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2019 के लिए क्या है हिंदुत्व की भूमिका?
2019 के लिए क्या है हिंदुत्व की भूमिका

प्रसंग
  • हिंदुत्व और इसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति की जीत एक औद्योगिक हिन्दू राष्ट्र में निहित है न कि गांवों की एक मनोहर सामंती व्यवस्था में

2014 के उस लोकसभा चुनाव के बाद चार साल बीत चुके हैं जिसने भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया था। 2014 के जनादेश को कई अलग-अलग तरीकों से परिभाषित किया गया। इसे भिन्न-भिन्न टिप्पणीकारों के वैचारिक नज़रिए के आधार पर विकास के लिए मतदान, भ्रष्टाचार के लिए मतदान, सांप्रदायिक एजेंडे के लिए मतदान इत्यादि कहा गया। लेकिन 2014 के चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था हिंदुत्व राजनीति का चुनावी पुनरुत्थान। इसमें 1990 के दशक में राम मंदिर मुद्दे के विपरीत हिंदुत्व का समर्थन करने वाली कोई भावनात्मक लहर नहीं थी। गहरे सामाजिक-आर्थिक मंथन के चलते हिंदुत्व का यह पुनरुत्थान हुआ जिसने एवज में हिन्दू पहचान को संगठित कर दिया। 19 वीं शताब्दी के बाद से जारी एक लम्बी प्रक्रिया में यह एक मात्र नवीनतम घटना थी लेकिन इसने औद्योगिक-शहरीकरण की प्रक्रिया से वजूद में आये उत्तर-औपनिवेशिक भारत के बाद ही गति प्राप्त की।

कई लोगों के बुलंद दावों के बावजूद, हिंदुत्व एक आधुनिक रचना है। यह उद्योग और पूँजीवाद पर आधारित नयी उभरती अर्थव्यवस्था के तहत भारतीय उपमहाद्वीप  में पश्चिमी उपनिवेशवाद और पुनरुत्थानशील इस्लामी साम्राज्यवाद के लिए हिन्दू प्रतिक्रिया थी। इसने कई विरोधी चीजों, जो विकेंद्रीकृत मॉडल पर निर्मित सभ्यता की लागत और विविधता द्वारा की विशेषता थी, को दरकिनार करने की मांग की।

हिंदुत्व ने क्षेत्र, भाषा और जाति के मतभेदों और संघर्षों से परे एक एकीकृत हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना की। और सभी राष्ट्रों की तरह, इस प्रकार परिकल्पित हिन्दू राष्ट्र औद्योगिक-शहरीकरण के उत्थान के बिना संभव नहीं है।

आजादी के बाद आर्थिक परिवर्तन और विशेष रूप से 1990 के दशक से आर्थिक सुधारों ने इस प्रक्रिया को बढ़ावा दिया है। बाज़ार अर्थव्यवस्था के विकास और उत्पादन के पूंजीवादी तरीके के विस्तार ने जन्म-आधारित सामाजिक वर्ण व्यवस्था को प्रत्यक्ष रूप से कमजोर कर दिया, और शहरीकरण ने बढ़ती निकटता में एक दूसरे के साथ रह रही अलग-अलग जातियों और समुदायों के लोगों की जीवनशैली और वैश्विक दृष्टिकोण के सम्मिलन को प्रोत्साहित किया। यही कारण है कि शहरी क्षेत्रों में हिन्दू राजनीतिक चेतना को देखने को मिली जबकि देहात क्षेत्रों में जाति चेतना हावी है। इसलिए हिंदुत्व में अपने वैचारिक विश्वास का ढोंग करने वाली भाजपा का गढ़ शहरी क्षेत्र हैं जबकि कृषि क्षेत्रों में इसकी स्थिति अच्छी लेकिन अनिश्चित रही है। इसके विपरीत सभी दावों के बावजूद, हिंदुत्व ने आकांक्षी युवाओं के साथ मिलकर 2014 के अभूतपूर्व जनादेश को संभव बनाया। यह फिर से हिंदुत्व ही है जो 2019 के आगामी राष्ट्रीय चुनावों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और भाजपा एक बार फिर से स्पष्ट लाभार्थी होगी, लेकिन यह एक आसान काम नहीं होगा। न सिर्फ विपक्ष ने इसके लिए उपाय किये हैं बल्कि जाति का अपकेन्द्रीय बल भी हिंदुत्व राजनीति के खिलाफ काम कर रहा है। जैसा यह आज है, हिंदुत्व कई प्रमुख जटिलताओं से पीड़ित है।

पहला, उत्तर भारत के उच्च जाति के परिवेश से आज हिन्दुत्व की मूल भाषा समाप्त हो गई है। इसकी प्रतीकात्मकता और इसके दिव्य चरित्रों को प्रसारित करने वाली सामाजिक मुद्दों पर आधारित जो कथाएं हैं, विशेषकर जाति व्यवस्था पर, वह कायम हैं, जिससे जनता के लिए हिन्दुत्व को समझना मुश्किल हो जाता है। एक परिष्कृत और समावेशी भाषा तथा प्रतीकात्मकता का अभाव है, जिसमें हिन्दुओं की सभी वर्गों की चिंताएं और आकांक्षाएं शामिल हैं, वह हिन्दुओं के सभी वर्गों और क्षेत्रों के लिए हिन्दुत्व के मूल का अनुभव प्राप्त करने में आसानी प्रदान करता है।

यहाँ पर एक बात गौरतलब है क्यों पृथ्वीराज चौहान को हिन्दूत्ववादी पंथ में एक नायक माना जाए जबकि राजा सुहेलदेव का कोई नामों निशान तक नहीं है। अपनी राजनीतिक गलतियों के कारण एक को भुला दिया गया जबकि दृढ़ता के कारण दूसरे को आज भी याद रखा गया है। उत्तर-पूर्व और दक्षिण के राजाओं और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के नाम हिन्दुत्व के प्रतीकवाद में आगे क्यों नहीं आते हैं? दलित वर्गों के संतों और उनके धार्मिक सुधार आंदोलन हिन्दुओं की कथाओं का हिस्सा क्यों नहीं हैं? यह सत्य है कि उनमें से अधिकतर आज हिन्दुत्व का समर्थन करने वालों की सामाजिक कथाओं के साथ बाधा बनी हुई हैं लेकिन फिर भी अगर हिन्दुत्व के मूल को देखा जाए तो विभिन्न धार्मिक संप्रदायों, सुधार आंदोलनों, विभिन्न जातियों और क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत को इन कथाओं और प्रतीकात्मकता में सामने तो आना चाहिए।

यह कोई दुष्कर कार्य नहीं है लेकिन यह हिंदू समाज के विभिन्न वर्गों से संबंधित अधिक से अधिक लोगों विशेषकर अधीनस्थों, जो कि हितधारक हैं न कि मतदाता, को शामिल करने और कार्यान्वित करने की महत्वपूर्ण जागरूक कार्यवाही करेगा। अन्यथा हिंदू समरूपता उतनी ही तेजी से नष्ट होती है जितनी तेजी से इसका निर्माण होता है।

दूसरा, हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले लोगों को स्वदेशी और उन सभी के नाम पर चल रही सामंती प्रक्रिया के अपने अंधविश्वास और अव्यावहारिकता को त्यागना होगा। उन्हें अनुभव करना चाहिए कि 2014 का निर्णय हिंदू आधुनिकता की इच्छा की अभिव्यक्ति भी था। जैसा कि वी. एस. नायपौल इसके बारे में कहते हैं कि भारत लाखों विद्रोहियों की भूमि है जहाँ जन्म लेने वाला हर नया व्यक्ति अपने अतीत से संघर्ष कर रहा है और इतिहास के प्रवाह के खिलाफ जाने का कोई भी प्रयास केवल विनाशकारी ही हो सकता है।

भारत और हिन्दू समाज एक नाजुक स्थित पर पहुच रहे हैं जब उन्हें पूर्व आधुनिक,अर्द्ध सामंती समाज से आधुनिक समाज तक पहुंचकर निर्णायक बदलाव करना होगा।इस प्रक्रिया के भविष्य के प्रक्षेपण को समझने के लिए और अधिक प्रयासों की जरूरत है उसके बादगांव रूढ़िवादिता की प्रशंसा करने की जरूरत है। यदि हिन्दुत्व को युवा विकास के साथ तेजी से बदलती राजनीतिक रूप से प्रासंगिकऔर तेजी से शहरीकृत हो रही अर्थव्यवस्था के साथ बने रहना है तो इसको आधुनिकीकरण की इस प्रक्रिया में खुद को एकीकृत करना होगा।

तीसरा, हिंदुत्व की राजनीतिक अभिव्यक्ति उसकी प्रतिक्रियाशील एकता पर निर्भर करती है,2014 से पहले के वर्षों की तरह, जब सत्तारूढ़ दल ने हिंदुओं के प्रति खुले तौर पर शत्रुतापूर्ण रुख अपनाया था और इस्लामी और ईसाईवादी मिशनरियों के विद्रोह को प्रोत्साहित किया था। डर कर बनाया गया गठबंधन कमजोर होता है।

आशा करते हैं कि 2019 एवं उसके बाद हिंदुत्व को सभी हिंदू जातियों एवं समुदायों तथा सामाजिक गतिशीलता के माध्यम के बीच एक न्यायसंगत शक्ति-साझाकरण का निर्माण करना चाहिए। जातीय संघर्षों से निपटे बिना हिंदुत्व खुद को अप्रिय स्थिति में पायेगा।

जातीय मुद्दों और सामाजिक भेदभाव एवं पक्षपात का अस्वीकरण एक विकल्प नहीं है। इन मुद्दों को हिंदुत्व के ढाँचे के भीतर शामिल किया जाना चाहिए। अन्यथा,  मराठा या जाट आंदोलनों अथवा दलित विरोधों जैसे व्यवधान हमारे सामने बार बार आएंगे, जो हाल ही में भारत बंद के दौरान हुए एक मामले या इन दिनों उत्तर प्रदेश में आक्रामक उच्च जाति के दावों की तरह देखे गये।

उनमें से प्रत्येक 2019 में हिंदुत्व कारक को बेअसर कर सकता है। जबकि कोई अलग-अलग वर्गों को शात कराकर इन संघर्षों को संभालने का प्रयास कर सकता है, जब तक सामाजिक स्तरीकरण के मूल कारण पर ध्यान नहीं दिया जाता है तब तक इस तरह की घटनाएं जारी रहेंगी। यह केवल हिंदुत्व के अंतर्गत ही किया जा सकता है, जिसके लिए एक आधुनिक एवं औद्योगिक हिंदू राष्ट्र तथा हिंदू आधुनिकता बनाने के लिए इसके उद्देश्य एवं इरादे की स्पष्टता होनी चाहिए।

अभिनव प्रकाश सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं।