पत्रिका
सुस्वागत ’’स्वराज्य’’

आज स्वराज्य पत्रिका एक नये कलेवर के साथ हिन्दी भाषा के माध्यम से उत्तरी भारत में प्रवेश कर रही है। सन् 1956 में सर्वप्रथम छपने वाली इस पत्रिका ने कई उतार-चढाव देखे हैं। चक्रवर्ती राजा राजगोपालाचारी जी का सपना आज एक नये रूप में साकार होगा, जब उनके द्वारा जायी हुई यह पत्रिका भारत की बहुलता का प्रतिनिधित्व करते हुए हिन्दी भाषा-भाषियों तक पहुँचेगी। स्वराज्य के सभी भाई-बन्धु विशेष रूप से जग्गी प्रसन्ना एवं अमर बधाई के पात्र हैं।

स्वराज्य की स्थापना सर्वप्रथम सन् 1956 में चक्रवर्ती राजा राजगोपालाचारी जी के मार्ग निर्देशन में सुब्बाराव जी द्वारा की गई थी। यह एक अर्थ में तत्कालीन नेहरूवादी नीतियों के विरोध में जन्मी थी परन्तु शनैः शनैंः व्यक्तिगत एवं व्यापारिक स्वतंत्रता के मूल्यों का प्रतिपादन इस पत्रिका की विशेषता रही है। मीनू मसानी, श्री आर. वेंकंटरमन, आर. के. लक्ष्मण, आचार्य कृपलानी, डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डा. आर. सी. क्यूपर, ए. सन्तनम, फिलिप स्ट्रेप, ननी पालकीवाला, डा. वी. गुडप्पा, डा. के. एम. मुंशी जैसे मूर्धन्य लेखक एवं पत्रकार स्वराज्य के साथ जुड़े रहे हैं। सन् 1972 में राजा राजगोपालाचारी जी के गोलोक गमन के पश्चात् पत्रिका ने अपना आधार स्तम्भ खो दिया। एक समय ऐसा भी आया जब इसे बन्द करना पड़ा।

भारत का राजनैतिक एवं आर्थिक तंत्र इस समय एक चौराहे पर खड़ा है-इक्कीसवीं शताब्दी की विरोधाभासी शक्तियों के बीच अपना रास्ता तलाश रहा है। एक तरफ बीसवीं सदी की वे ध्वस्तप्रायः शक्तियां हैं जिन्हें हम वामपंथ, साम्यवाद, समाजवाद इत्यादि नामों से जानते-पहचानते हैं और जिनका भरण-पोषण आज भी उत्तर आधुनिकवाद जैसी पहचानमूलक एवं विकृत विचारधाराओं द्वारा सक्रिय रूप से किया जा रहा है। उदारवाद कहीं अपना रास्ता भटक गया है और क्रूर इस्लामवाद एवं छद्मता से ओत-प्रोत ईसाई प्रचारवाद का विरोध करने के बजाय उनके साथ में खड़ा दिखता है। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि वाम उदारवादी (लेफ्ट लिबरल) जैसे शब्द प्रचलन में आ गये हैं। क्या विचित्र हास्यास्पद स्थिति है कि वामपंथ जैसी अनुदार विचारधारा एवं उदारवाद एक गठजोड़ के रूप में दिखाई दे रहे हैं। इसमें संतोष का विषय केवल इतना ही है कि यह स्थिति सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है अपितु, अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी विश्वविद्यालय प्रांगणों में यह परिलक्षित हो रहा है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या भारतीय विचारक अभी भी पश्चिम की दासता से मुक्त नहीं हो पाये हैं और आज भी पश्चिमी विचारधारा का अंधानुकरण करना उनकी मजबूरी है।

दूसरा रास्ता एक आधुनिक भारत की ओर इंगित करता है जो मानसिक दासता से मुक्त होकर अपने अतीत के ऊपर गर्व करते हुए अपनी समृद्ध वेद वेदांतों की परम्परा को आधुनिक आयामों में पिरोते हुए उदात्त एवं उदार भारत के निर्माण के लिए कृतसंकल्प है। भारत का यह बहुसंख्यक तबका अपनी सांस्कृतिक बहुलता को वास्तविक रूप से पहचानता है और पश्चिमी गुलामवाद एवं पश्चिम की भारतीय दासता के पक्षधरों का जोर शोर से प्रतिकार कर रहा है। इस विचारधारा में गीता का समत्व है, ऋषियों के वेद वेदान्त हैं, पतंजलि का योग है, कपिल मुनि का सांख्य है, गौतम का न्याय है, सुश्रु एवं चरक की चिकित्सा है, आर्यभटट, भास्कर, अभिनव गुप्त एवं माधवाचार्य का विज्ञान एवं गणित है, भरतमुनि और कालिदासका साहित्य एवं कला हैं और नेहरू गांधी के साथ साथ मंगलपांडे, सावरकर और बाल गंगाधर तिलक भी हैं। यह भारत माता की वह संतानें है जो अपने पूर्वजों को नकारती नहीं हैं बल्कि उनको आदर देते हुए आज के युग के विज्ञान और गणित की उच्चतम परिकल्पना और व्यवस्थाओं के साथ चलने के लिए इसलिए तत्पर हैं क्योंकि उसमें वास्तविक रूप से विचारों की वह कल्पना है जो विद्वेष आधारित वामपंथ एवं समाजवाद में कभी भी नहीं हो सकती है। मुझे यह कहते हुए हर्ष हो रहा है कि स्वराज्य पत्रिका भारत के इस नैसर्गिक नवोदित एवं पुनरूत्थानोन्मुख विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करती है।

वर्तमान नेतृत्व ने सन् 2014 में पत्रिका को नये कलेवर में पुर्नजीवित किया है और तब से यह पत्रिका नित नई ऊँचाइयां छू रही है, जिसमें हिन्दी संस्करण का आरम्भ पत्रिका के इतिहास में एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रहा है। हम सभी इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बनते हुए रोमांचित हैं।