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भारतीय नम्र शक्ति क्या है और उत्तोलन के लिए भारत कैसे इसका लाभ उठा सकता है
आशुचित्र- धार्मिक सभ्यता के माध्यम से बारत की नम्र शक्ति न सिर्फ एक राष्ट्रीस संसाधन है, बल्कि वैश्विक आवश्यकता है।
17 से 19 दिसंबर तक नई दिल्ली में भारत ने अपना पहला ‘नम्र शक्ति सम्मेलन’ आयोजित किया जिसे सेंटर फॉर सॉफ्ट पावर ऑफ इंडिया फाउंडेशन द्वारा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, सार्वजनिक कूटनीति केंद्र दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय और नालंदा विश्वविद्यालय, राजगीर, बिहार के सहयोग से आयोजित किया गया था।
सम्मेलन को उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू द्वारा संबोधित किया गया और इसमें कई देशों के वक्ताओं ने भाग लिया जिन्होंने इस व्यापक आयोजन के तहत विभिन्न विषयों को संबोधित किया। इसमें कई क्षेत्रों में सैद्धांतिक दृष्टिकोण और भारतीय नम्र शक्ति जैसे कि आयुर्वेद, सिनेमा, भोजन, कला, शिल्प और डिजाइन, भाषा, साहित्य, संग्रहालय, प्रदर्शन कला, आध्यात्मिकता, पर्यटन, शिक्षा और योग शामिल है।
यह लेख शामिल मुद्दों का अवलोकन प्रदान करने के लिए नर्म शक्ति और वैश्विक संचार के विभिन्न तत्वों पर रोशनी डालेगा और आगे बढ़ने की रणनीति सुझाएगा।

उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू सभा को संबोधित करते हुए

नम्र शक्ति एक नया राजनीतिक शब्द है जिसे आज बहुत कम लोग समझते हैं और अक्सर गलत व्याख्या करते हैं। आज नम्र शक्ति को मुख्य रूप से चीन के वन बेल्ट वन रोड नीति जैसे अर्थशास्त्र के संदर्भ में परिभाषित किया गया है लेकिन इसके कई अन्य प्रभाव हैं। नम्र शक्ति का तात्पर्य केवल गैर-सेना से ही नहीं है बल्कि हथियारों, युद्ध और राष्ट्रीय रक्षा के अन्य रूपों के अलावा राष्ट्रीय प्रभाव के अमूर्त रूपों से है जो दृढ़ शक्ति कहलाते हैं। नम्र शक्ति को सांस्कृतिक राजनयिक और सभ्यता के प्रभाव के रूप में वर्णित किया जा सकता है। इसमें न ही केवल आर्थिक बल्कि बौद्धिक, कलात्मक और आध्यात्मिक कारक शामिल हैं ।
भारत अपने नम्र शक्ति प्रभाव के साथ एक राष्ट्र के रूप में एक अनोखी स्थिति में है क्योंकि हमारा देश ना ही केवल पश्चिमी दुनिया की तरह एक आधुनिक राजनीतिक राज्य की तरह है बल्कि साथ ही में कई हजारों वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण और शायद विश्व के इतिहास की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। केवल चीन ने एक सभ्यता को स्थायी किया है हालाँकि भारत की संस्कृति ने चीन को अधिक प्रभावित किया जो की मुख्य रूप से बौद्ध धर्म के माध्यम से चीन में फैला और फिर चीन ने भारत को प्रभावित किया।
इस बीच यूरोप और मध्य पूर्व ने कई सभ्यताओं और साम्राज्यों का आना और जाना देखा जिन्होंने सदियों पहले ही अपने प्राचीन संबंध खो दिए जब तक कि उन्हें औपनिवेशिक युग में एक प्रमुखता हासिल नहीं हुई।
सूचना प्रौद्योगिकी और जनसंचार माध्यमों के इस नए युग में नम्र शक्ति का महत्त्व बढ़ रहा है जिसमें सांस्कृतिक प्रभाव पूरी दुनिया पर अधिक प्रभाव डाल रही है। एक ऐसा देश जो अपनी संस्कृति को साझा या विस्तारित नहीं कर सकता उस देश पर बाहरी संस्कृतियों के हावी होने की संभावना ज्यादा होती है और यही किसी देश की पहचान और संप्रभुता पर दीर्घकालिक हानिकारक प्रभाव डाल सकता है यहाँ तक ​​कि यह अन्य देशों, मीडिया या शैक्षिक प्रभावों के नियंत्रण में भी आ सकता है।

सम्मेलन में सद्गुरु जग्गी वासुदेव

आम तौर पर नम्र और कठोर शक्तियां एक साथ चलती हैं। यदि किसी देश के पास पर्याप्त सैन्य शक्ति नहीं है तो उसका आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव भी कमजोर होगा। फिर भी यदि किसी देश के पास अपनी कठोर शक्ति के साथ चलने के लिए बहुत कम सांस्कृतिक शक्ति या परिष्कार है तो ये मुमकिन है कि विश्व मंच पर उसकी सैन्य प्रमुखता भी कम समय तक चलने की संभावना है।
अमेरिका की नम्र शक्ति
हम अमेरिका की सॉफ्ट पावर की ताकत का आसानी से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कैसे अमेरिकी संगीत, कपड़ों की शैली और फास्ट फूड एवं यूएस-आधारित तकनीक, सेल फोन, उच्च तकनीक वाली फिल्मों और कंप्यूटर गेम और अमेरिकी आर्थिक प्रभावों के साथ-साथ दुनिया भर पर काफी असर किया है। जबकि अमेरिकी संस्कृति शायद ही कभी इतनी गहरी या कलात्मक रही हो। यह व्यावसायिक रूप से जानकार रही है,इसका अच्छी तरह से विपणन किया गया है और इसका प्रभाव अमेरिकी जीवन के बारे में एवं अमेरिकी विचारों और बौद्धिक, राजनीतिक और आर्थिक स्तरों पर मूल्यों सहित एक विशाल प्रभाव फैला हुआ है।
हम यह देख सकते हैं कि अमेरिका अपने लाभ के लिए अपनी कठोर(सैन्य) और नम्र(आर्थिक) शक्ति का एक साथ कैसे उपयोग करता है और यह सुनिश्चित करने के लिए कि दुनिया अमेरिकी बाजारों के लिए खुली है और डॉलर के प्रभुत्व के रूप में इसकी प्रमुख मुद्रा है जिसमें हथियारों की बिक्री शामिल है जो इसके सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक निर्यात में है। पश्चिम बहुसांस्कृतिकवाद की बात करें तो यह मुख्य रूप से पश्चिमी और अमेरिकी संस्कृति, व्यापार और राजनीतिक मूल्य है जो यह पूरी दुनिया में प्रचार कर रहे हैं जैसा कि औपनिवेशिक युग में हुआ था हालांकि नम्र शक्ति मुख्य शक्ति के बजाय मुख्य वाहन है जैसा कि औपनिवेशिक युग था।
भारत की नम्र शक्ति
पश्चिम की तुलना में भारत 1947 में देश की आजादी से बहुत पहले से ही मौजूद है और अधिक पुरानी, ​​अधिक विशाल और गहन संस्कृति रखता है। अमेरिका की तुलना में भारत की संस्कृति अधिक विविध,कम तकनीकी और एक समान तरीके से भारतीय संस्कृति की माकेटिंग करना कठिन है। न कि केवल जीवन के बाहरी कारक लेकिन उच्च जागरूकता के आंतरिक कारक और एक पूरे के रूप में ब्रह्मांड के लिए हमारे आंतरिक संबंध को छूता है। भारत की संस्कृति केवल एक आर्थिक शक्ति नहीं है बल्कि एक महान आध्यात्मिक शक्ति भी है जिसमे आर्थिक विस्तार के लिए काफी जगह है।
भारत की गहन संस्कृति पहले से ही योग, आयुर्वेद, संस्कृत, वेदांत और बौद्ध धर्म, भारतीय संगीत और नृत्य, कला और शिल्प के माध्यम से दुनिया भर में फैली हुई है। इसमें भारतीय व्यंजनों, सिनेमा और बॉलीवुड की एक आधुनिक संस्कृति, और वर्तमान भारतीय संगीत भी है जो जिनको इसमें जोड़ा जा सकता है। भारत की संस्कृति की यह नई आधुनिक उपस्थिति पूरे एशिया में कई हज़ार साल पहले होने वाले अपने प्रभाव को दर्शाती है जो की विशेष रूप से म्यांमार में बौद्ध और हिंदू प्रभावों के माध्यम से, थाईलैंड, भारत-चीन और इंडोनेशिया में और चीन, कोरिया और जापान तक फैली हुई है।
फिर भी अब तक भारत की संस्कृति को अपनी राजनीतिक या आर्थिक पहचान के हिस्से के रूप में बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार की ओर से बहुत कम प्रयास हुए हैं। ऐसा लगता है कि भारत सरकार को भारतीय सभ्यता और इसकी धार्मिक परंपराओं पर काम गर्व है और ना ही इसके वैश्विक मूल्य के लिए सम्मान है जबकि बाकी दुनिया इन सभ्यता और परंपराओं को गले लगा रही है। योग 1893 में स्वामी विवेकानंद और भारत के गुरुओं की मदद से विश्व धर्म संसद के माध्यम से वैश्विक हो गया ना कि सरकार के समर्थन या स्वीकृति के माध्यम से। चीन जैसे अन्य देशों ने अपनी नम्र शक्ति का प्रसार करने के लिए बहुत अधिक मेहनत कर रही है जिसमें उसका आर्थिक और राजनीतिक बल के रूप में देश के बाहर चीनी समुदाय को जोड़ना शामिल है।
सभ्यताओं के बीच संवाद
वैसे नम्र शक्ति का अर्थ संवाद और संचार भी है। यह किसी एक देश या संस्कृति के बारे में नहीं होना चाहिए जो अन्य सभी पर अपना अधिकार जताए। इस संबंध में भारत की धार्मिक संस्कृति ने स्थानीय संस्कृतियों को बाधित किए बिना दक्षिण और पूर्व एशिया में प्रवेश तो किया लेकिन अपने स्वयं के प्राकृतिक विपत्ति के हिस्से के रूप में ही ।
जो आवश्यक है वह सभ्यताओं के बीच एक नया संवाद है। इस संबंध में भारत की प्राचीन धार्मिक सभ्यता और आज की प्रमुख पश्चिमी तकनीकी सभ्यता के बीच एक संवाद की आवश्यकता है। भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी को उच्च स्तर तक ले जाने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान कर सकता है। लेकिन ऐसा होने के लिए पश्चिमी सभ्यता को भारत के सभ्यतामूलक मूल्य को पहचान देनी होगी और समाज, मानवता और ब्रह्मांड की प्रकृति पर एक समग्र दृष्टिकोण को सुनना सीखना होगा। संचार की यह रेखा पहले से मौजूद रही है क्योंकि भारत के कई गुरु दुनिया भर में राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक और धार्मिक समूहों के साथ बातचीत करते रहे हैं लेकिन इसे और अधिक विकसित किया जा सकता है।
भारत दुनिया की सबसे पुरानी बहुलतावादी सभ्यता है जो एक महान बरगद के पेड़ की तरह एक जड़ और कई शाखाओं के मॉडल पर आधारित है। यह मानवता को पारिस्थितिक और ग्रहों के युग में आगे ले जाने के लिए आवश्यक विचार की ग्रहणशीलता और व्यवहार्यता प्रदान कर सकता है जिसमें हम अब एक राष्ट्र, धर्म या संस्कृति को दुनिया पर हावी होने के बारे में नहीं सोच सकते हैं।
कुंभ मेला और भारत की नम्र शक्ति
वर्ष 2019 में प्रयागराज में कुंभ मेले के रूप में भारत की नम्र शक्ति को उजागर करने का एक उत्कृष्ट समय है। कुंभ दुनिया में सबसे बड़ी मानव सभा है और शायद सबसे रंगीन सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से गहरा भी जहाँ महान योगी, साधु और स्वामी आम लोगों के साथ मिलते हैं। वैश्विक यात्रा के इस युग में कुंभ में कई विदेशी मेहमान और आगंतुक भी शामिल होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्रीय सरकार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने एक नाटकीय तरीके से कुंभ को उजागर करने के लिए एक व्यापक बुनियादी ढाँचा विकसित किया है और कई विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए हैं।
स्पष्ट रूप से योग अध्यात्म भारत की नम्र शक्ति का सांस्कृतिक केंद्र रहा है और इसे बहुत आगे भी विकसित किया जा सकता है। पारंपरिक योग सिर्फ आसन ही नहीं बल्कि प्राणायाम, मंत्र और ध्यान भी है। इसमें मानव जीवन, संस्कृति और ब्रह्मांडीय चेतना के सभी पहलुओं पर व्यापक योग शास्त्र शामिल हैं जो नए अध्ययन, परीक्षा और अमल करने के योग्य है।
योग की तरह पारंपरिक चिकित्सा और आयुर्वेद उपचार परंपरा के रूप में  एक वैश्विक स्तर पर बहुत अधिक ध्यान देने और साझा करने की हकदार है। चिकित्सा पद्धति के रूप में आयुर्वेद को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मान्यता प्राप्त है लेकिन अभी तक पश्चिम में कानूनी नहीं हो पाया है वहीं इसके विपरीत  चीनी चिकित्सा को चीन के बाहर कई देशों में लाइसेंस प्राप्त है और उन देशों की स्वास्थ्य प्रणाली में व्यापक रूप से काम कर रहे हैं । आयुर्वेदिक प्रथाओं और उत्पादों के लिए वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में आगे प्रवेश करने और पूर्व और पश्चिम में कई देशों में लाइसेंस प्राप्त करने का स्वर्णिम अवसर है। भाषा और संचार दोनों माध्यमों के लिए संस्कृत भारत की नम्र शक्ति का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। वास्तव में हम संस्कृत को भारत की नम्र शक्ति की भाषा कह सकते हैं।
शैक्षिक नम्र शक्ति का एक अन्य क्षेत्र भारत का पारंपरिक विज्ञान जो इसकी ध्यान परंपराओं का हिस्सा रहा है। यह न ही केवल एक बाहरी सूचना की खोज के रूप में विज्ञान को पुनर्जीवित करने में मदद कर सकता है बल्कि चेतना की एक आंतरिक खोज में भी मददगार है। आज विशेष रूप से महत्वपूर्ण यह है की आज हम दवाओं पर निर्भरता से परे जा सकें और योग एवं ध्यान से बढ़ते तनाव, मनोवैज्ञानिक अशांति और हमारी उच्च तकनीक संस्कृति में प्रचलित होने वाली नाखुशी का मुकाबला करने में मदद मिल सके। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय ने प्राचीन और मध्यकालीन दुनिया में कई शताब्दियों तक भारत की शैक्षिक नम्र शक्ति को प्रतिबिंबित किया। नए नालंदा जैसी संस्थाएँ आज फिर ऐसा कर सकती हैं। दुनिया भर के लोग भारत को उसकी योग और धार्मिक परंपराओं, प्राचीन मंदिरों और पवित्र स्थलों, गुरु और देवता के रूपों में विख्यात है जिसको की हमे नहीं भूलना चाहिए।
नम्र शक्ति ज्ञान के साथ-साथ चलती है और भारत हमेशा से ज्ञान आधारित सभ्यता रही है। नया ज्ञान-आधारित युग वह हो सकता है जिसमें एक सकारात्मक संचार, अहिंसा के रूप में नम्र शक्ति और मानव एकता की मान्यता और सभी जीवन की एकता हो और कठोर शक्तियाँ युद्ध और संघर्ष को समाप्त कर उस पर काबू पा सकेंगे।
अपनी धार्मिक सभ्यता के माध्यम से भारत की नम्र शक्ति केवल एक राष्ट्रीय संसाधन नहीं है बल्कि हमारी नई सूचना प्रौद्योगिकी को शांतिपूर्ण, सामंजस्यपूर्ण और रचनात्मक तरीके से संभालने के लिए आवश्यक चेतना के ज्ञान को जगाने के लिए एक वैश्विक आवश्यकता है।
निश्चित रूप से भारत की धार्मिक नम्र शक्ति मानवता और सभ्यता को बदल सकती है अगर इसे गहराई और विशालता के साथ उपयुक्त प्रेरणा और अंतर्दृष्टि के लिए विकसित और साझा किया जाए।
डेविड फ्रॉली एक अमेरिकी हिंदू शिक्षक व लेखक हैं।