षक है।

वे मुस्कुराए और कहा कि उनके पास ऐसी कोई सनसनीखेज खोज नहीं है जिसकी घोषणा की जाए। आर्य आक्रमण थियोरी को आधिकारिक घोषित करने और वित्तीय रूप से पोषित करने के बाद भी 2011 तक  ऐसा कोई पुरातन साक्ष्य नहीं िला था जो इसे प्रमाणित करता हो।
स्टिल नो ट्रेस ऑफ़ एन आर्यन इनवेज़न, पृष्ठ 62

बुद्ध और जाति

‘बुद्ध और जाति’ नामक लेख बुद्ध और बौद्ध धर्म के बारे में फैलाई गई कई भ्रांतियों का खंडन करता है। बौद्ध धर्म कोई समतावादी आंदोलन नहीं था जो दमनकारी वैदिक तंत्र के विरुद्ध उठा था, जैसा अधिकांश अंबेडकर समर्थकों द्वारा कहा जाता है और बिना आलोचना के लगभग सभी ने इसे स्वीकार कर लिया है। बल्कि, यह वास्तविकता में कैसा था, एल्स्ट बताते हैं-

सैंकड़ों पुरुष जिन्हें बुद्ध ने नियुक्त किया था, उनमें से 80 प्रतिशत से अधिक सवर्ण जाति के थे। 40 प्रतिशत से अधिक ब्राह्मण थे… बुद्ध का उत्तराधिकारी, मैत्रेय जिसकी भविष्यवाणी उन्होंने की थी, उसके ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने की बात कही थी।
स्टिल नो ट्रेस ऑफ़ एन आर्यन इनवेज़न, पृष्ठ 74-5

जब हिंदू कहते हैं कि वे विष्णु के अवतार के रूप में बुद्ध का सम्मान करते हैं, तब हिंदू-विरोधी तर्क आता है कि बुद्ध को आत्मसात करने की यह ब्रहाम्णवादी रणनीति है। लेकिन एल्स्ट बताते हैं कि यह पहचान बुद्ध ने ही शुरू की थी या फिर वास्तविकता में बौद्ध स्रोतों से ही आई थी।

बौद्ध ग्रंथों में सूर्यवंश में बुद्ध के पुण्य जन्म को राम से जोड़ा गया है। स्वयं बुद्ध ने राम के अवतार होने का दावा किया था, यह रामायण के बौद्ध संस्करण जातकों में मिलता है। उन्होंने स्वयं को विष्णु से संबंधित भी बताया। बाद में हिंदुओं ने राम और बुद्ध दोनों को विष्णु का अवतार माना लेकिन बुद्ध की शुरुआत उनके राम के अवतार होने के दावे से हुई थी।
स्टिल नो ट्रेस ऑफ़ एन आर्यन इनवेज़न, पृष्ठ 76

एल्स्ट यह भी मानते हैं कि बुद्ध को प्रगतिवादी दिखाने की परंपरा जो औपनिवेशिक युग में शुरू हुई, उसकी जड़ें भी नस्लवाद में हैं-

द्वितीय विश्वयुद्ध से पूर्व कुछ नस्लवादी बुद्ध के “लंबे और श्वेत रंग” के होने के विवरण से उत्साहित हो गए और माना कि बुद्ध एक विशुद्ध आर्य हैं।
स्टिल नो ट्रेस ऑफ़ एन आर्यन इनवेज़न, पृष्ठ 76

लेकिन एक चीज़ जो हमें भले ही आश्चर्यचकित न करे, रोमांचित करती है, वह यह है कि बुद्ध में लोगों की निष्ठा (या कहें जुनून) में निरंतरता- जैसे भारतविद माइकल विट्ज़ेल जो “लंबे और श्वेत रंग” की बात पर कहते हैं कि बुद्ध साक्य जनजाति के थे जिसा उद्गम ईरान से हुआ है।

हॉर्सप्ले ऐट हड़प्पा रीविज़िटेड

माइकल विट्ज़ेल के बारे में बात करते हुए एल्स्ट ने इस हारवर्ड संस्कृतज्ञ की प्रशंसापूर्वक आलोचना की है। उन्होंने हिंदू कार्यकर्ताओं व विद्वानों द्वारा विट्जेल पर किए गए प्रहारों, विशेषकर एनएस राजाराम के प्रहारों का खंडन किया है। विट्ज़ेल ने जानबूझकर राजाराम की अनाड़ी गलती को बढ़ा-चढ़ाकर छलपूर्वक हिंदुत्व षड्यंत्र कहा था।

इस नीच घटनाक्रम पर एल्स्ट ‘हॉर्सप्ले ऐट हड़प्पा रीविज़िटेड’ (हड़प्पा में ऊधम को फिर देखना) नामक लेख में पृष्ठ 210-4 में लिखते हैं।

यहाँ हड़प्पा संकेतों को पढ़ने में वे राजाराम और झा से एकदम विपरीत हैं। जैसे कि उन्हें यह देखकर दुख हुआ कि कैसे एनएस राजाराम ने “दो यूनिकॉर्न जैसे पशुओं की प्रसिद्ध सील का संबंध देवनागरी के ऊँ से बताया था जबकि यह लिपि हड़प्पा से 2000 वर्ष बाद आई थी और ब्राह्मी लिपि से जन्मी थी जिसमें ऊँ नहीं था।” इसके बाद फ्रंटलाइन  के एक लेख पर राजाराम का उत्तर “जिसमें घोड़े के संबंध में कम विश्वसनीयता का दावा किया गया था ने वातावरण को और उपहासपूर्ण बना दिया।”

लेकिन एल्स्ट बताते हैं कि घोड़े की उपस्थिति कैसे अब हड़प्पा पुरातत्व कॉम्प्लेक्स में सुस्थापित है। वे राजाराम का लिंच-मॉब (बेकायदा प्रणदंड देने वाली भीड़) पत्रकारिता से भी बचाव करते हैं। वे इसकी भी प्रशंसा करते हैं कि राजाराम ने भीड़ का सही तरीके से सामना किया है।

लेकिन कुलमिलाकर, राजाराम और झा पर विट्ज़ेल के हमले ने उन्हें फ्रंटलाइन  से मिला दिया और इसका प्रभाव अंतर्राष्ट्रीय विद्वता और मीडिया सर्कल में हिंदुत्व आंदोलन पर पड़ा और इसके महत्त्वपूर्ण परिणामों पर। यह एल्स्ट का अवलोकन है। हालाँकि राजाराम स्पष्ट रूप से पूर्व आईएनए स्वाधीनता सेनानी पीएन ओक के प्राचीन हिंदू विश्व के मत का खंडन करते हैं लेकिन उन्हें ओक से जोड़ दिया जाता है और एल्स्ट को इन दोनों से, उन्हें खारिज करने का एक आसान तरीका- संगति का अपराध।

एल्स्ट वैश्विक पौराणिक कथाओं पर विट्ज़ेल की पुस्तक का राजाराम के नस्लवाद के अपराधों से बचाव करते हैं (राजाराम, विट्ज़ेल और नस्लवा, पृष्ठ 215-24)। एल्स्ट को इस पुस्तक में नस्लवाद जैसा कुछ नहीं लगता है और राजाराम की ऐसा कहने पर आलोचना करते हैं।

माइकल विट्ज़ेल की पुस्तक ओरिजिन ऑफ़ वर्ल्ड मिथ  की समीक्षा

माइकल विट्ज़ेल की पुस्तक ओरिजिन ऑफ़ वर्ल्ड मिथ (2013) की समीक्षा करते हुए एल्स्ट ने एक निबंध लिखा है। एल्स्ट ने बताया कि जब उन्होंने यह समीक्षा ‘इंडो-यूरोपियन शोध सूची’ में दी थी तो इसे विट्ज़ेल के मित्र स्टीव फार्मर ने प्रतिबंधित कर दिया था क्योंकि यह “अति राजनीतिक” और “अति विट्ज़ेल विरोधी” थी। हालाँकि यह समीक्षा ‘ग्लोबलाइज़ेशन ऑफ माइथोलॉजी’ न ही राजनीतिक है और न ही विट्ज़ेल-विरोधी। यह समीक्षा स्वराज्य  पर भी उपलब्ध है। एल्स्ट को विट्ज़ेल की समझाइश “बहुत विवरणात्मक लगती है”, कार्ल जंग से भी अधिक।

विट्ज़ेल की पैन-जियन गोंडवाना पौराणिक कथा और लौरैशियन पौराणिक कथा को एल्स्ट द्विचर की तरह देखते हैं। विट्ज़ेल के अनुसार “शमनिक ताप की अवधारणा”और इस ‘शक्ति’ का ध्यानपूर्वक प्रबंधन “एक बहुत ही प्रचीन ‘पैन-जियाई’ लक्षण है और इसे मध्ययुगीन भारतीय कुंडली योग में देखा जा सकता है।” इसी प्रकार नायक द्वारा दैत्य का वध लौरैशियन पौराणिक कथाओं के लक्षण हैं।

आज से 40,000 वर्ष पूर्व पैन-जियन गोंडवाना पौराणिक कथा के ‘कुछ पहलू’ ‘गोंडवाना’ नाम के बावजूद ‘अफ्रीका से बाहर की पौराणिक कथा जैसी रंगत रखते हैं’। वहीं, लौरैशियन पौराणिक कथा “कम से कम 20,000 वर्ष पुरानी है” और इस विषय में विट्ज़ेल अंदाज़ा लगाते हैं कि “बृहत दक्षिण-पश्चिमी एशिया लगभग 40,000 वर्ष पहले था” (विट्ज़ेल, 2013, पृष्ठ 291)। परेशानियाँ तब उभर सकती हैं जब वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्यों को वैश्विक पौराणिक कथा वृक्ष की द्विचर शाखाओं पर बैठाने का प्रयास किया जाए।

हैरानी की बात है कि स्वयं एल्स्ट विट्ज़ेल के दृष्टिकोण, कि पैन-जियन गोंडवाना शमनिज़्म में ही नृत्य था, न कि “शमनिस्टिक ड्रम वादन की साइबेरियाई विशेषता और उनके परिधान शमनिस्टिक वेशभूषा से मेल भी नहीं खाते हैं”, पर आधारित एक चिंतित कर देने वाले अनुमान लगाते हैं। वे कहते हैं-

मैं यह कह सकता हूँ कि दक्षिण भारत के परियाह का मामला एक सीमावर्ती मामला है- वे उन्मादपूर्ण ढोल वादन और नृत्य कर नियंत्रित आत्मा का आह्वान करते हैं। उनकी यह परंपरा वैदिक हिंदुत्व से अलग और शमनिज़्म के निकट है। अभी तक ब्राह्मण पुजारी उन्हें “अस्पृश्य” मानकर उनसे दूरी बनाकर रहते थे, इसलिए नहीं क्योंकि वे तुच्छ हैं बल्कि इसलिए कि माना जाता है कि वे अपने साथ आत्माओं और मृतों की दुनिया लेकर चलते हैं।
स्टिल नो ट्रेस ऑफ़ एन आर्यन इनवेज़न, पृष्ठ 154

तमिल नाडू में परियार समुदाय आज भले ही एक अनुसूचित समुदाय है और हाल तक ब्राहम्ण भूत के डर से उन्हें अस्पृश्य मानते थे। लेकिन वे एक मात्र समुदाय नहीं हैं जो दूसरी चेतना में जाकर उन्मादपूर्ण ढोल वादन करते हैं। असल में जो चीज़ परियारों को उनके पारंपरिक पुजारियों वल्लुवरों से अलग करती है, वह यह है कि पुजारियों का उनके ज्योतिष शास्त्र के लिए सम्मान होता है। तमिल कवियों में से प्रमुख तिरुवल्लुवर, वल्लुवर समुदाय के थे।

मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में संस्कृत और तुलनात्मक दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक गुस्ताव ऑपर्ट अपने कार्य भारत के ‘ओरिजिनल इनहैबिटेंट्स’ (मूल वासी) में वल्लुवरों को परियारों में वंशागत पुजारी बताते हैं (हालाँकि वे उन्हें गलत रूप में पल्ला कहते हैं)। वे कहते हैं-

वर्तमान में वल्लुवरों की स्थिति रोचक है। वे ज्योतिष शास्त्र में अपनी उपलब्धियों के लिए मशहूर हैं और कुंडली बनाने और भविष्यवाणी करने में उन्हें ऊँचा दर्जा दिया गया है। सामाजिक रूप से पृथक जाति होने के बावजूद ब्राह्मण उनका सम्मान करते हैं, विशेषकर ब्राह्मण महिलाएँ जो कई बार उनसे सलाह लेने के लिए जाती हैं। वे पवित्र ब्राह्मण धागा या यज्ञ्नोपवीत भी पहनते हैं। परियारों या पल्लाओं के विवाह में वे संस्कृत श्लोक पढ़ते हैं, संभवतः इसका अर्थ वे भी नहीं जानते। अपने पवित्र श्लोकों को गुप्त रखने वाले ईर्ष्यालु ब्राह्मणों को देखा जाए तो यह बहुत अजीब है कि वल्लुवर कुछ श्लोक जानते हैं और उनका प्रयोग भी करते हैं।
गुस्ताव ऑपर्ट, ओरिजिनल इनहैबिटेंट्स ऑफ़ भारतवर्ष, 1893, पृष्ठ 67-8

हालाँकि ऑपर्ट इस ‘विरोधाभास’ को आर्य और द्रविड़ के मध्य विभाजन के परिप्रेक्ष्य में ही कहते हैं- कि वल्लुवरों ने मंत्र उस समय सीख लिए थे जब “बाहर से आए हुए ब्राह्मणों और मूल निवासियों में मैत्री रही होगी।”

तमिल की कुछ परिष्कृत रहस्यमय दार्शनिक रचनाएँ वल्लुलरों ने की हैं। ऑपर्ट ज्ञान-वेट्टियन (वल्लुवर द्वारा लिखित 16 वीं शताब्दी का लेख जिसमें वेट्टियन- परियाह जाति के उत्तराधिकारी- विवेकपूर्ण बात कहते हैं) का उल्लेख करते हैं जिसमें वेट्टियन लोगों से जनेउ पहनने और राजचिह्न विशेषकर श्वेत छाता और श्वेत चौड़ियाँ धारण करने के लिए कहते हैं, साथ ही ईश्वर और ऋषियों के स्वर्ण पंखे और वस्त्र भी। वे साधना के लिए “ऊँ का पाठ करने के लिए कहते हैं जिससे विवेक का तेज और दिव्य सत्व प्राप्त किया जा सके।”

तिरुवल्लवुर मंदिर

शिलालेखों से हमें साक्ष्य मिलता है जो दर्शाता है कि वल्लुवर वास्तव में ब्राह्मण पुजारी थे और मंदिरों में काम करते थे, उनका सम्मान वैसा ही था जैसा आज के ब्राह्मणों का होता है। चोल काल में उनकी स्थिति थोड़ी नीची हुई, फिर भी कई प्रमुख मंदिरों में वे शीर्ष पद पर आसीन रहे। जहाँ अंग्रेज़ी ने परियाह को एक ऐसी जाति बना दिया जो समाज से बहिष्कृत थी, वहीं हिंदू धर्म में परियाहों को गजरोही कहा गया है।

स्पष्ट रूप से परियाहों ने जो भेदभाव और कष्ट सहा है उसकी जड़ें राजनीतिक और सामाजिक सत्ता के लिए संघर्ष में हैं जो दक्षिण भारत में नौवीं शताब्दी में शुरू हुआ था, न कि वैश्विक पौराणिक कथाओं की शाखाओं पैन-जियन गोंडवाना के शमनिक परंपरा और लौरेशियन से।

लेकिन इन सबके बावजूद एल्स्ट की पुस्तक समीक्षा सकारात्मक, शैक्षिक है और इसमें राजनीति जैसा कुछ नहीं है, न ही ऐड होमिनेम (बगैर सोचे-समझे प्रतिक्रिया देना) की भ्रांति है (जिसे प्रायः लोग एल्स्ट के लेखन में पाते हैं)।

शेल्डल पॉलक पर निबंध

इस पुस्तक में दो निबंध हैं जो शेल्डन पॉलक के कार्यों की विवरणात्मक आलोचना करते हैं जो इंडोलॉजी (भारतीय विद्या) से हिंदू दर्शन पर एक थिसीसी पोषित कर रहे हैं- विशेषकर मीमांसा- जिसका कहना है कि हिंदू दर्शन ने नाज़ी विचारधारा और नीतियों को प्रभावित किया, यहाँ तक कि आकार दिया जिसमें नरसंहार भी है- अ नाज़ी आउट ऑफ़ इंडिया थियोरी (पृष्ठ 97-105) और शेल्डन पॉलक्स आइडिया ऑफ़ अ नेशनल-सोशलिस्ट इंडोलॉजी (पृष्ठ 397-420)।

