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‘फ्री अवर टेम्पल्स’ अभियान उत्तर भारत में क्यों नहीं है प्रभावी

प्रसंग
  • कई कारण हैं जो ‘फ्री अवर टेम्पल्स’ यानी मंदिरों के स्वतंत्र नियंत्रण के लिए चलाए जा रहे अभियान को दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत में बहुत कम स्वीकार्य बनाते हैं।

‘धर्मनिरपेक्ष’ भारत की सत्ता में एक विसंगति है कि यह हिन्दुओं के धार्मिक और दानार्थ संस्थानों पर नियंत्रण हासिल करना चाहती है। जबकि धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने धार्मिक क्रिया-कलाप और यहाँ तक कि स्वयं के शिक्षण संस्थानों को भी चलाने की स्वतंत्रता है, वहीं हिन्दुओं को केवल सीमित धार्मिक स्वतंत्रता ही मयस्सर है। हाल ही में, मंदिर प्रशासनों पर सरकार के नियंत्रण का मुद्दा एक विवादास्पद विषय बन गया है क्योंकि नेहरूवादी समय की अन्य सभी सर्वसम्मतियों की तरह ही इसके विरुद्ध भी विरोधी स्वर प्रखर हो रहे हैं।

लेकिन ध्यान देने योग्य दिलचस्प बात यह है कि ऐसी आवाजें दक्षिण भारत के मध्यम वर्ग से व्यापक रूप से उठ रही हैं। हम इनमें निहित मुद्दों की सार्वजनिक समझ और मंदिरों के अविनियमन के लिए एक मजबूत माँग देखते हैं। यह मुद्दा उत्तर भारत में सोशल मीडिया के कुछ छोटे समूहों के अलावा अन्य कहीं अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रहा है। यह देखते हुए कि हिन्दुओं के कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल और मंदिर उत्तर भारत में स्थित हैं, यह काफी आश्चर्यजनक है। विशेष रूप से तब, जब इन राज्यों की सरकारों ने अधिकाधिक संख्या में मंदिरों पर नियंत्रण हासिल करने में अपने दक्षिणी समकक्षों के पदचिह्नों का अनुसरण किया है।

उत्तर भारत में लोगों की निठुराई का अंदाज़ा इस क्षेत्र के इतिहास से लगाया जा सकता है जब बार-बार के आक्रमणों और विदेशी शासन के कारण मंदिरों और धार्मिक संस्थानों का व्यापक विनाश हुआ था। इसने परंपराओं को इतना तहस-नहस और क्षतिग्रस्त किया है कि इसमें सुधार लगभग असंभव है। इस्लामी शासन के तहत, नए मंदिरों के निर्माण की अनुमति नहीं थी और जिन पुराने मंदिरों की चारदीवारियां थोड़ी बहुत सलामत बची भी थीं उनकी मरम्मत बहुत मुश्किल थी। इससे मंदिरों को बनाने और चलाने में समाज की रूचि और क्षमता में कमी आई। यह इच्छाओं का क्षरण था जिसने अंततः धार्मिक संस्थानों के प्रति उदासीनता को जन्म दिया। करिश्माई बाबाओं/गुरुओं के संस्थानों के साथ-साथ छोटे मंदिरों ने बड़े सार्वजनिक मंदिरों, जो कभी सार्वजनिक जीवन के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे, के आसपास केन्द्रित संस्थागत धार्मिक रीति-रिवाजों का स्थान ले लिया। यहाँ तक कि अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में भी क्षेत्रीय साम्राज्यों के उदय ने कुछ अपवादों, जैसे – अयोध्या में हनुमान मंदिर, के बावजूद अनुकूल रूप से परिदृश्य को नहीं बदला क्योंकि इन नए साम्राज्यों में से अधिकांश साम्राज्य इस्लामी थे। यह दक्कन साम्राज्य और दक्षिण भारत से बिल्कुल उलट था, जहाँ इस अवधि के दौरान मंदिरों का निर्माण कार्य जोरों पर था और राजनीतिक सरपरस्ती ने पुराने रीति-रिवाजों और समारोहों के पुनरुत्थान को सुनिश्चित किया था।

दूसरा कारण दरअसल उपर्युक्त कारणों का एक स्वाभाविक परिणाम है। निरंतरता में कमी और परम्पराओं में पतन का अर्थ था कि समाज और पुजारी वर्ग ने ऐसे संस्थानों को प्रभावी रूप से चलाने की क्षमता खो दी थी। इस्लामी शासन की दासता को पराभूत किये जाने और औपनिवेशिक शासन के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की अनुभूति होने के बावजूद भी मंदिर अराजकता, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के गढ़ बन गए थे। वंशानुगत संरक्षकों के बीच संपत्ति के विवादों ने अक्सर हिंसा को जन्म दिया और अदालत के मामलों ने सरकारी हस्तक्षेपों को बल दिया। श्रद्धालुओं के निरंतर उत्पीड़न और बेहतर सुविधाएँ सुनिश्चित करने में रूचि की कमी ने मंदिर प्रबंधन में जनता के विश्वास को कम किया और व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप की माँग को बल दिया।

‘फ्री अवर टेम्पल्स’ अभियान में शामिल कुछ लोगों के लिए यह एक आश्चर्य का विषय हो सकता है लेकिन सामान्यतयः उत्तर भारत में मंदिरों पर सरकार के नियंत्रण का स्वागत किया जाता है। 2015 और 2016 में वृन्दावन में प्रसिद्ध बाँके बिहारी मंदिर और मिर्ज़ापुर में विन्ध्याचल मंदिर को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अपने नियंत्रण में लिए जाने के कदम का विरोध करने वालों को कोई सार्वजनिक समर्थन नहीं मिला। भारतीय जनता पार्टी ने इसका विरोध किया लेकिन ‘मंदिर की राजनीति’ करने के बजाय लोगों को बेहतर सुविधाएँ देने के नाम पर समाजवादी पार्टी ने भाजपा पर जोरदार हमला बोला। कुल मिलाकर जनता सपा के तर्क के साथ खड़ी नज़र आई और इसका कारण जानना कठिन नहीं है कि ऐसा क्यों हुआ। विन्ध्याचल देवी मेरे परिवार की कुलदेवी हैं और यहाँ तक कि हमें भी सरकार के कदम पर आपत्ति नहीं हुई क्योंकि हमने देखा है कि कैसे कुप्रबंधन, उत्पीड़न और अव्यवस्था के कारण मंदिर जाना शायद ही एक सुखद अनुभव रहा है। बाँके बिहारी मंदिर के साथ भी कहानी ऐसी ही है, जहाँ गोसाईंयों का व्यवहार शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। कुछ साल पहले भक्तों के साथ उनके व्यवहार को देखते हुए मैंने स्थितियाँ ठीक होने तक वापस न जाने का फैसला किया था। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि बहुत सारे लोग ऐसा ही विचार रखते हैं।

तीसरा कारण जाति के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने और मंदिरों में जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के विषय से जुड़ा है। यह एक ऐसा विषय है जिससे ‘फ्री अवर टेम्पल्स’ के अभियानकर्ता अब तक जी चुराते आए हैं लेकिन यकीनन यह सबसे मजबूत नैतिक तर्क है जिसे मंदिर के मामलों में राज्य हस्तक्षेप के पक्ष में इस्तेमाल किया जाता है। मंदिरों को सरकार के नियंत्रण से मुक्त कर देने से मंदिरों में प्रवेश और अन्य सेवाओं में वर्षों पुरानी भेदभाव की समस्या कैसे ख़त्म होगी? इसका अब तक कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया है। इससे पता चलता है कि उत्तर भारत, जहाँ जातिगत प्रतिनिधित्व एक बड़ा मुद्दा है, की राजनीति में इस अभियान की सीमित सामाजिक पहुँच है।

चौथा, दक्षिण के विपरीत, उत्तर भारत में ईसाइयत या ईसाइयत का राजनीतिक वर्चस्व प्रबल नहीं है। इसका मतलब है कि सरकारी नियंत्रण के बाद मंदिर प्रबंधन के लिए नियुक्त किये जाने वाले लगभग सभी लोग हिन्दू होते हैं, जबकि दक्षिण में स्थिति इसके उलट होती है जहाँ गैर हिन्दुओं (ईसाईयों) ने राज्य नियंत्रण के दम पर मंदिर से सम्बंधित सुविधाओं में अपनी पैठ बना ली है। इसलिए, उत्तर भारत में बेफ़िक्री भी सार्वजनिक उदासीनता का एक कारण है क्योंकि लम्बे समय तक मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के प्रतिप्रभाव को पूर्णतः स्वीकार नहीं किया जाता है।

‘फ्री अवर टेम्पल्स’ अभियान को यह समझने की ज़रुरत है कि अब तक यह न तो इस विषय पर बड़े पैमाने पर जागरूकता पैदा करने में सफल हुआ है और न ही इसने सरकारी नियंत्रण से निजात पाने के लिए कोई व्यवहार्य विकल्प प्रस्तावित किया है।

वर्तमान प्रणाली की आलोचना करना और इसके खतरों के बारे में चर्चा करना ही पर्याप्त नहीं है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि एक ऐसे दृष्टिकोण और विकल्प को सामने लाया जाए जो बेहतर हो और जिसके तहत सभी वर्ग पहले से बेहतर हों।

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अभिनव प्रकाश सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं।