पत्रिका
भारत के लिए बंधन तोड़ने का समय आ गया है

आशुचित्र- एक मुखर भारत के निर्माण के लिए क्या करना होगा जिसके पास समकालीन विश्व में रणनीतिक स्वायत्तता हो?

जवाहरलाल नेहरू एक कल्पनाशील राजनेता थे जिन्होंने देश की कमज़ोरी को नैतिक लाभ में भारत के लिए परिवर्तित कर दिया जिसमें उन्हें गैर-संरेखित आंदोलन में अपनी भूमिका से संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) और सोवियत समाजवादी गणराज्य (यूएसएसआर) जैसी दो विशाल शक्तियों के बीच हो रही प्रतिस्पर्धा से अपने लिए दोनों का ध्यान हासिल किया जिससे अच्छा फायदा मिला। उन्होंने सराहना की कि नर्म शक्ति (सॉफ्ट पावर) कठोर शक्ति (हार्ड पावर) से बेहतर है।

नेहरू ने दोहरे उद्देश्य वाले परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष कार्यक्रमों और एशिया में पहली जेट लड़ाकू विमान परियोजना का बीजारोपण किया और जिससे उन्हें उम्मीद थी कि वह भारतीय विमानन उद्योग के लिए नींव का पत्थर साबित होगा।

सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि उन्होंने आर्क माघरेब-इंडोनेशिया में शक्ति के पूर्णरूप में भारत के लिए एक आश्चर्यजनक रणनीतिक दृष्टि व्यक्त की लेकिन चीन के मामले में धोखा खा गए। इसके बाद आने वाले प्रधानमंत्रियों में मस्तिषक पढ़ लेना, विदेश नीति का सहज बोध, ऐतिहासिक जानकारी और दृढ़ता से कूटनीति को आगे बढ़ाने जैसे गुणों की कमी थी जिससे देश थोड़ा फिसल गया।

विडंबना यह है कि यह 1971 युद्ध और परमाणु परीक्षण के तीन साल बाद ही देश के लिए संभावनाएँ अंधकार में जाने लगीं। भारत की सैन्य नीति सिकुड़ गई और सामरिक क्षेत्र में पाकिस्तान जैसे एक कमज़ोर और छोटे देश पर ध्यान दिया जाने लगा, वहीं बड़े पैमाने पर परमाणु हथियार से बढ़े हुए वैश्विक महत्त्व का लाभ सरकार उठाने में कामयाब नहीं हुई जिसका कारण था सरकार की हिचक। भारत ने नई सदी में और विभिन्न पार्टियों की सरकारों के अंतर्गत अमेरिका की सुख-सुविधाओं के लिए ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को छोड़ दिया और आयातित युद्धसामग्री पर पूर्ण निर्भरता के साथ हम दूसरे दर्जे की सैन्य शक्ति बन गए। भारत के लिए अपने निहित महत्त्व को पुनः प्राप्त करने के लिए एक ऐसी विशाल राष्ट्रीय दृष्टि की आवश्यक है जो कि भारत को चतुष्कोणीय कैस्पियन- मध्य एशिया- दक्षिण चीन सागर-दक्षिणी हिंद महासागर- पूर्वी अफ्रीकी समुद्री क्षेत्र- खाड़ी में भारत को सबसे शक्तिशाली बनाने के लिए भूस्थैतिक में परिभाषित किया जा सके। और साथ ही साथ यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हिंद महासागर एक बार फिर ‘भारतीय झील’ बन गया है। यह ज़रूरी है कि भारत विघटनकारी नीतियों को गले लगाकर खुद को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फिर से संगठित करने का प्रयास करे।

उपरोक्त लक्ष्य प्राप्त करने के लिए विदेशी और सैन्य नीति प्राथमिकताओं प्रकाश डाला गया है। विदेशी नीति क्षेत्र में भारत को चाहिए कि

  1. उन सभी अंतर्राष्ट्रीय और बहुपक्षीय समझौतों और शासनों पर कार्रवाई करने की कोशिश करें जो राष्ट्रीय हित में बाधा उत्पन्न करते हैं और जिनकी बातचीत में कोई भूमिका नहीं है।
  2. ईरान और मध्य एशियाई गणराज्यों, और विशेष रूप से पाकिस्तान के निकटवर्ती राज्यों को उदार अनुदान भेंट करे, वित्तीय और व्यापार समझौते करे, एक विस्तारित दक्षिणी एशियाई आर्थिक और व्यापार में मजबूती कायम करे, अंततः सुरक्षा योजनाओं में भागीदार बने;
  3. विश्वसनीय और व्यापक चीनी खतरे को ध्यान में रखते हुए आर्थिक और व्यापार नीति सहित सरकार की सभी बाहरी और राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों को संरेखित करना चाहिए। भारत को अपने विशाल बाजार में चीन की पहुँच पर रोक लगाना चाहिए और इस बात का फायदा हम अधिक समान व्यापार और सीमा और उपमहाद्वीप में चीन की आक्रामक नीतियों के खिलाफ उठा सकते हैं।
  4. बीजिंग को संकेत देने के लिए हमे गंभीर रूप से पारस्परिक उपायों को लागू करना होगा और वह जो भी बुरा करेगा उसे उसी ही लहज़े में वापस कर दिया जाएगा। जैसे चीन पाकिस्तान को परमाणु मिसाइल की संवेदनशील जानकारियाँ साझा कर रहा है वैसे ही भारत को भी चाहिए कि वह भी ऐसी जानकारियाँ उन देशों के साथ साझा करे जो चीन के अगल-बगल हैं।
  5. एशिया में ताइवान और जापान जैसे देश जो ऐसा में थोड़े अलग थलग हैं ऐसे राष्ट्रों से ढीली और अनौपचारिक जैविक सुरक्षा संरचना से हटकर एक मजबूत रिश्तों पर ध्यान देना होगा ताकि चीन को चारों तरफ से घेर सकें और हो सके तो यूएस की भी मदद लें।
  6. बड़े स्तर पर एशिया और दुनिया में सुरक्षा एजेंडा को स्थापित करने से अमेरिका और चीन को रोकने के लिए और समान रूप से सैन्य सहयोग की सामूहिक संरचना के लिए ब्रिस (ब्राजील, रूस, भारत, दक्षिण अफ्रीका) यानी ब्रिक्स से चीन को घटाना होगा और वहीं ब्रिक्स को समान रूप से आर्थिक सहयोग के लिए ही काम लेना और भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और सैन्य दक्षिण पूर्व एशियाई राज्यों के साथ संशोधित चतुर्भुज या मॉड क्वाड को बढ़ावा देना और आखिरी में चतुर्भुज में अमेरिका को बदलने के लिए उल्लेख किया जो साथ ही गठबंधन की ऐसी गतिविधियों में संलग्न होने के लिए स्वतंत्र रूप से यह चुन सकता है।

सैन्य क्षेत्र में भारत को यह करना चाहिए-

  1. अपनी रक्षात्मक-निष्क्रिय-प्रतिक्रियाशील मानसिकता को छोड़ना होगा और सक्रिय बनना होगा;
  2. तर्कसंगत और भूमि बलों को पुनर्गठन करना होगा और मानव और भौतिक संसाधनों के साथ एक एकल समग्र बख़्तरबंद और यंत्रीकृत कोर बनाने के साथ-साथ तीन माउंटेन स्ट्राइक कोर का गठन करने होगा और ऊंचाई वाले इलाके के लिए विशिष्ट हथियार प्रणालियों से लैस करना होगा ताकि चीन की पीपल’स लिबरेशन आर्मी (पीएलए)से तिब्बती पठार पर लड़ने के लिए तैयार रहे;
  3. निजी क्षेत्र और विश्वविद्यालयों से अत्यधिक विशेषज्ञों और एल्गोरिदम-लेखकों को मुख्य रूप से उच्च भुगतान से एक गतिशील साइबर वारफेयर बल का गठन किया जाना चाहिए।
  4. वैश्विक गैर-प्रसार शासन को उलटने के लिए हमें थर्मोन्यूक्लर परीक्षण फिर से शुरू करने की आवश्यकता है ताकि हमें सिद्ध नुकलेसर वारहेड मिल सके जिनकी क्षमता मेगाटन तक हो और खास तौर पर छोटी लड़ाईयों में उनका इश्तेमाल हो सके और उन्हें हिमालय की पहाड़ियों में पीएलए के खिलाफ एक कारगर हथियार साबित हो और लॉन्च-ऑन-लॉन्च और लॉन्च-ऑन-चेतावनी क्षमता के लंबी दूरी वाली अग्नि मिसाइलों का समूह भी होना ज़रूरी है।
  5. सामरिक सेना कमान को चलाने के लिए तीन सशस्त्र सेवाओं में अधिकारियों और पुरुषों का एक विशेष परमाणु कैडर बनाएँ;
  6. बड़े विमान वाहक और उनके निर्माण को रोकें और सुरक्षित रणनीतिक और अपेक्षाकृत अजेय पहुँच बनाने के लिए एसएसबीएन और एसएसएन के संवर्धित बेड़े के साथ नौसेना को लैस करें और रूस से दीर्घकालिक लीज पर ली गई टीयू-160एमएम रणनीतिक बमवर्षकों के दो स्क्वाड्रन के साथ वायु सेना को लैस करें।