दोनों ही आवश्यक हैं क्योंकि वे हिंदूवादियों को एक नए शैक्षिक युद्ध शस्त्र से परिचित कराते हैं जो उनके विरुद्ध “बड़ी जगहों” पर जमा किया जा रहा है, एल्स्ट कहते हैं। तो “हिंदू जो अनेक बार लिख चुके हैं कि एआईटी की जड़ें उपनिवेश और नस्लवाद में हैं” लेकिन पॉलक और उनके ‘अनुचर’ 1993 से इस थिसीस को बड़ा बनाकर प्रसारित कर रहे हैं कि “जर्मनी ने इंडोलॉजी में काफी निवेश किया है और इसका प्रयोग स्वयं को ‘आर्य’ घोषित करने की परियोजना में किया जा रहा है दो उन्हें ‘यहूदियों’ से भिन्न बनाता है।”

एल्स्ट के अनुसार, जहाँ हिंदूवादी एक प्रतिष्ठित संस्कृत साहित्य संरक्षण संस्थान, जो एक हिंदू उद्योगपति द्वारा वित्तपोषित है, में पॉलक की नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं, वहीं पॉलक ने “हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलन के विरुद्ध अपनी घृणा को और तीक्ष्ण करते हुए एक पेपर लिखा जिसमें कहा गया है कि सामान्य रूप से इंडोलॉजी, विशेषकर ओआईटी नाज़ी अधिष्ठान को प्रिय है।” (पृष्ठ 99-100)

अ नाज़ी आउट ऑफ़ इंडिया थियोरी  (2012) में एल्स्ट विश्वा अदलुरी का 2011 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ हिंदू स्टडीज़  में पेपर ‘प्राइड एंड प्रिज्युडिस- ओरिएंटलिज़्म एंड जर्मन इंडोलॉजी’ और इसके जवाब में 2012 में इसी जर्नल में रीनहोल्ड ग्रुनेन्डल का पेपर ‘हिस्टरी इन द मेकिंग- ऑन शेल्डन पॉलक्स ‘एनएस इंडोलॉजी’ और विश्वा अदलुरीज़ ‘प्राइड एंड प्रिज्युडिस” पर लिखते हैं-

मुझे अस्पष्ट रूप से पता था कि पॉलक द्वारा ओआईटी और राष्ट्रीय-समाजवाद को जोड़ा जाना जाना गलत है लेकिन यह नहीं पता था कि वे कितनी बुरी तरह से गलत हैं। सबसे पहले उनकी थिसीस में लिखा गया है कि नाज़ियों के लिए भारत चिंतन का विषय था। इसे पॉलक ने प्रभावी (लेकिन खोखला) रूप से आगे रखा है… लेकिन ग्रुनेन्डल ने पुराने और निष्पक्ष सूत्रों से बताया है कि इंडोलॉजी विभाग को कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था, और यह प्रचीन निकट-पूर्वी अध्ययन, साइनोलॉजी आदि से छोटा था और नाज़ी काल में सामान्य रूप से न ओरिएंटलिज़्म और विशेष रूप से न इंडोलॉजी पर ध्यान दिया गया। ‘इंडो-जर्मनी अध्ययन’ भारत की ओर उनके उन्मुखीकरण में सबसे बड़ी बाधा बना।
स्टिल नो ट्रेस ऑफ़ एन आर्यन इनवेज़न, पृष्ठ 154

समीक्षक पाठकों को कार्ला पोइवे और इरविंग हैक्सैम द्वारा 2015 में इसी जर्नल में प्रकाशित ‘सरप्राइज़िंग आर्यन मेडिटेशन्स बिटवीन जर्मन इंडोलॉजि एंड नाज़िज़्म- रिसर्च एंड अदलुरी/ग्रुनेन्डल डिबेट’ पढ़ने के लिए भी प्रोत्साहित करेगा। यहाँ पर लेखक दो अलग-अलग वैश्विक दृष्टिकोण, जर्मन इंडोलॉजी के चरण और इसके द्वारा ‘आर्य’ शब्द के प्रयोग पर प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं-

जर्मन भारतविद एक संकीर्ण राष्ट्रप्रेमी विचार की ओर आकर्षित नहीं थे जिससे वे स्वयं को ऊपर मानकर ब्रिटिश, अमेरिकी और भारतीय विद्वानों को नीचा दिखा सकें जैसा अदलुरी (2011) कहा था। या तो उन्होंने एक वैश्विक दृष्टिकोण निर्मित किया था- शुरू में एक सार्वभौमिक प्रेमयुक्त दृष्टिकोण जिसमें मुख्य रूप से ओरिएंट (उन्मुखीकरण) जोड़ा गया था या कम से कम भारतीय हिंदू परंपरा, इसकी पौराणिक कथा, अनुकूल सहयोगी की तरह समय के साथ आगे बढ़ना… हालाँकि एसएस ऐन्सेस्ट्रल हैरिटेज फाउंडेशन जैसे नाज़ी संस्थान की स्थापना के बाद “आर्य” शब्द लोगों को यहूदियों के विरुद्ध चालित करने के लिए और गेस्टापों और एसएस द्वारा उनकी हत्या को छुपाने के प्रयोग में आया।
कार्ला पोइवे और इरविंग हैक्सैम, 2015

इनका पेपर हिंदुओं को एक दृष्टिकोण प्रदान करता है कि यह शोध किस दिशा में जा रहा है। उदाहरण के रूप में अपने निष्कर्ष में पोइवे और हैक्सैम दावा करते हैं कि उन्होंने “सिर्फ कुछ लोगों का ही उल्लेख किया है जो यूरोपीय अधिनायकवादियों से संपर्क में थे और कई बार उन्हें जो प्राप्त हुआ वह उससे अधिक था जो उन्होंने दिया, यहाँ तक कि सीधी आलोचना भी।”

बाएँ से दाएँ- हाल्बफास, पॉलक और एल्स्ट

2011 में मल्होत्रा और नीलकंदन की पुस्तक ब्रेकिंग इंडिया  ने हिंदुओं के विरुद्ध इस मोर्चे की चेतावनी दी थे। हमने इंडोलॉजिस्ट विलियम हाल्बफास का उल्लेख किया था जिन्होंने पॉलक की इस पहल की 1997 में ही आलोचना की थी।

हाल्बफास की आलोचना पुनः पढ़ने योग्य है। यह मानते हुए कि “राष्ट्रीय समाजवाद में नायकत्व और सत्ता के लिए अत्यधिक और क्रूर प्रतिबद्धता से हम नैसर्गिक रूप से सावधान हो जाते हैं लेकिन अन्य संरचनात्मक रूप से समान विचारधाराओं और चर्चाओं में ऐसे खतरा दृष्टिगोचर नहीं है।”, हाल्बफास विद्वानों को पॉलक की परियोजना के प्रति सचेत करते हैं- “शक्ति की सभी चर्चाओं और उनके प्रयोग एक ही बात की अभिव्यक्ति हैं और विचार और चर्चा में निहित जो संरचना है, वही ‘डीप ओरिएंटलिज़्म’ (गहरा उन्मुखीकरण) है।” इसके बाद हाल्बफास बताते हैं कि इसके बाहर क्या समझा जा सकता है-

क्या इसकी अनुमति मिलती है कि इसमें निहित संरचना को सामान्य रूप से ‘डीप नाज़िज़्म’ या ‘डीप मीमांसा’ की तरह पहचाना जाए? और वह क्या चीज़ है जो हमें कुमारिला और विलियम जोनेस को ‘डीप नाज़ी’ और अडोल्फ हिटलर को ‘डीप मीमांसा’ कहने से रोकती है? असल में पॉलक ‘जस्टिस सर विलियम (जोन्स)’ से ‘एसएस ओबरस्टर्मफहरर वस्ट’ को सीधी रेखा से जोड़ते हैं और भारत की संस्कृत परंपरा और बाद में उभरे ब्रिटिश उपनेविशियों और जर्मन राष्ट्रीय समाजवादियों के बीच मूल संबंध की बात कहते हैं। इसी परिसर में वे नरसंहार को सही ठहराने को ही ओरिएंटलिज़्म का परम लक्ष्य मानते हैं। क्या इन सबसे हम ‘आलोचक’, ‘पोस्ट-मॉडर्न’ और ‘पोस्ट कॉलोनियल’ इंडोलॉजी के लक्ष्य के निकट आते हैं? ऐसी इंडोलॉजी कैसी होगी? पॉलक मानते हैं कि उनके स्वयं के विचार अभी अस्थाई हैं। तब तक के लिए वे कोई उपयुक्त विकल्प नहीं बताते हैं।
विलियम हाल्बफास, ‘बियॉन्ड ओरिएंटलिज़्म- विलियम हाल्बफास के कार्य और भारतीय अंतर-संस्कृति अध्ययन पर इसके प्रभाव’ (1997)

अब जिन विचारों को 1997 में अस्थाई कहा जा रहा था, वे दो दशकों बाद एक शैक्षिक क्षेत्र में एक शक्तिशाली रूढ़िबद्ध धारणा बन गए हैं। एल्स्ट हमें चेताते हैं कि हिंदू दर्शन का यह पूर्ण विरूपण और नकारात्मक रूढ़ियों में बांधना शैक्षिक भूमि पर एक विषदायक वृक्ष का रूप ले सकता है, जो वैसे ही हिंदी-विरोधी भाव रखती है।

‘पॉलक और तथाकथित एनएस इंडोलॉजी’ नामक निबंध में एल्स्ट पॉलक की विवरणात्मक आलोचना करते हुए उनकी आधारविहीन थिसीस को उजागर करते हैं। इसका एक महत्तवपूर्ण अंश पढ़ें-

ध्यान दें कि पॉलक के सभी उल्लेखों में केवल एक हिंदू का ही उल्लेख है और वही बार-बार आता है- वह हैं बुद्ध। वेशास्त्र नियमों को गढ़कर मीमांसा विचारकों को नाज़ियों की प्रेरणा बताते हैं, (जैसे कि असमानता को समझने के लिए उन्हें मीमांसा की आवश्यकता थी) लेकिन यह बात कहने के लिए वे किसी नाज़ी को नहीं ढूँढ पाते हैं। वे 12वीं शताब्दी के शास्त्र भाष्यकार भट्ट लक्ष्मीधर को सामाजिक पदक्रम सिद्ध करने के लिए घसीटते हैं। दूसरी ओर वे बुद्ध को वेदकाल की असमानता के विरुद्ध खड़ा बताते हैं, लेकिन वही बुद्ध नाज़ियों में लोकप्रयि माने जाते हैं।
स्टिल नो ट्रेस ऑफ़ एन आर्यन इनवेज़न, पृष्ठ 409

शैक्षिक क्षेत्र में शेल्डन पॉलक ही एकमात्र ऐसे नहीं हैं जो हिंदू-विरोधी हैं। पॉलक केवल विद्यमान धारणा पर अपनी बात कह रहे हैं जिसे वे अपनी आधिकारिक बात बताते हैं। विद्यमान धारणा है कि हिंदू धर्म को नकारात्मक चीज़ों से जोड़ा जाता है और पॉलक ऐसा बिना साक्ष्य के किया जा रहा है- “सबसे घटिया आरोप जो लगाया जा सकता है, वह होलोकॉस्ट (सर्वनाश) के लिए ज़िम्मेदार ठहराना।” (पृष्ठ 418)

आर्य आक्रमण और अप्रवासन पर टोनी जॉसेफ का डीएनए साक्ष्य

465 पृष्ठों की इस पुस्तक का आखिरी निबंध टोनी जॉसेफ पर है जो आर्य आक्रमण थियोरी का समर्थन करने के लिए डीएनए साक्ष्य का प्रयोग करते हैं। वे टोनी जॉसेफ के इस पक्षपातपूर्ण रवैये को उजागर करते हुए उन लोगों को भी जग करते हैं जो इस थियोरी के विरोध में हैं और उन्हें एक समस्या से परिचित कराते हैं कि इससे निपटने होगा।

उनका मानना है कि भारत में सिर्फ पुरुष आए और वाई-जीन्स में उनके अवशेष मिलते हैं जिसने भारतीय इतिहास को प्रभावित किया, यानी कि आर्य आक्रमण। अभी तक किसी ने नहीं कहा कि यह सिद्ध हो चुका है, हालाँकि उनके शोध जिसमें इंडो-यूरोपियन आक्रमण की बात कही गई है, लोग सोच सकते हैं कि इसका संबंध आर्यों से है। लोगों को दूसरा पक्ष समझाने के लिए तार्किक कुशलता और गहन शोध के प्रयास की आवश्यकता है।
स्टिल नो ट्रेस ऑफ़ एन आर्यन इनवेज़न, पृष्ठ 456-7

यह पुस्तक विभिन्न लेखों, ब्लॉगों, पेपरों आदि का संकलन है जो एल्स्ट ने 2008 से 2017 के अंतराल में प्रस्तुत किए थे। एल्स्ट विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फरेंस में जाते हैं और वैश्विक स्तर के विद्वानों से परस्पर संवाद करते हैं। इस विषय पर जितने लोग काम कर रहे हैं, ऐसी कुशाग्रता और तार्किकता शायद ही किसी में देखने को मिलती है।

हिंदुओं की ओर से वे एक ऐसे व्यक्ति हैं जो बुने जा रहे जाल, तैयार किए जा रहे हथियार और बनाई जा रही रूढ़ियों को देख सकते हैं जो आगे चलकर हिंदुत्व के आंदोलन पर कुठाराघात करेंगी। नैसर्गिक रूप से वे कई बार जल्दबाज़ी कर देते हैं और हिंदुओं की स्वयं को बधाई देने वाली शालीनता की आलोचना कर देते हैं।

इस पुस्तक में निहित हिंदुओं को सतर्क करती हुई इस सलाह पर ध्यान दें-

यदि आप चाहते हैं कि आर्य वाद-विवाद किसी दिशा में जाए तो ओआईटी लेखकों पर पूर्ण रोक लगानी होगी, बिना अगर-मगर किए। अब और मैक्स मूलर और माइकल विट्ज़ेल नहीं। असल दुनिया में समय व्यतीत कर, सच्चे विद्वानों से बातचीत कर मुझे असल परिस्थिति का अंदाज़ा है और वह यह है कि आज भी एआईटी सभी प्रमुख मंचों से पढ़ाई जाती है। जो लोग कुछ और बताते हैं, वे काल्पनिक दुनिया में जी रहे हैं और स्वयं के विचारों से ही आत्ममुग्ध हैं। सौभाग्यवश, हम आधुनिक इतिहास को भूलकर प्राचीन इतिहास के साक्ष्यों पर काम कर सकते हैं जो हमें सत्य की ओर ले जाएगा।
स्टिल नो ट्रेस ऑफ़ एन आर्यन इनवेज़न, पृष्ठ 209

हो सकता है यह उन लोगों को जवाब न दे पाए जो स्वयं को आर्य वाद-विवाद का विजेता मान चुके हैं। लेकिन अवश्य ही यह हमें एक अंतिम पराजय से बचाएगा।

उनकी डीकॉलोनाइज़िंग द हिंदू माइंड (2005, रूपा) उनकी अधिकांश पुस्तकें निष्प्रभ कवर के साथ हैं जो कि ‘वॉइस ऑफ़ इंडिया’ का ट्रेडमार्क है। यह पुस्तक स्वागत योग्य अपवाद है। कवर आकर्षक है। आशा है कि हिंदू बुद्धिजीवी औक थिंक टैंक इस पुस्तक पर पैनल चर्चा और लेखकर से चर्चा आयोजित करें।

हिंदुओं में इस पस्तक का प्रचार कर, चर्चा और वाद-विवाद कर हम स्वयं की सेवा करेंगे। हम स्वयं को अपनी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार करेंगे। अगर इस पुस्तक को उत्साह से नहीं स्वीकारा गया तो यह दुखद होगा, इसका दुष्प्रभाव केवल एल्स्ट के बाज़ार पर नहीं पड़ेगा (जिसकी उन्हें आवश्यकता नहीं है), बल्कि यह दर्शाएगा कि हम सरस्वती का सम्मान नहीं कर सकते।

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