पत्रिका
“और क्या सबूत चाहिए? ये मामले बिलकुल साफ हैं”

प्रसंग
  • जे. गोपीकृष्णन के साथ विशेष साक्षात्कार, जिन्होंने यूपीए के समय के कुछ सबसे बड़े घोटालों के विवरणों की जांच की, रिकॉर्ड किया और खुलासा किया था।

2G घोटाला, एयरसेल-मैक्सिस घोटाला या नेशनल हेराल्ड घोटाला इत्यादि के बारे में हम जे. गोपीकृष्णन के बिना नहीं जान पाते। दिसम्बर 2008 की शुरुआत में, उन्होंने द पायनियर के लिए कुछ रिपोर्ट लिखी थी 2जी घोटाले का खुलासा करने योग्य थी। फिर चार साल बाद 2012 में यह उन्हीं की रिपोर्टें थीं जो मैक्सिस घोटाले का विवरण देती थीं। मैक्सिस घोटाले में पूर्व वित्त मंत्री और गृह मंत्री पी. चिदम्बरम और उनके बेटे कार्ति को दोषी ठहराया गया है। उसी साल उन्होंने नेशनल हेराल्ड के बारे में भी तथ्यात्मक विवरण दर्ज किया जिसमे इस घोटाले के आरोपियों की सूची में कॉंग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और भूतपूर्व कॉंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी शामिल थे।

जब से उन्होंने पहली बार इन मामलों के बारे में लिखा शुरू किया, तब से गोपीकृष्णन ने इन मामलों में मुकदमे की कार्यवाही पर करीब से नज़र गड़ाए रखी है। स्वराज्य के साथ एक विशेष साक्षात्कार में, उन्होंने हाइ प्रोफ़ाइल भ्रष्टाचार के मामलों के लिए मुकदमे की कार्यवाही की गुणवत्ता के बारे में, 2G घोटाले में विशेष केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) अदालत के फैसले के बारे में, जांच को नाकाम करने के प्रयासों के बारे में, कार्ति और चिदंबरम पर मुकदमा चलाये जाने की संभावना के बारे में, राजनेताओं के भ्रष्टाचार के प्रति भारतीय जनता पार्टी के रवैये के बारे में एवं अन्य कई विषयों पर बात की।

संपादित अंश:

2G घोटाले में सभी आरोपियों की दोषमुक्ति को देखते हुए क्या आपको लगता है कि सीबीआई और न्यायिक प्रणाली ताकतवर लोगों पर मुकदमा चलाने असमर्थ है जबकि हम समझते थे कि ये सारे मामले बिलकुल स्पष्ट हैं। जैसे शुरुआत में पी. चिदम्बरम को दोषमुक्त किया गया और निचली अदालत में बीएसएनएल मामले में दयानिधि मारन की भी दोषमुक्ति हुई (अब हाइ कोर्ट द्वारा दुबारा सुनवाई के लिए भेजा गया है)।

2G घोटाला मामले में निचली अदालत के न्यायाधीश ओ.पी. सैनी द्वारा भूतपूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा सहित कनिमोझी को बरी किया जाना एक बुरा निर्णय है और यह न्यायपालिका के इतिहास में एक काला अध्याय है। न्यायाधीश सैनी, जिन्होंने सभी अभियुक्तों को आरोपित किया था और करीब 1800 प्रश्नों के उत्तर मांगे थे, ने इस तरह का निर्णय कैसे दिया? इस बाबत कई चर्चाएं चल रही हैं। खैर, सैनी के फैसले के बाद सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) शीघ्र न्याय की मांग करते हुए उच्च न्यायालय के पास पहुंचे। यह पैसे के लेनदेन के स्पष्ट साक्ष्यों के साथ बिल्कुल साफ मामला था। लेकिन पता नहीं कैसे, न्यायाधीश ही इसे नहीं देख सके। आशा करते हैं कि दिल्ली उच्च न्यायालय से न्याय मिले।

जाहिर है, यह भारतीय जनता पार्टी की लापरवाही थी जिसने मुकुल रोहतगी को अटॉर्नी जनरल के रूप में नियुक्त किया था; रोहतगी ने पहले 2G मामले में आरोपी पक्षों में से एक का प्रतिनिधित्व किया था। इससे एक गलत संदेश गया। और इसी तरह पूर्व सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा और उनके उत्तराधिकारी अनिल सिन्हा की भूमिका भी थी। रणजीत सिन्हा अपने घर पर मध्यरात्रि में कई आरोपियों से मुलाक़ात कर रहे थे और किसी को भी आश्चर्य होगा जो वह हासिल करने की कोशिश कर रहे थे। अनिल सिन्हा एयरसेल-मैक्सिस मामले में सीबीआई को सही रास्ता दिखाने में असफल रहे तथा चिदम्बरम का नाम आरोप पत्र में नहीं दाखिल करा पाए जिसके कारणवश मरण भाइयों को रिहाई मिली। आलोक वर्मा के निदेशक बनने के बाद ही सीबीआई ने कार्य करना शुरू किया। इस दरम्यान, विशेष निदेशक राकेश अस्थाना भी एयरसेल-मैक्सिस मामले पर सुस्त दिखाई देते हैं। जांच पुनः शुरू हुई, जिसके लिए ईडी के बहादुर जांच अधिकारी राजेश्वर सिंह का धन्यवाद। उन्होने कार्ति के खातों को सील किया और एयरसेल-मैक्सिस मामले में चिदम्बरम की भूमिका का विस्तृत विवरण देते हुए कार्ति पर आरोप-पत्र तैयार किया। लेकिन हमने देखा है कि सरकार के लोगों ने राजेश्वर का कैसे शिकार किया। अक्टूबर 2014 में वित्त मंत्रालय ने यहां तक कह दिया था कि राजेश्वर सिंह की सेवाओं की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि एयरसेल-मैक्सिस मामला खत्म हो गया है! ये सब बातें बताती हैं कि एक पूर्वाग्रहित प्रणाली और निगम एक साथ कैसे काम करते हैं, सत्ता में चाहे जो भी हो। केवल एक चीज जो मैं कह सकता हूं, यह है कि यह सब कुछ केवल सतर्क और जागरूक नागरिकों द्वारा ही रोका जा सकता है।

क्या यह सीबीआई द्वारा खराब जांच के बारे में है या सिस्टम में किसी प्रकार का पूर्वाग्रह है?

मैं अधिकारियों को दोषी ठहराने में विश्वास नहीं करता। यह वह सिस्टम है जो उन्हें नियंत्रित करता है, उन्हें मजबूर करता है, अपने आदेशों के पालन के लिए उन पर दबाव डालता है।.जो लोग इसमें शामिल नहीं होते वे इन शक्तिशाली भ्रष्ट लोगों शिकार बनते हैं। उदाहरण के लिए – दिसंबर 2014 में सीबीआई के संयुक्त निदेशक अशोक तिवारी द्वारा चिदंबरम को सम्मन भेजने के बाद उन्हें उनके गृह राज्य के परिवहन निगम में स्थानांतरित कर दिया गया था। याद रखिए ऐसा तब हुआ है जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा अभी भी चलाये जा रहे मामलों को देखें। अब भी सरकारी वकील अदालत में उनका विरोध करते हैं। इससे पता चलता है कि पूर्वाग्रहों के संरक्षण के लिए प्रणाली एकजुट है। एयरसेल-मैक्सिस मामला, एयर-एशिया धोखाधड़ी और जेट-एतिहाद अवैधताओं पर नज़र डालिए। अदालतों में सरकार का रुख देखिये। सबसे बुरा था वर्तमान वित्त सचिव हसमुख अधिया द्वारा राजेश्वर सिंह के खिलाफ एक संदिग्ध रॉ रिपोर्ट का सौंपा जाना। राजेश्वर ने चिदम्बरम के घर पर छापा मारा था और 14 देशों में उनकी पारिवारिक सम्पत्तियों और उनके 21 अवैध खातों का खुलासा किया था। यह जनवरी 2016 में सामने आया था। पायनियर ने फरवरी 2016 में उनकी संपत्तियों का विवरण प्रकाशित किया था। अरुण जेटली के अंतर्गत वित्त मंत्रालय ने क्या किया? कुछ भी तो नहीं। यह एक ऐसा मामला था जिसे ब्लैक मनी एक्ट के तहत एक जांच की स्पष्ट आवश्यकता थी। इन लोगों ने एक वर्ष से अधिक समय तक ईडी और आयकर (आई-टी) विभाग के जाँच-परिणामों को दबाकर रखा। संबंधित दस्तावेज मार्च 2017 में स्वामी द्वारा सार्वजनिक किए गए और प्रधानमंत्री ने स्वामी की शिकायत पर ब्लैक मनी एक्ट के तहत एक जांच का आदेश भी दिया। प्रधानमंत्री के आदेश के बाद भी वित्त मंत्रालय के लोगों ने फिर से मुकदमे में बिलंब किया हालांकि यह अंततः 2018 में शुरू हुआ। इस टाल-मटोल ने चिदंबरम परिवार को जमानत के लिए अदालतों से संपर्क करने का अवसर प्रदान किया।

जे गोपीकृष्णन

 

राजेश्वर सिंह की पदोन्नति अदालत के आदेश के बाद ही हुई और अब भी उनकी अंतिम पदोन्नति पिछले आठ महीनों से लंबित है। लेकिन हमने सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना जैसे लोगों के लिए मध्यरात्रि में पदोन्नति आदेश होते जारी देखे हैं। अस्थाना का नाम किसी और ने नहीं बल्कि सीबीआई निदेशक द्वारा ही रोका गया था जब उन्होंने अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, जिसमें स्टर्लिंग बायोटेक नामक कंपनी से 3.8 करोड़ रुपये की रिश्वत स्वीकार करने का आरोप भी शामिल था। स्टर्लिंग बायोटेक को कांग्रेस नेता अहमद पटेल का करीबी कहा जाता है। मैं दोहराता हूँ – समस्या शीर्ष स्तर पर है। अच्छे नेतृत्व से निम्न स्तर की समस्याओं को ठीक किया जा सकता है।

जयललिता भ्रष्टाचार के मामले में निष्कर्ष तक पहुंचने में लगभग 18-20 साल लग गए, लेकिन यहाँ तक कि यहाँ उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा सावधानीपूर्वक दिये गए तार्किक फैसले को उलट दिया। यद्यपि जया की मौत ने उनके खिलाफ मामले को समाप्त कर दिया और वी.के शशिकला को दोषी ठहराया गया। बिहार में लालू प्रसाद यादव को चार मामलों में दोषी पाया गया है। लेकिन राजनीतिक रूप से, कोई भी पार्टी भ्रष्टाचार के लिए कोई राजनीतिक मूल्य का भुगतान करती हुई नहीं दिखाई देती, भले ही उनके नेताओं को दोषी ठहराया गया हो। भारतीयों के भ्रष्टाचार के दृष्टिकोण के बारे में यह क्या कहता है?

इन मामलों में न्यायपालिका में भी देरी हुई। लेकिन समस्या है कम मजबूत अभियोजन पक्ष। जब लोग स्वयं कई अवसरों पर लालू प्रसाद और जयललिता द्वारा नियंत्रित सरकारों का चुनाव करते हैं तो फिर हम अभियोजकों और जांचकर्ताओं को दोष कैसे दे सकते हैं? लोगों की भी जिम्मेदारी है। अफसोस की बात यह है कि यहां लोग अपने अधिकारों के बारे में चिंतित हैं और अपने कर्तव्यों के बारे में बिल्कुल नहीं। वे पैसे लेकर या जाति देखकर इन लोगों को चुनते हैं। अदालतों में जमा होने वाली भीड़ को देखिए, भ्रष्ट नेताओं के समर्थन में चिल्लाते और नाटकीय प्रदर्शन करते हुए देखिये। हमें हमारी मानसिकता को बदलना होगा। हम सत्ता और धन के अनुसार चलते हैं। उन्हें अपनी मानसिकता बदलनी चाहिए।

कार्ति चिदंबरम और पी चिदंबरम के खिलाफ मामलों में

जब पी चिदंबरम और उनके बेटे, कार्ति के खिलाफ मामलों की बात आती है, तो ऐसे कई प्रश्न हैं जो ध्यान में आते हैं:

– एस गुरुमूर्ति की जांच में कार्ति की एडवांटेज स्ट्रेटेजिक कंसल्टिंग और ऑसब्रिज में, पाया गया कि इन कंपनियों के स्वामित्व को कार्ति के दोस्तों को हस्तांतरित कर दिया गया है। क्या हम जानते हैं कि हस्तांतरण के समय इन कंपनियों के पास क्या संपत्ति थी? और क्या इस हस्तांतरण को लेकर जो विचार है उनके बारे में कुछ भी ज्ञात है?

– क्या इन हस्तांतरणों की कीमत यह प्रमाणित नहीं करेगी कि कंपनी को पर्याप्त विचार-विमर्श के बिना स्थानांतरित किया गया था?

-एक और कहानी में यह प्रमाणित हुआ है कि जिस समय अग्रिम राशि कार्ति के दोस्तों को हस्तांतरण हुई उसी समय उन दोस्तों ने एक इच्छापत्र बनाया जिसमे उन्होंने कंपनी को कार्ति की बेटी के नाम करने की बात करी। क्या केवल यह तथ्य संबंध और बेनामी स्वामित्व प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं है?

-वासन आई-केयर मामले में ऐसा लगता है कि कार्ति की कंपनी ने सस्ते शेयर खरीदे और फिर इन्हें एक महँगे प्रीमियम पर बेच दिया, लेकिन इसका कारण नहीं स्पष्ट किया गया है कि प्रमोटर कार्ति का पक्ष क्यों लेना चाहेंगे। क्या कोई लिंक है जिसके बारे में हम नहीं जानते?

-जबकि कार्ति ऐसे व्यक्ति हैं जो एडवांटेज के बेनामी स्वामित्व में प्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं, वहीं क्या चिदंबरम कैसे भी प्रत्यक्ष रूप से इसमें शामिल हैं?

ईडी और आई-टी की संयुक्त छापेमारी ने साबित किया कि अधिकांश पैसा एडवांटेज की सिंगापुर स्थित सहायक कंपनी से भेजा गया था। गुरुमूर्ति के लेख ने खुलासा किया कि कैसे कार्ति की कंपनी के बेनामी निदेशकों को वसीयत बनाने के लिए मजबूर किया गया। चिदंबरम परिवार द्वारा नियंत्रित कंपनियों में निदेशकों द्वारा वसीयतों के क्रियान्वयन को ध्यान में रखते हुए उनका परिवार नजदीक से इसमें शामिल रहा। सभी कंपनियों को कई गुप्त तरीकों से कार्ति द्वारा नियंत्रित किया गया था। लेकिन बेनामी निदेशकों द्वारा वसीयत बनाया जाना काफी अनसुना था, कुछ हद तक एक माफिया ऑपरेशन की तरह। आप चिदंबरम द्वारा एफआईपीबी (विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड) के अनुमोदन पर नजर डालें तो पाएंगे कि कई लाभार्थी फर्मों ने कार्ति द्वारा नियंत्रित फर्मों को ‘परामर्श शुल्क’ के रूप में पैसे का भुगतान किया था। वित्त मंत्री के बेटे द्वारा उन फर्मों से परामर्श शुल्क स्वीकार करना, जिन्हें पिता से स्वीकृति मिल थी, भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के तहत जाँच योग्य मामला है। कार्ति की एडवांटेज के पास वासन आई केयर के शेयर थे और अब ईडी ने उस मामले में फेमा (विदेशी मुद्रा प्रबंधन ‍अधिनियम) नोटिस दे मारी है। पायनियर में, हमने 63 बड़ी फर्मों के नाम प्रकाशित किए थे जिनके वित्तीय तार कार्ति से जुड़ी फर्मों तक जा रहे थे। इससे भी बदतर क्या होगा कि सरकार के कुछ लोगों ने चिदंबरम को बचाने के लिए अपनी पूरी कोशिश की, यहाँ तक कि ऐसे कठोर सबूतों के होते हुए भी। एयरसेल-मैक्सिस घोटाले में 19 जुलाई को चिदंबरम और कार्ति के खिलाफ चार्ज-शीट दाखिल करने का श्रेय सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और अपर निदेशक ए. के. शर्मा को जाता है। चिदंबरम ने इसे रोकने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। दो साल से एक विशेष निदेशक मामले में बाधा डालने की कोशिश कर रहा था।

मामला चाहे एयरसेल-मैक्सिस का हो या आईएनएक्स मीडिया का, मामले में सबसे कमजोर कड़ी, एडवांटेज को किए गए भुगतान और एफआईपीबी एवं चिदंबरम के फैसलों के बीच एक संबंध स्थापित करना है। यह देखते हुए कि अदालतों ने 2 जी मामले को कैसे अस्वीकार कर दिया था, क्या यह पूरी तरह से संभव नहीं है कि यह मेलजोल स्थापित करना मुश्किल है?

सबसे कमजोर कड़ी नहीं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा वित्तीय लेनदेन की प्रत्यक्ष और निर्णायक कड़ी प्रमाणित की गई है। दोनों मामलों में, कार्ति की फर्म एडवांटेज एवं चेस मैनेजमेंट ने मैक्सिस और आईएनएक्स मीडिया दोनों से सीधे पैसा लिया है। और क्या सबूत चाहिए? भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के तहत ये बिलकुल साफ मामले हैं।

कार्ति के पिता चिदंबरम द्वारा एफआईपीबी फाइलों को मंजूरी देने के बाद मैक्सिस और आईएनएक्स मीडिया से कार्ति की फर्म में प्रत्यक्ष बैंक हस्तांतरण किया है। यदि यह एक प्रमाण नहीं है, तो कुछ भी प्रमाण नहीं है। मुझे लगता है कि राजा द्वारा दूरसंचार लाइसेंस आवंटित किए जाने के बाद स्वान टेलीकॉम से जुड़ी फर्मों द्वारा कनिमोझी द्वारा नियंत्रित कलाईनगर टीवी को दी गयी 200 करोड़ रुपये की अवैध रकम को सभी न्यायाधीश अनदेखा नहीं करेंगे।

प्रवर्तन निदेशालय द्वारा लॉन्ड्रिंग का मामला भी प्रमाणित करना मुश्किल है क्योंकि इसमें मॉरीशस आदि की कंपनियाँ शामिल हैं। सरकार अब तक बाहरी लेनदेन और उनके घरेलू कंपनियों से संबंधों को पकड़ने में असमर्थ रही है – सरल भाषा में बोले तो धन के गमन की कड़ियाँ नहीं जोड़ पायी है। विदेशी सहयोग की कमी के कारण जब ऐसे मामलों में विदेशी कंपनियाँ शामिल होती हैं तो लेनदेन के सुरागों की तह तक जाना असंभव प्रतीत होता है। इसपर आपकी क्या राय है।

मॉरीशस से सहयोग की कोई जरूरत नहीं है। प्रवर्तन निदेशालय ने दस्तावेजों के साथ साबित कर दिया है कि पैसा कार्ति की फर्म में पहुँचा है। यह पर्याप्त से अधिक है। बाकी सब कुछ वही कहानी है जो चिदंबरम के साथियों ने मीडिया को बताया है, जिसका उपयोग बचाव में तर्कों के दौरान उनके और उनके बेटे द्वारा किया जाएगा। ईमानदार न्यायाधीशों के लिए यह सबूत पर्याप्त हैं। अब हमने देखा है कि मद्रास हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा मारन बंधुओं की कपटयुक्त दोषमुक्ति को कैसे रद्द किया। इससे पता चलता है कि अभी भी कई ईमानदार न्यायाधीश हैं।

यह देखते हुए, कि चिदंबरम के मामले में, जिसमें कार्ति शामिल हैं, कांग्रेस का पूरा ईकोसिस्टम उन्हें समर्थन दे रहा है, क्या यह संभव है कि इस धनराशि में पार्टी फंड का कुछ हिस्सा हो सकता है? अन्यथा कांग्रेस पार्टी को उन्हें पूरा समर्थन क्यों देना चाहिए?

मुझे नहीं लगता कि राजनेता पार्टी फंड के लिए भ्रष्टाचार में शामिल होते हैं। भ्रष्टाचार उनकी निजी कमाई का जरिया है न कि पार्टी फंड का। पार्टी के कार्यों  के लिए फंड बहुत ही आसानी से एकत्र किया जा सकता है। बाकी सब भ्रष्टाचार के बहाने हैं। कुछ निर्लज्ज लोग तो पार्टी फंड से भी चोरी कर चुके हैं।

सरकार ने राजनेताओं के खिलाफ मामलों को तेजी देने के लिए 12 विशेष अदालतें स्थापित करने की योजना बनाई है। क्या यह किसी भी तरीके से कार्ति और उनके पिता के खिलाफ मामले को प्रभावित करेगा?

फास्ट-ट्रैक कोर्ट तो ठीक हैं। लापरवाही फिक्सिंग के लिए जगह बनाती है। लेकिन मुझे लगता तो है कि जब हाई प्रोफाइल मामलों की बात आती है तो एक या दो वर्षों में सुनवाई को समाप्त करना आसान नहीं होगा क्योंकि तर्क-वितर्क और साक्ष्यों आदि के सभी विकल्पों की खोज की जाएगी।

क्या न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार राजनेताओं के खिलाफ चलाए गए मामलों की कम सफलता दर के पीछे एक कारक है?

भ्रष्ट न्यायाधीश भी हैं। इसके बारे में कोई संदेह नहीं है। लेकिन फैसलों को चुनौती देने के लिए हमारे पास अलग-अलग स्तर हैं। लेकिन इस मामले में तथ्य यह है कि भ्रष्ट या लचीले न्यायाधीशों का प्रतिशत किसी भी अन्य विभाग की तुलना में अत्यंत कम है फिर चाहे वह राजनीति हो, नौकरशाही हो या पुलिस इत्यादि हो। न्यायापालिका में भ्रष्ट लोगों की संख्या बहुत ही कम है। अधिकतर न्यायप्रिय हैं।