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वर्षा ऋतु : मौसम प्रेम का

प्रसंग:
  • संस्कृत साहित्य में वर्षा ऋतु को कैसे समृद्ध,  वृहद और गहरा उल्लेखित किया गया है इस पर एक नजर

इन दिनों बारिश का मौसम है। साल के छह मौसम में से वर्षा ऋतु या बारिश दो या तीन बार धरती को तृप्त करती है। शिशिर, वसंत और ग्रीष्म ऋतु उत्तरायण के दौरान आती  हैं जबकि वर्षा, शरद और हेमंत दक्षिणायन के समय।इस दौरान चंद्रमा का प्रभुत्व रहता है और यह प्रकृति में कोमल रस और स्फूर्तिदायक वातावरण बनाता है।

इस समय श्रृंगार रस अपने चरम पर होता है। प्रेम के इस मौसम के गुणों को समझने के लिए हमें ऋतु, रस, श्रृंगार और भारतीय जीवन पद्धति में प्रकृति और चित्त के सम्बन्ध को जानने की आवश्यकता है।

यह  भारत की विशेषता है कि जीवन और दर्शन प्रकृति के साथ नजदीक से जुड़े हुए हैं। उल्लेखनीय है कि भावनाओं को समझने और व्यक्त करने के लिए प्रकृति और बदलते मौसम का सहारा लिया जाता है।

हर ऋतु में कुछ निश्चित कार्य निहित हैं। ऐसे ही वर्षा ऋतु में भी कुछ ऐसिी क्रियाएं है जो मानवीय भावनाओं से जुड़े संतोष का एहसास दिलाती हैं।

मुख्य रूप से वसंत ऋतु श्रृंगार रस से सम्बद्ध है तो वर्षा ऋतु भी पीछे नहीं है।

यद्यपि यह एक सौंदर्य-विषयक व्याख्या नहीं है लेकिन प्रेम और रोमांस के मौसम मे झुकाव जरुर है। यह वर्षा ऋतु और प्रेम की कई मनोदशाओं के लिए हमारी समझ को बेहतर बनान मे एक छोटी और सरल व्याख्या है।

रस में निर्माण की कलात्मक प्रक्रिया और आनंद की सौन्दर्यात्मक प्रक्रिया दोनों शामिल होते हैं। यह प्रथम प्रक्रिया का विषयनिष्ठ अवतरण है जो दूसरी प्रक्रिया का निर्माण करता है। यह ब्रह्माण्ड का सार है।

हम सभी के पास विचार, क्रिया और अनुभव की गहरी प्रवृत्ति है जिन्हें हम संस्कार कहते हैं। ये संस्कार हमारे भावों के द्वारा प्रदर्शित होते हैं; नव रस स्थायी भाव हैं जैसे  श्रृंगार, हास्य, करुण, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शांत और रौद्र।

इन भावनात्मक प्रतिक्रियाओं की उत्पत्ति के लिए कुछ निश्चित उद्दीपनो की आवश्यकता होती है जिन्हें विभव कहा जाता है। ये ऐसी प्रकृति या परिस्थितियां हैं जो हमारे मन के भीतर उत्पन्न होने वाली जटिल भावनाओं को निर्धारित और परिभाषित करती हैं। ये कविता, संगीत, कला, चित्रकला, फूल, और प्रकृति के अन्य पहलू हो सकते हैं।

श्रृंगार रसों की रानी है। इन दो शब्दों, रस और श्रृंगार के कई अर्थ हैं। फिलहाल, यहाँ हम इसे ऋतुओं और भावों के सन्दर्भ में समझते हैं।

श्रृंगार, अक्सर प्रेम, विरह और अविश्वास के बिंदु पथ के भीतर, प्रेम, तृष्णा और वासना है। यह एक बच्चे के लिए मा का वात्सल्य भी हो सकता है और कभी-कभी भक्ति भी, जैसा कि विभन्न टिप्पणीकारों द्वारा समझाया गया है।

