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हिंदू आत्मा वाले एक भारतीय राज्य के बारे में आप क्या कहेंगे?
हिंदू आत्मा वाले एक भारतीय राज्य

प्रसंग
  • उधारी एवं नेहरूवादी विशेषता रहित भारतीय राज्य की कल्पना करिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अंग्रेजों से आजादी की सत्तरवीं सालगिरह- वर्ष 2022 तक एक “नये भारत” का वादा कर रहे हैं। यदि वह वास्तव में गंभीर हैं तो उनकी इस अभिलाषा का स्वागत किया जाना चाहिए।लेकिन चलिए देखते हैं, क्योंकि देश पाँच साल में नहीं बदलते हैं; इसके लिए पीढ़ियों (या चीन के मामले में एक पीढ़ी) का समय लगता है।

लेकिन इससे पहले कि हम कोई समय सीमा निर्धारित कर सकें, हमें यह प्रश्न करना चाहिए कि हम वहाँतक कैसे पहुँच सकते हैं।निश्चित तौर परहमारे द्वारा बनाई हुई कठोर न्याय प्रणाली, हमारे द्वारा बनाए हुए भयानक कानूनों,हमारे द्वारा कायम रखी गयी फली-फूली केंद्रीकृत नौकरशाही और नेहरूवादी गणराज्य की कठिन और सुस्त प्रशासननिक संरचनाओं और प्रक्रियाओं के साथ सामान्य रूप से आगे बढ़कर नहीं।

जवाहरलाल नेहरू का न केवल भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनने का,बल्कि आज तक की सबसे लंबी सेवा प्रदान करने का भीसौभाग्य था।1964 तक,भारतीय राज्य की आधिकारिक नीतियाँ और नेहरू का वैश्विक नजरियादोनों एक दूसरे के पर्याय बन गये थे।भारतीय गणराज्य एक नेहरूवादी गणराज्य था।नेहरू की विरासत समाजवाद, गुटनिरपेक्षता, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के स्तंभों पर खड़ी थी।

1991 के आर्थिक सुधारों ने पहले स्तंभ पर प्रहार किया; तब से हुए निरंतर हमलों ने इसे काफी हद तक कमजोर कर दिया है।गैर-संरेखण विलासिता है जिसे भारत वहन नहीं कर सकता।अगर इसे चीन को शामिल करने का अवसर रखना है तो इसे रणनीतिक संरेखण की ओर बढ़ना चाहिए।

धर्मनिरपेक्षता- ईसाइयों और राज्य को अलग करना – इस हद तक विकृत हो गयी है कि कोई भी नहीं जानता कि वास्तव में इसका अर्थ क्या है।लोकतंत्र ही एकमात्र ऐसा मोर्चा है जिस पर सर्वसम्मति है।हालांकि, हमने कई लोगों को संसदीय प्रणाली से अध्यक्षीय प्रणाली की ओर अग्रसर होने कीवकालत करते देखा है।

समाजवाद और गुटनिरपेक्षता-ये दो स्तंभ जीर्ण-शीर्ण स्थिति में हैं।तीसरा – धर्मनिरपेक्षता – गंभीर तनाव में है।यदि यह स्तंभ गिरता है, तो नेहरूवादी गणराज्य भी गिर जाएगा।एक पाए/स्तंभ पर कोई संरचना खड़ी नहीं हो सकती है।आधार रेखा यह है कि नेहरूवादी गणराज्य अपनी बिक्री तिथि से गुजर चुका है।हमें इसे विखण्डित कर देना चाहिए और एक नया गणराज्य स्थापित करना चाहिए, जिसकी आत्मा विशेषरूप से इंडिक अर्थात् हिंदू हो।

नेहरु ने अपने प्रसिद्ध ‌भाषण‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ में कहा था कि एक समय आता है, हांलाकि जो इतिहास में बहुत कम होता है, जब हम पुराने से नए की तरफ बढ़ते हैं, जब एक उम्र समाप्त होती है, और जब लंबे समय से देश की दबी हुईआत्मा को आवाज मिलती है।

नेहरू और लोकतंत्र को मजबूत बनाने के उनके प्रयासों के लिए धन्यवाद, भारत की आत्मा, जो मुख्य रूप से हिंदू चरित्र में है, ने 1990 के दशक में अपना उच्चारण खोजना शुरू कर दिया और वास्तव में 2014 में इस दृश्य पर पहुंचे। लोकतांत्रिककरण, टी गियर, लेखक और शोधकर्ता के प्रभावों की व्याख्या करना चीन पर, लिखा था कि जब देश लोकतांत्रिक हो जाते हैं, “ज्यादातर मामलों में आप राष्ट्रवाद, परंपरावाद, आदि के प्रति तेज धारण देखते हैं। लोकतंत्र का मतलब है कि निम्न वर्ग और ग्रामीण क्षेत्रों से लाखों लोगों को राजनीतिक व्यवस्था में लाया जाए। राजनीति तीव्रतावादी बन जाती है।”

विडंबना यह है कि नेहरू का लोकतंत्र एक हिन्दू राज्य के लिए एक दाई बनकर खत्म हो सकता है।

आदर्श रूप से, यह नया राष्ट्र आकार में छोटा होगा लेकिन चारित्रिक रूप से मजबूत होगा। हालांकि यह वैचारिक रूप से कट्टरपंथी न होकर एक मुक्त बाजार सिद्धान्त का पालन करेगा। यह अपने बच्चों को शिक्षित करने और रोगियों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने में उदारतापूर्वक खर्च करेगा, इन दो मुद्दों पर नेहरूवादी गणराज्य बुरी तरह विफल रहा है, लेकिन ऐसा एक पुराने मॉडल पर नहीं किया जाएगा। समाजवाद पर पूंजीवाद, गैर-गठबंधन आंदोलन पर रणनीतिक आंदोलन, बड़े और कमजोर राज्यों पर छोटे और मजबूत राज्य और बाकी जो आपने देखा है उसकी योग्यता को समझाने में विशेषज्ञों ने स्याही फैला दी है। किसी भी मामले में, यह सभी बाहरी विशेषताएं हैं, जैसे कि अगर आप चाहें तो आत्मा के बिना एक शरीर।

हमें एक वैचारिक आसरा चाहिए, एक ऐसी नींव जिस पर नये निर्माण की किए जा सकें । शुरु करने से पहले यहां मैं स्पष्ट रूप से बताना चाहता हूं कि यह किसी धर्मशासित राज्य बनाने के लिये आह्वान नहीं है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

नागरिकता का आनंद लेने के लिए यह देश की सबसे बुनियादी स्वतंत्रता है। यह कोई संयोग नहीं है कि आधुनिक दुनिया का सबसे सफल गणराज्य, संयुक्त राष्ट्र, इस स्वतंत्रता को अन्य सभी मौलिक अधिकारों से ऊपर रखता है। अपने मन की बात को खुलकर बोलने या अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की स्वतंत्रता केवल हिन्दू गणराज्य में ही नहीं बल्कि राजशाही शासन व्यवस्था में भी एक चहेती स्वतंत्रता थी। महाभारत में, कृष्ण अपने मित्र नारद के लिए दुखी होते हैं, जबकि वे आधी कार्यकारी शक्तियों के अधिकारी हैं, “मुझे केवल कटु शब्दों का खामियाजा भुगतना पड़ा (भरी सभा में)।” नारद ने उन्हें सलाह दी थी कि कृष्ण पर कटु शब्दों का कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए, उनकीप्रतिक्रिया उनकेमानस, विचारऔरबोलीकोसंतुष्ट करतीहै।”.

अगर कोई व्यक्ति बेबाक होकर अपनी बात कह सकता है तो हर दूसरी स्वतंत्रता कम हो जाती है।

दूसरी मौलिक स्वतंत्रता हर व्यक्ति को अपने धर्म का अभ्यास करने की स्वतंत्रता है, लेकिन हम पहले से ही इसका अभ्यास कर रहे हैं।जैसेहेबियसकॉपर्सकेलेखनऔरअधिकाररहितखोजवकब्जेकेलिए।

इस प्रकार, इस लेख में चर्चा उन चीजों तक ही सीमित होगी जो एक आधुनिक गणराज्य को करनी चाहिए लेकिन नेहरूवादी गणराज्य ने इसमें एक हैश बना दिया।

#1 राष्ट्र न तो अपनी बातों या भावनाओं की अभिव्यक्ति करने की स्वतंत्रता को समाप्त करने के लिए कोई कानून बनाएगा और न ही यह धर्म के मुक्त अभ्यास को प्रतिबंधित करने वाला कोई कानून बनाएगा।

समानता और न्याय

जेम्स वुड ने 2016 में ट्वीट किया था कि “अमेरिका में एक भी कानून ऐसा नहीं है जो लोगों से रंग, जाति, धर्म और राष्ट्रीय मूल के आधार पर उनके साथ अलग तरीके से व्यवहार करता हो। एक भी नहीं।” लोकप्रिय ट्वीटर उपयोगकर्ता और ब्लॉगर ‘रियलिटी चेक इंडिया’ ने इसपर अपने विचार रखते हुए कहा था कि भारत में यह मामला इसके बिल्कुल विपरीत है। “यहाँ पर एक भी कानून या योजना ऐसी नहीं है जो जन्म से लेकर, शिक्षा, कानून, कॉलेज में दाखिला, सरकारी क्षेत्र में नौकरियों, पदोन्नति, छात्रवृत्ति, साँड़ों और मुर्गों की लड़ाई जैसी परंपराओं और धार्मिक स्थलों तक हर समूह के लिए एकसमान रूप से लागू होती हों।”

हमारे पास एक मानवाधिकार आयोग है, अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग है और अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग है। अब तो हमारे पास अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए भी एक संवैधानिक आयोग हो गया है। ये अलग आयोग इसलिए मौजूद हैं क्योंकि नागरिकों के ये वर्ग कानून की नजर में दूसरे वर्गों की तुलना में कुछ अधिक मायने रखते हैं। आयोग इनके लिए एक पहरेदार के रूप में कार्य करता है जो इन वर्गों द्वारा आनंद लिए जा रहे अतिरिक्त लाभों की गंभीरता से रक्षा करता है।

अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) संसोधन विधेयक 2015 को ही देख लीजिए। किसी महिला को उसकी सहमति के बिना छूना, उसके लिए अश्लील शब्दों का प्रयोग करना, इशारे करना या इसी प्रकार की कोई गतिविधि करना दंडनीय अपराध हैं, लेकिन वहीं अगर पीड़ित महिला अनुसूचित जाति या जनजाति की नहीं है तो भारतीय कानून आपको कम गंभीरता से दंड देगा। कानून के सामने समानता को भूल जाइए, यह हर महिला की गरिमा का अपमान है। जिन्होंने संविधान द्वारा निर्धारित सूची में वर्णित जातियों या जनजातियों में से एक में जन्म न लेने की गलती की। पूरा अधिनियम इसी प्रकार के भेदभाव वाले कानूनों से भरा पड़ा है।

पिछले साल 20 नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण करने के आरोप में एक हेडमास्टर को 55 साल कैद की सजा सुनाई गई थी। हेडमास्टर को एससी/एसटी जाति की पाँच लड़कियों के लिए प्रत्येक लड़की की तरफ से पाँच साल (5 लड़कियाँ X 5 साल प्रत्येक = 25 साल) और 15 गैर-एससी/एसटी लड़कियों के लिए प्रत्येक लड़की की तरफ से 2 साल (15 लड़कियाँ X 2 साल प्रत्येक = 30 साल) की सजा सुनाई गई थी। अगर यह हमको हमारी न्याय प्रणाली को सुधारने के लिए प्रेरित नहीं करता, तो मैं नहीं जानता कि आगे क्या होने वाला है।

एक हिन्दू राज्य दो सिद्धान्तों से कभी भी समझौता नहीं करेगा – कानून पर समानता और कानूनों की समान सुरक्षा। यह सिद्धान्त हर मौलिक अधिकार से ऊपर होंगे और एक ऐसा आधार तैयार करेंगे जिसपर सभी कानूनों और संस्थाओं की स्थापना की जाए।

“कानून में सभी के प्रति समान रूख” अपनाने के लिए यह सुझाव ‘सामाजिक न्याय योद्धा’ को बकरा बनाने जैसा है। अमेरिकी अर्थशास्त्री थॉमस सोवेल कहते हैं कि “जब लोग अधिमान्य व्यवहार के आदी हो जाते हैं, तो बराबरी का व्यवहार भेदभाव लगता है।

#2 राज्य अपने अधिकारक्षेत्रमें हर व्यक्ति के साथ एक समान व्यवहार करेगा और उन्हें समानसुरक्षाकानूनोंसे इंकार नहीं करेगा।

अलग धर्म और कानून, न कि धर्म और राजनीति

सरल शब्दों में कहें तो, नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म और राजनीति को अलग  करना है। किसी भी समाज ने कभी भी इसको अलग नहीं किया और शायद कभी करेगा भी नहीं। राजनेताओं के लिए धर्म एक काफी अहम कारक है और आगे भी रहेगा क्योंकि यह उन लोगों के एक प्रमुख कारक है जो यह तय करते हैं कि किसके लिए मतदान होना है और किसको बढ़त मिलनी है। इसलिए अगर इनको अलग करने का प्रयास किया जाए तो इसके खोने की वजह बनती है। इसके अलावा, अलग होने से होने वाला नुकसान, उसके फायदे से कहीं ज्यादा महंगा पड़ता है।

क्या धर्म और कानून को अलग करने के लिए एक नए गणराज्य का प्रयत्न किया जाना चाहिए ताकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम जैसे कानूनों, जो बहुसंख्यक समुदाय पर लागू हों, को कभी भी कानून न बनाया जा सके।

हालांकि, जैसा कि हम जानते हैं, अकेले कानून ही भेदभावपूर्ण नहीं हैं। हमारे यहाँ छात्रवृत्तियाँ, बुनियादे सहायता, वित्तीय सहायता, ऋण वगैरह को भी धर्म के आधार पर वितरित किया जाता है, इनको ही ‘रियलिटी चेक इंडिया’ सार्वजनिक बटुए का सांप्रदायिक विभाजन कहता है। सही कहा जाए तो “समान सुरक्षा खंड” को उन्हें असंवैधानिक शब्दों के लिए उपयोग करना चाहिए था, लेकिन वे ऐसा करने में नाकाम रहे।

अल्पसंख्यक मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही सभी योजनाएं सांप्रदायिक हैं, उनका आधुनिक गणराज्य में कोई स्थान नही होना चाहिए। अल्पसंख्यकों के पक्ष में सकारात्मक भेदभाव के लिए सकारात्मक कार्यवाई का तर्क भारत में मायने नहीं रखता है क्योंकि यहाँ पर ऐसा कोई इतिहास नहीं है जहाँ बहुसंख्यकों ने अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया हो, दासता करवाई हो या उनका उत्पीड़न किया हो इसलिए धार्मिक आधार पर उनको अकेले रहने दिया जाए। अपवाद तो केवल जाति आधारित भेदभाव पर है, जिसके लिए सकारात्मक कार्यों के लिए उचित प्रावधान किए जा सकते हैं।

इन दो सिद्धान्तों, कि राज्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम जैसे कानून लागू न करें या सांप्रदायिक सहायता कार्यक्रमों का क्रियान्वयन न करें, को मौलिक अधिकारों के रूप में पेश किया जाना चाहिए, जो धर्म और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में एक ही तल में होने चाहिए। इस प्रकार दूसरे अधिकार को इस तरह से पढ़ा जा सकता हैः

राष्ट्र किसी भी कानून को, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, एक धर्म पर दूसरे धर्म का पक्ष लेने वाला नहीं बनाएगा और वित्तीय या अन्य लाभों के लिए लाभार्थियों को चुनते समय धर्म को को मानदंड नहीं बनाएगा।

असमान प्रणाली को समान समझना बंद करिए

पहला अधिकार, जो कि अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है, नेहरूवादी गणराज्य के सबसे बड़े दोषों में से एक को प्रकट करता है- वह है असमान प्रणाली का समान रूप से पालन। दूसरा अधिकार मान्यता देता है कि भारतीय आस्था और अब्राहमिक धर्म मूल रूप से अलग हैं और इस कारण से दोनों के साथ वैसा ही किया जाना चाहिए।

एक बार स्वीकार किए जाने पर, स्वदेशी आस्थाओं के लिए अतिरिक्त सुरक्षा का महत्व समझना आसान है, जिसमें से धार्मिक रूपांतरणों को प्रतिबंधित करने के लिए शक्तिपूर्वक या लालच देकर मिशनरी धर्मों के लिए भारतीय आस्थाओं का दावा करने वाले लोगों का सच सामने आएगा। दोषी पाए जाने वाले लोगों को भारी जुर्माना लगाने के साथ कठोर कारावास दिया जाएगा। सभी को धर्म परिवर्तन की स्वतंत्रता देना उन लोगों के लिए मायने नहीं रखता है जो आत्माओं से फायदा उठाने में विश्वास नहीं रखते हैं। पहली बार शेर ही गाय को खाता है, लेकिन इसका उल्टा कभी नहीं होता। इसलिए दोनों को एकसमान खाने की स्वतंत्रता देना व्यर्थ है।

भारतीय आस्था, जिसमें मूर्तिपूजा निहित है, अब्राहमिक धर्मों से मूल रूप से अलग है, यह स्वीकार करने का मतलब है कि अब्राहमिक धर्म की अवधारणा के आधार पर भारतीय मान्यताओं का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है, जो कि भारत के न्यायतंत्र की एक प्रबल खतरनाक आदत है। अब्राहमिक धर्मों के नियम धर्मग्रंथों में निर्धारित हैं जबकि हिंदू धर्म में परंपराएं ही मूल नियम हैं।

हिंदू धर्म परंपराओं के बिना नष्ट हो जाएगा। लेकिन जब न्यायतंत्र ने जलीकट्टू, दही हांडी, होली, दिवाली और अन्य परंपराओं में हस्तक्षेप करने की कोशिश की तो इस तरह की विभिन्नताएँ गायब हो गई हैं।

इस प्रकार, इस तरह से पहले अधिकार में बदलाव किया जा सकता हैः

#1 राज्य न तो भाषण या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को क्षति पहुंचाने करने वाला कोई कानून बनायेगा और न ही यह धर्म के मुक्त अभ्यास और विशेष रूप से भारत की पुरानी परंपराओं या अनुष्ठानों को निषिद्ध करने वाला कोई कानून बनायेगा और यह उन लोगों के लिए कठोर कानूनी दंड स्थापित करेगा जो प्रलोभन देकर या बलपूर्वक देश के नागरिकों का धर्म परिवर्तन करवाते हैं।

एक हिंदू गणराज्य होने के नाते, भारतीय समाज के हिंदू वर्ग को संरक्षित, सुरक्षित और पोषित करना इसका प्राथमिक लक्ष्य होगा। पहले मौलिक अधिकार में दूसरे भाग को जोड़ने का महत्व इस संदर्भ में समझा जाना चाहिए।

संविधान में 28वें अनुच्छेद के पहले खंड में बताया गया है कि पूर्णरूपेण राज्य निधि से निर्मित किसी भी शैक्षणिक संस्थान में कोई धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं की जाएगी। असमान प्रणाली को समान रूप से लागू करने का यह एक अन्य उदाहरण है। ऐसा अब्राहमिक धर्मों से संबंधित अधिकांश जनसंख्या वाले देश के लिए तो ठीक है लेकिन भारत के लिए नहीं।

इमेज कैप्सन- हमारे अतीत के समृद्ध ग्रंथों की शिक्षा देश की विरासत के रूप में दी जानी चाहिए।

यहाँ पर वेद, महाभारत, उपनिषद या हमारे समृद्ध अतीत के अन्य प्राचीन ग्रंथों को देश की विरासत, जिसे न केवल संरक्षित किया जाना चाहिए बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी सौंपा जाना चाहिए, के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। इस पर संदेह नहीं कि यह हजारों वर्षों पुरानी विरासत केवल हिंदुओं से संबंधित है। यह सभी भारतीयों के लिए है। इस प्रकार अनुच्छेद 28 (1) को पुनः इस प्रकार बदला जाना चाहिए कि इसका अर्थ पहले से विपरीत हो जाए।

#3 सभी शिक्षण संस्थानों, जो पूर्णतः या आंशिक रूप से राज्य निधि से नहीं निर्मित हैं, को भारत के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास और प्राचीन ग्रंथों में पाए जाने वाले विवरण के अतिरिक्त किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा प्रदान करने का हक नहीं है।

एक हिंदू गणराज्य सनातन धर्म को सुरक्षित, संरक्षित और प्रचारित करने का प्रयास करेगा। उपर्युक्त अधिकार के पीछे यह मूल कारण है। अनुच्छेद 30 (1) के तहत अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित शैक्षिक संस्थानों पर ये विशेषाधिकार लागू नहीं हो सकते क्योंकि मुस्लिम और ईसाई बड़े पैमाने पर इसके लाभार्थी हैं, जिनकी जनसंख्या विश्व स्तर पर बहुतायत में है। उनकी संस्कृति विलुप्त होने का कोई खतरा नहीं है। यह खतरा है तो हिंदू संस्कृति और सनातन धर्म को है जिसे भारत राष्ट्र में अधिकतम सुरक्षा की आवश्यकता है।

दलितों का कोई आरक्षण नहीं बस उन पर संस्थागत नियंत्रण

सरकारी नौकरियों का आंकड़ा प्रतिवर्ष घटता ही जा रहा है। अनावश्यक रूप से, आरक्षण को लेकर संघर्ष में बहुत ही तेजी से शक्तिशाली जातियां आगे बढ़ रही हैं, लेकिन आंतरिक समूह उनकी प्रविष्टि का विरोध करते हैं। सरकार या तो निजी क्षेत्र में आरक्षण  का विस्तार कर सकती है (हां, ऐसा संभव है) या उन्हें पूरी तरह समाप्त कर सकती है। (जो वर्तमान परिदृश्य में असंभव है क्योंकि आरक्षण के अंतर्गत आने वाली आबादी, आरक्षण के अंतर्गत न आने वाली आबादी की अपेक्षा अधिक है।)

हालांकि, समान सुरक्षा अनुच्छेद यह सुनिश्चित करेगा कि जाति आरक्षण तुरंत असंवैधानिक बन जाए।लेकिन, यह किसी के लिए मायने नहीं रखता है कि दलितों को मदद की आवश्यकता नहीं है। हालांकि सही दृष्टिकोणवंचित लोगों को राज्य पर निर्भर होने के बजाए उनको एक निश्चित आधार प्रदान करना होगा। इसलिए, सबसे हितकारी तरीका यह होगा कि वंचित हिंदू जातियों के बच्चों की शिक्षा (वाउचर के माध्यम से) को वित्त पोषित किया जाए ताकि वे सरकार द्वारा भुगतान की गई राशि से अपनी पसंद के किसी संस्थान में अध्ययन कर सकें। आरक्षण पिछले छह दशकों से लागू है, लेकिन अभी भी उम्मीदवारों की कमी के कारण अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की सीटें भरी नहीं हैं। अमेरिका के एक प्रसिद्ध राष्ट्रपति चुनाव से एक वाक्यांश (आंशिक रूप से) लेते हुए कि  – बेवकूफ! यह शिक्षा (की कमी) है, हाल ही में, ऐसी स्थिति से बचने के लिए प्रतिवर्ष अन्य पिछड़ा वर्ग के श्रेष्ठ लोगों की संख्या में 8 लाख तक की वृद्धि कर दी गई। लेकिन इस तरह का शीघ्र समाधान सामाजिक न्याय का उदेश्य नाकाम करता है और समाज में बटवारे की धारणा पनपती है।

यही कारण है कि जो बाहरी समूह मजबूत हैंवे अपने विद्रोह को तब तक नहीं रोकेंगे, जब तक वे खुद लाभ नहीं पाने लगते या जब तक हर कोई इस लाभ बंचित ना हो जाए। कारण सरल है – आपके पास समान आर्थिक स्थिति वाले दो परिवारसाथ-साथ रहते हैं।मान लें कि दोनों परिवारों के बच्चे एक ही स्कूल में जाते हैं और एक कॉलेज या सरकारी नौकरी में एक ही सीट के लिए प्रतियोगिता करते हैं। अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद केवल एक ही पास हो पाता है और दूसरा पास नहीं होता है। इससे समाज में टकराव पैदा होता है नुकसान उठाना पड़ता है।

सकारात्मक कार्रवाई की कोई भी प्रणाली ऐसी नहीं है जो सबको संतुष्ट करने जा रही है। दलितों को संस्थागत नियंत्रण दिया जाना चाहिए – मुख्य रूप से शिक्षा में – ताकि दलित बच्चों को सर्वश्रेष्ठ शिक्षा मिल सके।और सरकार को ऐसी पहलों को प्रोत्साहित करना और सहायता प्रदान करना चाहिए।वास्तव में, उनकी एक पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र विकसित करने में हर संभव तरीके से मदद की जानी चाहिए – मंदिरों और उनके संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण का अधिकार, जिसका उपयोग वह शैक्षणिक संस्थानों और अस्पतालों में कर सकते हैं।यह पारिस्थितिक विकास तंत्र किसी भीसरकारी कोटा कार्यक्रम की तुलना में अधिक दलित इंजीनियर, डॉक्टर, वकील और व्यापारियों का निर्माण करेगा।

भारत को फिर से गैरभंगुर प्रणाली बनाओ

कमजोर प्रणाली तनाव के कारण टूट जाती हैं। जो मजबूत होती है, वे बनी रहती है।  लेकिन गैर भंगुर प्रणाली आगे बढ़ती है और अनियमित घटनाओं में उतार से ज्यादा चढ़ाव का सामना करती है।

इस तरह नसीम निकोलस तालेब ने गैर भंगुरता- एक शब्द जो उन्होंने बनाया, की अवधारणा को समझाया। शहरी राज्यों और विकेन्द्रीकृत गणराज्यों के संग्रह गैर भंगुर प्रणाली है, केंद्रीकृत राष्ट्र राज्यों ( जैसे सोवियत संघ और चीन) भंगुर हैं।

इसी प्रकार अर्थव्यवस्था के लिए भी है। एक केंद्रीकृत वित्तीय प्रणाली या अर्थव्यवस्था कीअव्यवस्था के लिए अधिक संवेदनशील है। उदाहरण के लिए, हिंदू धर्म को ही ले लें।जाति वर्गीकरण भी गड़बड़ था। यह एक केंद्रीकृत अनुक्रम धर्म प्रणाली नहीं थी जैसे अब्राहमिक आस्था वेटिकन/मक्का या एक धर्मग्रंथ जैसे केंद्रों पर निर्भर थे।इस्लामिक आक्रमणकारियों ने हिंदू धर्म के कमजोर बिन्दु को खोजने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया था।उन्हें अंततः कुछ और विद्रोही लोगोंको कमजोर करने के लिए कुछ जातियों के साथ समझौता करना और उन्हे मित्र बनाना पड़ा।

नेहरूवादी गणराज्य आज अधिक केंद्रीकृत है, इसलिए विकार के लिए अधिक भंगुर और आलोचनीय है। प्राचीन हिंदू गणराज्य छोटे गण या संघ थे। यह दूरस्थ नौकरशाही से सूक्ष्म तरह से संचालित नहीं थे और उन्हें यह भी समझ थी कि सभी के लिए एक जैसा समाधान काम नहीं करता।

यहां तक कि राजतंत्रों में, राजा को राजतो करना था लेकिन शासन नहीं करना था।उन्होंने सक्षम मंत्रियों को चुना और उन्होंने सरकार को चलाया।हम भूल गए हैं कि भारत महान क्यों था और यह कैसे हुआ था।

महाभारत ग्रंथ में यह वर्णित है कि कैसे समानता के सिद्धांथ ने गणों में सर्वोच्च शासन किया, और कौटिल्य, जो राजतंत्र के कट्टर पक्षधरी थे और गणतन्त्र के पक्ष में नहीं थे, ने उनके प्रचलित उच्च न्याय की प्रशंसा की है।

एक सभ्यता के तौर पर, अगर हमें महान बनना है तो, चलन में खेल के सिद्धांतों को बदलना होगा जो देश के उत्तम बुद्धिमत्ता वाले लोगों को वर्तमान में यहाँ से भागने पर मजबूर कर रहे हैं। उधार के विचारों, पहचान और रेहन-सहन के बल पर कभी कोई देश महान नहीं बना।

अरिहंत स्वराज्य के डिजिटल कंटेंट मैनेजर हैं।