श्रृंगार का शाब्दिक अर्थ है शिखर, यह कई विभवों, जिसमें ऋतुओं की अभिव्यक्ति भी एक है , द्वारा उत्तेजित और समर्थित गहरी भावनाओं से उत्पन्न अत्यंत आनंद है। वर्षा ऋतु  मे विचार प्रियतम से जुड़े प्रेम, तृष्णा और भावों में परिवर्तित हो जाते हैं।

प्रकृति और चित्त के अति-घनिष्ठ सम्बन्ध को देखते हुए यह स्वाभाविक है कि ऋतु, जो वातावरण, तापमान, पेड़-पौधों, जानवरों, नदियों और तालाबों की सुन्दरता, जंगलों और खेतों को प्रभावित करती है, इन भावनाओं को सबसे व्यापक संभव तरीके से प्रभावित और उत्तेजित करती है।

संस्कृत, प्राकृत, मैथिली, तमिल  या तेलुगू साहित्य में अगर देखा जाए तो मेघदूतम् या गाथा सप्तसई, पुरानानुरु या विद्यापति की प्रेम कहानियों  में कोमल व मजबूत धागे का प्रकृति के साथ भावों का अनोखा संबंध है। यहां भाव ही केन्द्रीय भूमिका मे है।

श्रृंगार और ऋतु के इस परिचय में हम काव्य पर ध्यान केन्द्रित करेंगे, विशेष रूप से संस्कृत काव्य पर। कविताओं की लम्बी फेहरिस्त से इस संक्षिप्त लेख में अति आंशिक रसास्वादन ही किया जा सकता है।

दुनिया और इसके बारे में हमारी धारणा वर्षा के आगमन के साथ बदलती है। विभिन्न भाव मन मे कुलमुलाने लगते हैं। विशिष्ट त्यौहार, पोशाक और भोजन इस समय आनंद की अनुभूति कराते हैं। इसके केंद्र में प्यार और रोमांस है और इसके साथ जुड़े हैं दो पक्ष। पहला, सम्भोग यानी प्रेमियों का मिलन और दूसरा, विप्रलम्भ, जो ऋतु की प्रकृति द्वारा असहनीय  है।

संस्कृत में ऋतु काव्य पर बहुत सारी कवितायेँ मिलती हैं। यहाँ कुछ के उल्लेख किए जा रहे हैं।

वाल्मीकि द्वारा लिखी गयी रामायण को अक्सर हिन्दू धर्म का पवित्र ग्रथ माना गया है , इसमें उल्लेखित है कि कैसे  समाज, संस्कृति, इतिहास, भूगोल, लोग, वनस्पतियों और प्राणी समूहों का ताना-बाना आपस में बुना गया है और यह एक इंद्रजाल के रूप में है जिसे हम भारतीय रूप में पहचानते हैं, हालांकि इसे भुला दिया गया या दरकिनार किया गया है।

सभी ऋतुओं को इस कृति में जगह मिली है लेकिन किष्किन्धा काण्ड मे वर्षा ऋतु विप्रलम्भ श्रृंगार के एक भावपूर्ण और शानदार वर्णन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। श्री राम अपनी प्रियतमा सीता से अलग होकर पम्पा झील के तट पर उनके लिए विलाप करते हैं। वर्षा और हवाओं से धुली हुई धरती, पेड़, चमक, घनघोर बादल, बिजली, प्रेम और अभिलाषा के भाव को बढाते हैं। इस समय प्रभु राम उनके साथ बिताये अपने समय को याद करते हैं, क्योंकि प्रकृति का हर पहलू उन्हें उनकी सीता की छवि का स्मरण कराता है और बिजली की तेज चमक और गर्जना याद दिलाती है कि कैसे ऐसा होने पर वह उनके आलिंगन पाश में बंध जाया करती थीं। उनकी पीड़ा असहनीय हो जाती है और उनके छोटे भाई लक्ष्मण उन्हें इस दुःख से बाहर निकालने के लिए सांत्वना देते हैं। यद्यपि यह उल्लेखनीय है कि दुःख की घड़ी में भी  ऋतु की मादकता श्री राम पर हमला करने से नहीं चूकती; उनकी प्रियतमा का खो जाना ऋतु की विलासिता द्वारा रचा गया है।

हरिवंशा में देवी रुक्मिणी और श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न और प्रभावती, जो एक दूसरे अवतार में कामदेव और रति हैं, की कहानी है। यह सम्भोग श्रृंगार की परिपूर्णता है। प्रद्युम्न अपने प्रेम के लिए ऋतु का वर्णन करते हैं, उनके मिलन का आनंद वर्षा के आने से परिलक्षित होता है; नदियों और उनके रेतीले टीलों में, पेड़ और पौधों में, बादलों और चन्द्रमा में, सारस, चक्रवाक और कोकिला पक्षियों में, कूटज, काकुभ और कंदली फूलों में स्वरुप सम्बन्धी प्रत्येक भिन्नरूपी परिवर्तन प्रभावती के सदृश हैं जो उनके आकर्षक और मोहक रूप में परिलक्षित होता है।

ऋतुसंहारम वर्ष की सभी ऋतुओं का वर्णन करता है लेकिन वर्षा ऋतु के दौरान प्रेम पुकारता है। समागतो घनागमः कामीजनप्रियः प्रिये – ‘ प्रेमियों के लिए वर्षा ऋतु विशेष महत्व रखती है। प्रेमी अपनी प्रेमिका को इस ऋतू से अवगत कराता है। ‘ इसमें प्रकृति के साथ कालिदास की विशेष शैली का जुड़ाव है और उनके द्वारा उपमाओं का उत्कृष्ट प्रयोग है। इस रचना पर वाल्मीकि का प्रभाव प्रतीत होता है।

मुझे कालिदास के काव्य मेघदूतम् में वर्षा की उत्कृष्ट व्याख्या के साथ अब बात यहीं समाप्त करनी चाहिए।

मेरे लिए मेघ की यात्रा को शब्दों में व्यक्त कर पाना असंभव है जैसा कि यह एकाकी यक्ष से कैलाश पर्वत पर अल्कापुरी की तरफ रामटेक में अपने पर्वत शिखर तक जाता है। यह पूरे भारत में मानसून के भ्रमण के बारे में है। लोगों, स्थानों, भूगोल, इतिहास, पुरुष-महिला, वनस्पतियों, जीवों का विवरण अद्वितीय है और इनके गुणों को जानने के लिए इन्हें पढ़ा जाना चाहिए। श्रावण के दौरान जैसे ही आसमान में बादल उमड़ते हैं और अपने बोझ को निर्झर बूंदों से हल्का करते हैं तब इस धरती के लिए प्रेम की वर्षा होती है। यक्ष का अपनी विरहिणी पत्नी के लिए प्रेम, जल का धरती के लिए अथाह प्रेम जैसा है जिसमे वह सूखे झरनो को मूसलाधार बारिश से लबालब कर देती है।

वर्षा ऋतु को जानना भारत को जानना है, वर्षा ऋतु को प्रेम करना भारत से प्रेम करना है, प्रेमी और प्रेमिका का हार्दिक और कोमल आलिंगन है।

भारतीय राजस्व सेवा में दो दशकों  तक सेवा देने के बाद सुमेधा वर्मा ओझा अब अपनी रूचि प्राचीन भारत का अनुसरण करती हैं। वह पूरे विश्व में प्राचीन भारतीय इतिहास, समाज, महिलाओं, धर्म और महाकाव्यों पर लिखती हैं और भाषण देती हैं। उनकी मौर्या श्रृंखला है, ‘उर्नाभिः। यह अंग्रेजी में एक वाल्मीकि रामायण है। साथ ही प्राचीन भारत की आधुनिक महिला पर एक पुस्तक जल्द ही बाजार में उपलब्ध होने वाली है ।